"ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा" एक अत्यंत लोकप्रिय, हृदयस्पर्शी और वैराग्य रस से ओत-प्रोत निर्गुण भजन है। यह भजन भारतीय संत परंपरा, विशेषकर कबीरपंथ और वेदांत दर्शन के गहन सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें मानव जीवन की नश्वरता, काल चक्र की अनिवार्यता, और भौतिक संसार की क्षणभंगुरता का अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इस भजन का मुख्य उद्देश्य जीवात्मा को मोह-माया की गहरी नींद से जगाकर ईश्वर भक्ति, सत्कर्म और आत्मज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करना है। जब हम इस भजन को सुनते हैं, तो हमारे मन में संसार के प्रति आसक्ति कम होती है और एक गहरे वैराग्य (Detachment) तथा शांति का उदय होता है। यह भजन सत्संगों, संध्या प्रार्थनाओं और आध्यात्मिक सभाओं में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ स्थायी ॥
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा,
ये तन है माटी का पुतला मिट्टी में मिल जाएगा।
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा॥
॥ अंतरा 1 ॥
ये सांसें हैं जब तक रिश्ते सारे तब तक,
छूट जाएगी जब ये सांसें रिश्ता सब टूट जाएगा।
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा॥
॥ अंतरा 2 ॥
ये चार दिनों का मेला आना जाना है अकेला,
राजा रंक हो चाहे फकीरा काल के गाल समाएगा।
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा॥
॥ अंतरा 3 ॥
कर ले प्रभु का सुमिरन बंदे जीवन सफल हो जाएगा,
खाली हाथ आया था जग में खाली हाथ ही जाएगा।
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा॥
॥ अंतरा 4 ॥
सत्कर्मों की पूंजी कमा ले यही साथ तेरे जाएगा,
माया का ये झूठा बंधन यहीं धरा रह जाएगा।
ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव 'वैराग्य' और 'सत्य की खोज' है। यह हमें याद दिलाता है कि इस भौतिक जगत में कुछ भी स्थायी नहीं है। 'विधि का विधान' से तात्पर्य सृष्टि के उस अटल नियम से है, जिसे स्वयं विधाता ने रचा है—अर्थात जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। हमारा यह शरीर, जिसे हम संवारने और सजाने में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं, वह अंततः पंचतत्वों (मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और आकाश) से बना एक पुतला मात्र है, जिसे एक दिन इसी मिट्टी में विलीन हो जाना है।
भजन के माध्यम से संत हमें समझाते हैं कि हमारे सभी सांसारिक रिश्ते-नाते केवल तब तक ही क्रियाशील हैं, जब तक हमारे शरीर में सांसों का आवागमन चल रहा है। जैसे ही यह प्राणवायु शरीर को छोड़ती है, वैसे ही सबसे करीबी रिश्तेदार भी इस शरीर को घर से बाहर निकालने की जल्दी करने लगते हैं। यह जीवन केवल 'चार दिनों का मेला' है, जहाँ हम कुछ समय के लिए आते हैं और अंततः हमें अकेले ही इस यात्रा पर निकलना होता है। चाहे कोई महान राजा हो, अत्यंत निर्धन रंक हो, या कोई त्यागी फकीर—काल (मृत्यु) के समक्ष सभी समान हैं और सभी को एक दिन काल के गाल में समाना ही पड़ता है। इसलिए, मनुष्य को अहंकार छोड़कर प्रभु का सुमिरन करना चाहिए और सत्कर्मों की पूंजी एकत्र करनी चाहिए, क्योंकि केवल वही आत्मा के साथ अगले लोक की यात्रा पर जाती है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक संपूर्ण दर्शन है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- वैराग्य भाव की जागृति: यह भजन मनुष्य के भीतर से झूठे अहंकार और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक मोह को समाप्त कर वैराग्य की भावना जाग्रत करता है।
- समानता का संदेश: भजन स्पष्ट करता है कि मृत्यु के द्वार पर राजा और रंक में कोई भेद नहीं होता। यह सामाजिक समरसता और समानता का एक बड़ा आध्यात्मिक संदेश है।
- सत्कर्मों की प्रेरणा: यह हमें याद दिलाता है कि धन-दौलत और भौतिक संपदा यहीं रह जाएगी, केवल हमारे द्वारा किए गए अच्छे कर्म (सत्कर्म) ही हमारे साथ जाएंगे।
