"अपना मुझे बना लो मेरा और ना सहारा" एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी श्री कृष्ण भजन है, जो जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य शरणागति और करुण पुकार को अभिव्यक्त करता है। इस भजन में भक्त सांसारिक मोह-माया, स्वार्थी संबंधों और जीवन के संघर्षों से थककर भगवान श्री कृष्ण के चरणों में आश्रय मांगता है। यह भजन 'विनय' और 'समर्पण' के भाव से ओतप्रोत है, जो मध्यकालीन संत-काव्य परंपरा की याद दिलाता है। जब मनुष्य संसार की निष्ठुरता और क्षणभंगुरता का अनुभव करता है, तब उसका मन स्वाभाविक रूप से उस शाश्वत सत्ता की ओर मुड़ता है जो कभी साथ नहीं छोड़ती। इस भजन का गायन विशेष रूप से संध्या आरती, सत्संग, और व्यक्तिगत साधना के समय किया जाता है, जिससे साधक के हृदय में वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
स्थायी (मुखड़ा):
अपना मुझे बना लो मेरा और ना सहारा |
चरणों से दूर रहकर कैसे करूँ गुज़ारा ||
अंतरा १:
दिल की किसे सुनाएँ ख़ुदग़र्ज़ यार सारे |
जिसको भी अपना समझा उसने ही ताने मारे |
सुन भी लो अब कन्हैया कोई नहीं हमारा ||
अंतरा २:
खुशियाँ थी जिनसे बाँटी ऐसा भी मोड़ आया |
ज़ख़्मों पे जख्म देकर दिल को बहुत रुलाया |
तेरे होते मैं कन्हैया फिरता हूँ बेसहारा ||
अंतरा ३:
मेरी जिंदगी कन्हैया अब है तेरे भरोसे |
दुनिया मेरी तुम्ही हो तू ही तो पाले पोशे |
दीपक है आस तेरी तुझको ही है पुकारा ||
समर्पण (तिहाई):
अपना मुझे बना लो मेरा और ना सहारा |
चरणों से दूर रहकर कैसे करूँ गुज़ारा ||
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन जीवात्मा की उस अवस्था का चित्रण करता है जब वह संसार के झूठे संबंधों से विरक्त होकर अपने वास्तविक स्वामी, परमात्मा की ओर उन्मुख होती है। भजन की शुरुआत ही एक आर्त पुकार से होती है—"अपना मुझे बना लो"। भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि हे कन्हैया! इस विशाल और निष्ठुर संसार में आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा रक्षक या सहारा नहीं है। आपके पावन चरणों से दूर रहकर मेरा जीवन व्यर्थ है, और मैं उनके बिना एक पल भी गुज़ारा नहीं कर सकता।
भजन के प्रथम अंतरे में भक्त संसार की वास्तविकता को उजागर करता है। वह कहता है कि इस संसार में सभी मित्र और संबंधी स्वार्थी (ख़ुदग़र्ज़) हैं। जब तक सुख था, सब साथ थे, परंतु दुःख आते ही सबने मुंह मोड़ लिया। जिसे भी अपना माना, उसने केवल उपहास और ताने ही दिए। ऐसे में भक्त अपने हृदय की पीड़ा केवल अपने आराध्य श्री कृष्ण को सुनाता है।
द्वितीय अंतरे में विश्वासघात की गहरी वेदना व्यक्त हुई है। जिन लोगों के साथ भक्त ने अपने जीवन की खुशियाँ बांटी थीं, उन्होंने ही संकट के समय उसे गहरे घाव दिए। भक्त कहता है कि हे कन्हैया, आपके रहते हुए भी मैं इस प्रकार बेसहारा भटक रहा हूँ, यह मेरे प्रारब्ध और आपकी करुणा की परीक्षा है। अंतिम अंतरे में भक्त पूर्ण रूप से भगवान पर निर्भर हो जाता है। वह स्वीकार करता है कि उसका जीवन, उसका पालन-पोषण और उसकी अंतिम आशा केवल भगवान ही हैं। जैसे अंधकार में एक छोटा सा दीपक प्रकाश की किरण देता है, वैसे ही भक्त के जीवन में भगवान की आस ही एकमात्र सहारा है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सामान्य गीतों से अलग कर एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक रचना बनाती हैं:
- अनन्य शरणागति (Absolute Surrender): यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' के सिद्धांत को चरितार्थ करता है। भक्त अपने समस्त अहंकार को त्यागकर भगवान की शरण में आता है।
- संसार की क्षणभंगुरता का बोध: भजन के शब्द मनुष्य को यह सोचने पर विवश करते हैं कि सांसारिक संबंध अस्थायी हैं और केवल ईश्वर का प्रेम ही शाश्वत है।
- करुण रस की प्रधानता: इसमें भक्त की करुणा और विरह का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण है जो सुनने वाले की आँखों में अश्रु ला देता है।
- सरल और सुगम भाषा: जटिल दार्शनिक शब्दों के स्थान पर इसमें अत्यंत सरल और लोकप्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिससे यह सीधे हृदय को छूता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस विशिष्ट भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन संध्याकाल की पूजा के समय या रात्रि को सोने से पूर्व करना अत्यंत शांतिदायक होता है। जब दिनभर की भागदौड़ के बाद मन अशांत हो, तब इस भजन को सुनने से मानसिक शांति मिलती है।
गायन की विधि:
- सर्वप्रथम शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठें। भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख एक दीपक प्रज्वलित करें।
- अपने नेत्र बंद करें और मन में यह भाव लाएं कि आप साक्षात भगवान कन्हैया के सम्मुख बैठे हैं।
- भजन को अत्यंत धीमी और मधुर लय में गाएं। प्रत्येक शब्द के अर्थ को महसूस करते हुए अपने अश्रुओं को बहने दें, क्योंकि अश्रु ही भक्ति की पराकाष्ठा हैं।
- गायन के पश्चात कुछ मिनट मौन रहकर भगवान के नाम का मानसिक जप करें।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन भगवान श्री कृष्ण (कन्हैया) को समर्पित है। सनातन धर्म में श्री कृष्ण को 'करुणासिंधु' और 'दीनबंधु' कहा गया है। वे अपने भक्तों की पुकार कभी अनसुनी नहीं करते। इस भजन का भाव मध्यकालीन संत कवियों जैसे सूरदास, मीराबाई और रस
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