भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

गोरा बोले सुना स्वामी भजन इन हिंदी

पढ़ें गोरा बोले सुना स्वामी भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"गोरा बोले सुणो स्वामी" (गोरा बोले सुना स्वामी) सनातन धर्म की समृद्ध लोक-भजन परंपरा का एक अत्यंत मधुर, भावपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध भजन है। यह भजन मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती (गौरा) के बीच के पावन संवाद पर आधारित है। इस भजन में गृहस्थ जीवन और वैराग्य के अद्भुत समन्वय को दर्शाया गया है, जहां आदि-शक्ति माता पार्वती अपने आराध्य और पति भगवान शिव से संवाद करती हैं। इस संकीर्तन का गायन भक्तों के हृदय में अनन्य प्रेम, पूर्ण शरणागति और दांपत्य जीवन की पवित्रता का संचार करता है। विशेष रूप से सावन मास, महाशिवरात्रि और सोमवार के पावन अवसरों पर इस भजन का श्रवण और कीर्तन साधक के अंतर्मन को शिव-शक्ति की दिव्य ऊर्जा से सराबोर कर देता है। इस विस्तृत लेख में हम इस भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथाओं का गहन अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

|| गोरा बोले सुणो स्वामी ||

(कोरस/मुखड़ा)
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी।
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

(अंतरा 1)
थे तो रमो भंगिया के संग, म्हाने भी रंग में रंगाई दो जी।
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

(अंतरा 2)
शीश पै थारे गंगा बिराजे, जटा में मुकुट सजाई दो जी।
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

(अंतरा 3)
गल में थारे मुंडमाला सोहे, म्हाने भी कंठी पहनाई दो जी।
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

(अंतरा 4)
अंग भभूत रमाए स्वामी, म्हाने भी चंदन लगाई दो जी।
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

(अंतरा 5)
नंदी की सवारी सोहे थारी, म्हाने भी संग में बिठाई लो जी।
गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥
भोलानाथ अमली, म्हाने कैलास घुमाई दो जी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह पावन भजन "गोरा बोले सुणो स्वामी" शिव और शक्ति के अनन्य संबंध को दर्शाता है। यहाँ माता पार्वती (गोरा) अपने पति भगवान शिव (स्वामी) से मनुहार कर रही हैं। वे कहती हैं कि हे स्वामी! आप तो सदैव ध्यानमग्न रहते हैं, अपनी ही मस्ती में लीन रहते हैं, कृपा करके मुझे भी अपने पावन धाम कैलाश पर्वत का भ्रमण कराइए।

इस भजन का गहरा आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जीवात्मा (पार्वती) परमात्मा (शिव) से प्रार्थना कर रही है कि उसे इस संसार के बंधनों से मुक्त कर अपने परमधाम (कैलाश) की ओर ले चलें। माता पार्वती भगवान शिव के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहती हैं कि आपके मस्तक पर गंगा जी विराजमान हैं, आपके गले में मुंडों की माला है और आपके पूरे शरीर पर भस्म रमी हुई है। वे भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि वे भी उन्हें इसी रंग में रंग दें, अर्थात उन्हें भी अपनी भक्ति का अमूल्य वरदान प्रदान करें।

यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह साधक की उस तड़प को दर्शाता है जिसमें वह अपने आराध्य के समान ही वैराग्य और भक्ति के रंग में रंग जाना चाहता है। जब माता पार्वती कहती हैं कि "म्हाने भी रंग में रंगाई दो जी", तो इसका अर्थ है कि वे शिवत्व को प्राप्त करना चाहती हैं, जो कि प्रत्येक जीव का अंतिम लक्ष्य है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सनातन समाज में अत्यंत लोकप्रिय बनाती हैं:

  • शिव-शक्ति का मधुर संवाद: यह भजन भगवान शिव और माता पार्वती के बीच के मधुर, आत्मीय और दिव्य संवाद को प्रस्तुत करता है। यह दांपत्य जीवन में आदर और प्रेम का संदेश देता है।
  • वैराग्य और गृहस्थ का मिलन: भगवान शिव वैराग्य के प्रतीक हैं और माता पार्वती गृहस्थ जीवन की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह भजन दर्शाता है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी वैराग्य और ईश्वर भक्ति को प्राप्त किया जा सकता है।
  • शरणागति का भाव: भजन की प्रत्येक पंक्ति में माता पार्वती शिव के चरणों में पूर्ण समर्पण की इच्छा व्यक्त करती हैं।
  • लोक संस्कृति का प्रभाव: इस भजन में राजस्थानी और उत्तर भारतीय लोक संगीत की मिठास है, जो इसे गाने और सुनने में अत्यंत सुगम और आनंदमयी बनाती है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान शिव की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष समय और विधियां अत्यंत फलदायी मानी गई हैं:

