भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे भजन इन हिंदी लिरिक्स

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"मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे" एक अत्यंत भावपूर्ण और विरह रस से ओत-प्रोत प्रसिद्ध कृष्ण भजन है। यह भजन ब्रजमंडल के उस मार्मिक क्षण को दर्शाता है जब भगवान श्रीकृष्ण गोकुल और वृंदावन को छोड़कर अक्रूर जी के साथ मथुरा प्रस्थान कर रहे थे। इस समय राधा जी और समस्त गोपियों का हृदय विरह की अग्नि में जल रहा था। वैष्णव भक्ति परंपरा में 'विरह भाव' या 'महाभाव' को भक्ति की सर्वोच्च अवस्था माना गया है, जहाँ भक्त अपने आराध्य के वियोग में तड़पता है और अंततः मानसिक रूप से उनके साथ एकाकार हो जाता है। प्रस्तुत भजन में राधा रानी की करुण पुकार, यमुना के तट, सूने पड़े निधिवन और कदम्ब के वृक्षों की उदासी का सजीव चित्रण है। यह भजन मुख्य रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी, शरद पूर्णिमा और कार्तिक मास के पावन अवसरों पर मंदिरों और सत्संगों में गाया जाता है। इसके गायन से साधक के हृदय में अनन्य प्रेम और समर्पण का भाव जाग्रत होता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे

मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे,
तुम ही हो मेरी सांझ सवेरे तेरी राधा रो रो पुकारे।

ये बंसी वट और ये कुञ्ज गलियां,
सुना है वृंदावन ये तुझ बिन कन्हिया,
आके निधि वन में रास रचा रे,
तेरे कदम भी न अब लगते प्यारे,
मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे।

ओ ना हम जियेगे न तुम जी सको गे,
ये खुशियों के मोसम न फिर मिल सकेगे,
मत ना ऐसे तू नजरे चुरा रे,
आजा यमुना पे गईआ चराए,
मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे।

ओ गोविन्द गिरधर मोहन छलीया,
जब जाना ही है तो फिर पकड़ो क्यों बहिया,
हनी भी अब तो कैसे जिए रे,
तेरे दुरी से मीठा तो विष रे,
मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे !!

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मुख्य भाव 'विरह' और 'अनन्य समर्पण' है। जब श्रीकृष्ण कंस के निमंत्रण पर मथुरा जाने के लिए रथ पर सवार होते हैं, तब राधा जी और गोपियाँ उनके रथ के सामने खड़ी हो जाती हैं। वे कन्हैया से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें छोड़कर न जाएं।

भजन की शुरुआत में राधा जी कहती हैं कि हे सांवरिया! तुम मथुरा मत जाओ, तुम्हारे बिना तुम्हारी राधा रो-रोकर बेहाल हो रही है। तुम ही मेरे जीवन का आधार हो, मेरी सुबह और शाम सिर्फ तुमसे ही शुरू और खत्म होती है। तुम्हारे बिना वृंदावन की ये पवित्र कुंज गलियां, बंसीवट और यमुना का किनारा सब सूना हो जाएगा। निधिवन में जो रासलीला रची जाती थी, वह अब तुम्हारे बिना असंभव है।

आगे के अंतरे में राधा जी कहती हैं कि यदि तुम चले गए तो हम तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह पाएंगी और तुम भी हमारे बिना सुखी नहीं रह सकोगे। यह प्रेम का अटूट बंधन है। वे कन्हैया से कहती हैं कि हमसे नजरें मत चुराओ और एक बार फिर से यमुना किनारे गैया चराने के लिए वापस आ जाओ। अंतिम पंक्तियों में वे उलाहना देते हुए कहती हैं कि हे गोविंद, हे गिरधर! यदि तुम्हें हमें छोड़कर जाना ही था, तो तुमने हमारा हाथ क्यों पकड़ा था? तुम्हारे वियोग की इस पीड़ा से तो विष पीना कहीं अधिक मीठा और आसान है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • विरह भक्ति का चरमोत्कर्ष: वैष्णव दर्शन में विरह को मिलन से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि विरह में भक्त का चित्त हर क्षण केवल अपने आराध्य में ही लगा रहता है।
  • ब्रज संस्कृति का सजीव चित्रण: भजन में बंसीवट, कुंज गलियां, निधिवन, यमुना तट और गैया चराने जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग किया गया है जो ब्रज की पावन भूमि की याद दिलाते हैं।
  • समर्पण भाव: राधा जी का यह विलाप सांसारिक स्वार्थ से परे, निश्छल और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं, परंतु यदि इसे विशेष अवसरों पर गाया जाए तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।