- सरलता और सुबोधता: इसकी भाषा इतनी सरल है कि एक आम व्यक्ति भी इसके गहरे दार्शनिक अर्थ को आसानी से समझ सकता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यंत उपयुक्त माने जाते हैं:
- संध्या काल (Evening Prayer): दिन ढलने के समय, जब प्रकृति शांत होने लगती है, तब इस भजन को सुनने से मन को असीम शांति मिलती है और दिनभर की मानसिक थकान दूर होती है।
- सत्संग और आध्यात्मिक सभाएं: सत्संग के दौरान इस भजन का सामूहिक गायन श्रोताओं को अंतर्मुखी होने और आत्म-चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है।
- साधना और ध्यान से पूर्व: ध्यान (Meditation) में बैठने से पहले इस भजन को सुनने से मन संसार की चिंताओं से मुक्त होकर एकाग्र होने लगता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशिष्ट साकार देवी-देवता को समर्पित न होकर, निराकार परमेश्वर (निर्गुण ब्रह्म) और 'सत्य' को समर्पित है। यह कबीरपंथ की विचारधारा से अत्यधिक प्रभावित है। संत कबीरदास जी ने अपने जीवनकाल में सदैव बाह्य आडंबरों का खंडन किया और मानव को आंतरिक शुद्धि तथा जीवन की नश्वरता के प्रति सचेत किया। इस भजन की शैली और शब्द विन्यास कबीर के दोहे और उनकी साखियों से मेल खाते हैं, जो आत्मा को परमात्मा से मिलाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की रचना लोक-परंपरा और संत-साहित्य के समन्वय से हुई है। भारत के ग्रामीण अंचलों में सदियों से गाए जाने वाले निर्गुणी भजनों की श्रेणी में यह शीर्ष स्थान रखता है। संतों ने देखा कि मनुष्य माया के वशीभूत होकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है और पाप कर्मों में लिप्त हो जाता है। इसी अज्ञानता को दूर करने के लिए इस प्रकार के भजनों की रचना की गई, ताकि संगीत के माध्यम से अत्यंत गूढ़ दार्शनिक सत्यों को जन-साधारण तक पहुँचाया जा सके।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें राजस्थानी, भोजपुरी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है, जिसे 'सधुक्कड़ी' या संतों की भाषा कहा जाता है। इसमें प्रयुक्त रूपक और उपमाएं अत्यंत सजीव हैं। जैसे शरीर को 'माटी का पुतला' कहना और संसार को 'चार दिनों का मेला' कहना, अत्यंत प्रभावशाली साहित्यिक बिंब प्रस्तुत करते हैं। इसकी लयबद्धता और गेयता इतनी सहज है कि इसे किसी भी साधारण वाद्य यंत्र जैसे इकतारा, खड़ताल या ढोलक के साथ आसानी से गाया जा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:
- अहंकार का त्याग: जब हमारा शरीर ही हमारा नहीं है और इसे मिट्टी में मिल जाना है, तो फिर किस बात का घमंड? भजन हमें विनम्रता सिखाता है।
- समय का सदुपयोग: जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए व्यर्थ के विवादों और सांसारिक प्रपंचों में समय गंवाने के बजाय ईश्वर भक्ति और परोपकार में समय लगाना चाहिए।
- सत्य की स्वीकार्यता: मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा और अटल सत्य है। इसे सहर्ष स्वीकार करने से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
- आंतरिक धन का संचय: भौतिक संपदा यहीं छूट जाएगी, इसलिए दया, करुणा, प्रेम और सेवा रूपी आध्यात्मिक धन का संचय करें।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| विधि का विधान | विधाता या प्रकृति का अटल नियम | सृष्टि का शाश्वत नियम जिसे बदला नहीं जा सकता। |
| माटी का पुतला | मिट्टी से बना शरीर | पंचतत्वों से निर्मित नश्वर मानव शरीर। |
| रंक | अत्यंत निर्धन या गरीब व्यक्ति | भौतिक रूप से साधनहीन मनुष्य। |
| काल के गाल | मृत्यु के मुख में | समय या मृत्यु का ग्रास बन जाना। |
| सुमिरन | ईश्वर का नाम स्मरण या ध्यान | परमात्मा की निरंतर आराधना और चिंतन। |
| सत्कर्म | अच्छे और परोपकारी कार्य | धर्म सम्मत और निस्वार्थ भाव से किए गए कार्य। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा..."