  • सावन का पवित्र महीना: श्रावण मास में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा के समय इस भजन का गायन अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • सोमवार व्रत: सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर में या घर के पूजा स्थल पर धूप-दीप जलाकर इस भजन को गाने से मानसिक शांति मिलती है।
  • महाशिवरात्रि उत्सव: महाशिवरात्रि की रात्रि जागरण के समय इस भजन का सामूहिक कीर्तन भक्तों को शिवमय कर देता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम के साथ पारंपरिक लोक धुन पर गाया जाना चाहिए। गाते समय मन में शिव-पार्वती की छवि का ध्यान करना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से देवों के देव महादेव, भगवान शिव और जगत जननी माता पार्वती को समर्पित है। सनातन परंपरा में शिव और पार्वती को आदि-दम्पति माना गया है। वे संपूर्ण सृष्टि के माता-पिता हैं। इस भजन के रचयिता के रूप में किसी विशिष्ट संत का नाम तो नहीं मिलता, क्योंकि यह एक पारंपरिक लोक भजन है जो सदियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता रहा है। राजस्थान और हरियाणा के लोक कलाकारों ने इस भजन को जीवित रखने और इसे जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि कैलाश पर्वत और शिव-पार्वती के गृहस्थ जीवन से जुड़ी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती राजा हिमालय की पुत्री थीं और उन्होंने अत्यंत कठिन तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था। विवाह के पश्चात जब वे कैलाश पर्वत पर आईं, तो वहां का वातावरण अत्यंत शांत, वैराग्यपूर्ण और अलौकिक था। यह भजन उसी पृष्ठभूमि को दर्शाता है जहां माता पार्वती भगवान शिव से कैलाश की महिमा को जानने और उनके दिव्य स्वरूप में लीन होने की इच्छा व्यक्त करती हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा मुख्य रूप से राजस्थानी मिश्रित हिंदी (ढूंढाड़ी या मारवाड़ी का प्रभाव) है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, सुबोध और संवादपरक (Dialogue Style) है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे "म्हाने" (मुझे), "थारे" (आपके), "घुमाई दो" (घुमा दीजिए) लोक भाषा की मिठास को प्रदर्शित करते हैं। भजन में अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, जो इसके संगीतात्मक प्रवाह को और अधिक बढ़ा देता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख मिलती हैं:

  1. सच्चा सौंदर्य आंतरिक है: भगवान शिव शरीर पर भस्म लगाते हैं और मुंडमाला पहनते हैं, फिर भी वे परम सुंदर हैं। यह हमें सिखाता है कि बाहरी चकाचौंध की अपेक्षा आंतरिक पवित्रता अधिक महत्वपूर्ण है।
  2. समर्पण की भावना: माता पार्वती की भांति हमें भी अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण करना चाहिए।
  3. सहभागिता: दांपत्य जीवन में पति और पत्नी को एक-दूसरे के आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में सहभागी होना चाहिए।
  4. सादा जीवन, उच्च विचार: कैलाश पर्वत का एकांत और शिव का सादा जीवन हमें भौतिकवादी युग में सादगी से जीने की प्रेरणा देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
गोरा माता पार्वती (गौरी) आदि-शक्ति, जीवात्मा का प्रतीक
स्वामी पति/ईश्वर (भगवान शिव) परमेश्वर, जगत के स्वामी
अमली मस्ती में रहने वाले / नशे में लीन ब्रह्मानंद और समाधि में लीन रहने वाले
कैलास कैलाश पर्वत परमधाम, जहां केवल शांति और शिवत्व है
भंगिया भांग (एक जड़ी-बूटी) संसार से विरक्ति और ईश्वर के नाम का नशा
भभूत राख/भस्म नश्वरता का प्रतीक, वैराग्य का सूचक

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"गोरा बोले सुणो स्वामी, म्हाने कैलास घुमाई दो जी..."
माता पार्वती अपने स्वामी शिव से कहती हैं कि हे प्रभु, मुझे अपने पावन धाम कैलाश की यात्रा कराइए। मुझे उस परम शांति का अनुभव कराइए जो केवल आपके सानिध्य में ही संभव है।