सर्वोत्तम समय: संध्या काल के समय या रात्रि जागरण (सत्संग) में इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी माना जाता है।

गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में शांत और करुणामयी भाव होना चाहिए। आँखों को बंद करके वृंदावन की कुंज गलियों और राधा-कृष्ण के विरह दृश्य का ध्यान करना चाहिए। इसे ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ करुण स्वर में गाना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और उनकी आल्हादिनी शक्ति श्री राधा रानी को समर्पित है। ब्रज की भक्ति परंपरा में राधा जी को कृष्ण की आत्मा माना गया है। संतों का मानना है कि कृष्ण को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग राधा रानी की कृपा है। इस भजन में व्यक्त भाव चैतन्य महाप्रभु की 'गौरांग भक्ति' और अष्टछाप के कवियों जैसे सूरदास जी के 'भ्रमरगीत' के विरह भाव से मेल खाता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध से प्रेरित है। जब कंस के आदेश पर अक्रूर जी श्रीकृष्ण और बलराम को लेने वृंदावन आते हैं, तब पूरे ब्रज में शोक की लहर दौड़ जाती है। गोपियाँ रथ के पहियों को पकड़ लेती हैं और गायें घास चरना बंद कर देती हैं। इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना को आधुनिक कवियों ने इस सुमधुर भजन के रूप में पिरोया है, जिसे सुनकर आज भी भक्तों की आँखें नम हो जाती हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-प्रचलित हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट है (जैसे- सांवरिया, कन्हिया, बहिया, गैया)। इसकी काव्य शैली 'गीति काव्य' है, जिसमें लयबद्धता और गेयता का अद्भुत गुण है। इसमें 'करुण रस' और 'श्रृंगार रस' (विप्रलम्भ श्रृंगार) का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  • अनन्य निष्ठा: जैसे राधा जी का प्रेम केवल कृष्ण के लिए है, वैसे ही हमारा मन भी केवल ईश्वर के चरणों में लगा होना चाहिए।
  • संसार की नश्वरता: जब भगवान स्वयं वृंदावन छोड़कर चले गए, तो यह दर्शाता है कि इस संसार में कोई भी संयोग स्थायी नहीं है। वियोग और परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है।
  • धैर्य और विश्वास: विरह की अग्नि में तपकर ही आत्मा शुद्ध होती है और परमात्मा से मिलन के योग्य बनती है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
सांवरिया सांवले रंग वाले श्रीकृष्ण भक्तों के मन को मोहने वाले परमात्मा
बंसी वट वह वटवृक्ष जहाँ कृष्ण बंसी बजाते थे दिव्य नाद और मिलन का पावन स्थान
कुञ्ज गलियां वृंदावन की संकरी लता-कुंज वाली गलियां लीला स्थली जहाँ भक्ति का वास है
निधि वन वृंदावन का वह वन जहाँ आज भी रास होता है रहस्यमयी और अत्यंत पवित्र साधना स्थल
बहिया बाँह या हाथ शरण में लेना या सुरक्षा का संकल्प
विष जहर ईश्वर के वियोग में सांसारिक जीवन की व्यर्थता

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे..."
हे सांवले कन्हैया! तुम हमें छोड़कर मथुरा मत जाओ। तुम्हारे जाने की बात सुनकर तुम्हारी राधा का हृदय अत्यंत दुखी है और वह अश्रुधारा बहाते हुए तुम्हें पुकार रही है।