इस संसार का यह शाश्वत नियम है कि जिस भी वस्तु या जीव की उत्पत्ति हुई है, उसका अंत निश्चित है। कोई भी यहाँ सदैव के लिए नहीं रह सकता।
"ये तन है माटी का पुतला मिट्टी में मिल जाएगा..."
हमारा यह भौतिक शरीर मिट्टी के एक खिलौने की तरह है। जैसे मिट्टी का खिलौना टूटने पर पुनः मिट्टी बन जाता है, वैसे ही मृत्यु के पश्चात यह शरीर पंचतत्वों में विलीन हो जाता है।
"ये सांसें हैं जब तक रिश्ते सारे तब तक..."
संसार के सभी संबंध, माता-पिता, भाई-बहन, मित्र और जीवनसाथी, केवल तब तक ही हमारे साथ हैं जब तक हमारे भीतर प्राण चल रहे हैं। सांसों के रुकते ही सारे संबंध समाप्त हो जाते हैं।
"ये चार दिनों का मेला आना जाना है अकेला..."
यह संसार एक अस्थाई मेले की तरह है जहाँ लोग कुछ समय के लिए एकत्रित होते हैं। मनुष्य इस संसार में अकेला ही जन्म लेता है और यहाँ से प्रस्थान भी अकेले ही करता है।
"राजा रंक हो चाहे फकीरा काल के गाल समाएगा..."
मृत्यु अत्यंत निष्पक्ष है। वह किसी अमीर राजा, गरीब भिखारी या तपस्वी फकीर में अंतर नहीं करती। समय आने पर सभी को काल के मुख में जाना ही पड़ता है।
"कर ले प्रभु का सुमिरन बंदे जीवन सफल हो जाएगा..."
इसलिए, हे मनुष्य! इस अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ न गंवा और भगवान के नाम का स्मरण कर, जिससे तेरी आत्मा का कल्याण हो सके।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता के विषय में जो उपदेश दिया है, वह इस भजन के मूल भाव से पूर्णतः मेल खाता है:
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
अर्थ: क्योंकि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस बिना उपाय वाले विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि मृत्यु जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा है, और इस सत्य को स्वीकार करके ही हम भयमुक्त हो सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप हमारे भगवद गीता श्लोक संग्रह को पढ़ सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | ये विधि का विधान है जो आया है सो जाएगा |
|---|---|
| मुख्य विषय | जीवन की नश्वरता, वैराग्य, काल चक्र, ईश्वर सुमिरन |
| काव्य शैली | निर्गुणी भजन (संत परंपरा) |
| भाषा | सरल हिंदी (सधुक्कड़ी मिश्रित) |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, संध्या आरती, आध्यात्मिक प्रवचन, ध्यान साधना |
| मुख्य संदेश | सत्कर्म करें, अहंकार का त्याग करें और प्रभु भक्ति में मन लगाएं |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के दार्शनिक पहलुओं का विश्लेषण करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषदों और कबीर साहेब की साखियों का संदर्भ लिया गया है। इस सामग्री का उद्देश्य पाठकों को भारतीय संत परंपरा के अमूल्य ज्ञान से परिचित कराना और उनके जीवन में सकारात्मक व आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास करना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 27 - आत्मा और शरीर का विवेचन)
- कबीर ग्रंथावली (वैराग्य और निर्गुण पद खंड)
- भारतीय संत परंपरा और लोक भजन संग्रह
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