"थे तो रमो भंगिया के संग, म्हाने भी रंग में रंगाई दो जी..."
आप तो सदैव भांग के नशे (अर्थात ब्रह्मानंद की समाधि) में लीन रहते हैं। कृपा करके मुझे भी अपनी उस दिव्य भक्ति के रंग में रंग दीजिए ताकि मैं भी इस संसार को भूलकर केवल आपमें ही लीन रहूं।

"शीश पै थारे गंगा बिराजे, जटा में मुकुट सजाई दो जी..."
आपके शीश पर पतित-पावनी गंगा जी विराजमान हैं जो ज्ञान का प्रतीक हैं। आपकी जटाएं अत्यंत सुंदर हैं। मुझे भी उस ज्ञान रूपी गंगा का आशीर्वाद प्रदान कीजिए।

"गल में थारे मुंडमाला सोहे, म्हाने भी कंठी पहनाई दो जी..."
आपके गले में मुंडों की माला सुशोभित है जो काल पर आपकी विजय को दर्शाती है। मुझे भी अपनी भक्ति की कंठी माला पहनाकर अपना दास बना लीजिए।

"अंग भभूत रमाए स्वामी, म्हाने भी चंदन लगाई दो जी..."
आप अपने पूरे शरीर पर भस्म लगाते हैं जो इस संसार की नश्वरता को दर्शाती है। मेरे मस्तक पर अपनी कृपा का चंदन लगा दीजिए ताकि मेरा मन शीतल और शांत रहे।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन के पश्चात या पूर्व भगवान शिव और माता पार्वती के इस कल्याणकारी श्लोक का पाठ करना अत्यंत मंगलकारी माना जाता है:

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

अर्थ: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, इस संसार के सार हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी (पार्वती) सहित मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें, उन्हें मैं नमन करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण क्षेत्र महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम गोरा बोले सुणो स्वामी (Gora Bole Suna Swami)
मुख्य आराध्य भगवान शिव एवं माता पार्वती (शिव-शक्ति)
भजन की भाषा राजस्थानी मिश्रित सरल हिंदी (लोक भाषा)
मुख्य रस/भाव भक्ति रस, दांपत्य भाव, शरणागति
उपयुक्त अवसर सावन सोमवार, महाशिवरात्रि, शिव-पार्वती विवाह उत्सव
संगीत शैली पारंपरिक लोक संगीत (Folk Bhajan)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति है। यह दर्शाता है कि जीवात्मा (पार्वती) किस प्रकार परमात्मा (शिव) के रंग में रंग जाने के लिए व्याकुल है।

'अमली' शब्द का अर्थ है जो अपनी ही मस्ती या नशे में लीन रहता है। यहाँ इसका आध्यात्मिक अर्थ भगवान शिव की समाधि और ब्रह्मानंद की अवस्था से है।

यह भजन मुख्य रूप से राजस्थानी लोक भाषा और सरल हिंदी के मिश्रण में रचित है, जो इसे गाने में बहुत मधुर बनाता है।

इस भजन को गाने के लिए सोमवार का दिन, सावन का महीना और महाशिवरात्रि का पर्व सबसे उत्तम माना जाता है।

हाँ, यह भजन शिव पुराण में वर्णित शिव-पार्वती के विवाह के उपरांत कैलाश पर्वत पर उनके सुखद दांपत्य जीवन और आध्यात्मिक संवादों की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

कैलाश पर्वत भगवान शिव का निवास स्थान है। आध्यात्मिक रूप से कैलाश को परम शांति, मोक्ष और उच्च चेतना का प्रतीक माना गया है।

इस भजन को सुनते समय मन में पूर्ण समर्पण, श्रद्धा, और शिव-पार्वती के प्रति अनन्य प्रेम का भाव रखना चाहिए।

हाँ, यह भजन गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी ईश्वर भक्ति और वैराग्य के संतुलन को बनाए रखने की अद्भुत प्रेरणा देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ, अर्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण को विभिन्न प्रामाणिक लोक-साहित्य स्रोतों, शिव पुराण के प्रसंगों और पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों के आधार पर संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और प्रामाणिक जानकारी पहुंचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव पुराण: शिव-पार्वती विवाह और कैलाश निवास के प्रसंग।
  • उत्तर भारतीय लोक साहित्य: पारंपरिक राजस्थानी भजन संग्रह।
  • श्रीमद्भगवद्गीता: भक्ति योग और शरणागति के सिद्धांत।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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