"ये बंसी वट और ये कुञ्ज गलियां, सुना है वृंदावन ये तुझ बिन कन्हिया..."
यह बंसीवट वृक्ष जहाँ तुम मधुर तान छेड़ते थे, और ये हरी-भरी कुंज गलियां तुम्हारे बिना सूनी हो जाएंगी। तुम्हारे बिना इस पूरे वृंदावन का सौंदर्य समाप्त हो जाएगा।

"ओ ना हम जियेगे न तुम जी सको गे, ये खुशियों के मोसम न फिर मिल सकेगे..."
हमारा और तुम्हारा संबंध अटूट है। तुम्हारे बिना हमारा जीवन समाप्त हो जाएगा, और हमारे इस दुःख को देखकर तुम भी सुखी नहीं रह पाओगे। यह आनंदमयी समय फिर कभी लौटकर नहीं आएगा।

"ओ गोविन्द गिरधर मोहन छलीया, जब जाना ही है तो फिर पकड़ो क्यों बहिया..."
हे गोविंद! हे दुखों को हरने वाले गिरधर! यदि अंत में तुम्हें हमें इस प्रकार अकेला छोड़कर जाना ही था, तो तुमने प्रारंभ में हमारा हाथ क्यों थामा था? तुमने हमें अपना क्यों बनाया था?

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए निम्नलिखित मंत्रों और श्लोकों का जप किया जा सकता है:

"हे कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि यादवनन्दन।
आक्रीडामारम्य राधया परितापयन्॥"

अर्थात: हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे यदुनंदन! तुम कहाँ हो? राधा जी के साथ रास रचने वाले प्रभु, हमारे हृदय के संताप को दूर करो।

इसके अतिरिक्त, भगवान कृष्ण की प्रसन्नता के लिए मधुराष्टकम स्तोत्र का पाठ भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम मत जा रे सांवरिया तू मथुरा तेरी राधा रो रो पुकारे
मुख्य आराध्य भगवान श्रीकृष्ण एवं श्री राधा रानी
भक्ति रस करुण रस, विप्रलम्भ श्रृंगार (विरह भाव)
मुख्य भाषा सरल हिंदी (ब्रजभाषा के शब्दों सहित)
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, राधाष्टमी, शरद पूर्णिमा, सत्संग, संध्या आरती
मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य भाव 'विरह रस' और 'अनन्य प्रेम' है। यह राधा जी और गोपियों के उस दुःख को दर्शाता है जब श्रीकृष्ण उन्हें छोड़कर मथुरा जा रहे थे।

इस भजन को संध्या काल के समय, रात्रि सत्संग या शांत वातावरण में गाना सबसे उत्तम माना जाता है, जिससे मन में एकाग्रता और भक्ति भाव जाग्रत होता है।

'बंसी वट' वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण बंसी बजाकर गोपियों को बुलाते थे, और 'निधिवन' वह अत्यंत पवित्र स्थान है जहाँ महारास होता था। ये दोनों स्थान दिव्य लीलाओं के प्रतीक हैं।

हाँ, जन्माष्टमी, राधाष्टमी और विशेषकर कार्तिक मास के दौरान इस भजन का गायन मंदिरों और घरों में बड़े चाव से किया जाता है।

वैष्णव संप्रदाय में विरह भक्ति को सर्वोच्च माना गया है। संतों के अनुसार, वियोग में भक्त का मन हर क्षण केवल भगवान का ही स्मरण करता है, जिससे आत्मा का शुद्धिकरण होता है।

इस भजन को गाते समय साधक को स्वयं को राधा जी या ब्रजवासियों के स्थान पर रखकर, भगवान के वियोग की करुणा का अनुभव करते हुए पूर्ण समर्पण के साथ गाना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रसंगों और ब्रज की पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक सामग्री पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - अक्रूर आगमन प्रसंग)
  • कल्याण (गीताप्रेस गोरखपुर) - श्रीकृष्ण अंक
  • ब्रज भक्ति विलास एवं पारंपरिक संकीर्तन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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