१. द्वितीय ज्योतिर्लिंग श्री मल्लिकार्जुन: तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व
भारत के दक्षिणी प्रायद्वीप में आंध्र प्रदेश राज्य के नंध्याल (कुरनूल) जिले में कृष्णा नदी के पावन तट पर नल्लामाला के सघन पर्वतीय वनों में स्थित श्री मल्लिकार्जुन स्वामी ज्योतिर्लिंग मंदिर, श्रीशैलम (Shri Mallikarjuna Swamy Jyotirlinga Temple, Srisailam) सनातन धर्म के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में द्वितीय और अत्यंत दुर्लभ तीर्थ है। इसे शास्त्रों में 'दक्षिण का कैलाश' (Kailash of the South) कहा गया है।
श्रीशैलम तीर्थ की सबसे महान और अद्वितीय विशेषता यह है कि यह संपूर्ण भारतवर्ष में एकमात्र ऐसा परम पावन क्षेत्र है जहाँ द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक (भगवान मल्लिकार्जुन शिव) और अष्टादश महाशक्तिपीठों में से एक (माँ भ्रमराम्बा देवी) दोनों एक ही मंदिर परिसर में एक साथ प्रतिष्ठित हैं। यहाँ माता सती का 'ग्रीवा' (कंठ/गर्दन) भाग गिरा था। अतः यह शैव और शाक्त दोनों परंपराओं का परम समन्वय तीर्थ माना जाता है।
स्कंद पुराण के श्रीशैल खंड में महर्षि वेदव्यास जी घोषणा करते हैं: 'श्रीशैलशिखरं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते'—अर्थात जो प्राणी श्रीशैलम के पवित्र पर्वत शिखर का श्रद्धापूर्वक केवल दर्शन भी कर लेता है, वह जन्म-मरण के सांसारिक चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। यह पावन क्षेत्र सिद्धों, तपस्वियों, योगियों और आदि शंकराचार्य जी की तपोभूमि रहा है, जहाँ उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध 'शिवांकद स्तोत्र' और 'सौंदर्य लहरी' की रचना की थी।
२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)
शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय १५) में श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य की दो अत्यंत हृदयस्पर्शी कथाएं वर्णित हैं:
॥ कुमार कार्तिकेय का रोष एवं मल्लिकार्जुन का प्राकट्य ॥
जब भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय (स्कंद) के विवाह का प्रसंग आया, तब माता पार्वती और देवाधिदेव महादेव ने शर्त रखी कि 'जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, उसका विवाह पहले होगा।' कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर तुरंत संपूर्ण भूमण्डल की परिक्रमा हेतु उड़ गए। दूसरी ओर, बुद्धि के अधिपति गणेश जी ने अपने माता-पिता (शिव-पार्वती) को साक्षात् संपूर्ण ब्रह्मांड मानकर उनकी सात परिक्रमाएं कर लीं और शास्त्रों के अनुसार विजयी घोषित हुए।
जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटे और उन्होंने गणेश जी का विवाह ऋद्धि-सिद्धि के साथ देखा, तो वे रुष्ट हो गए और माता-पिता के चरण छूकर सदा के लिए क्रौंच पर्वत (श्रीशैलम) पर जाकर एकांत तपस्या करने लगे। पुत्र-वियोग से व्याकुल होकर माता पार्वती और भगवान शिव उन्हें मनाने हेतु श्रीशैलम पहुंचे। परंतु माता-पिता को आता देखकर कार्तिकेय वहाँ से और दूर चले गए।
तब अपने परम प्रिय पुत्र के समीप रहने हेतु देवाधिदेव महादेव ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं प्रतिष्ठित हो गए। माता पार्वती ने 'मल्लिका' (चमेली के पुष्प) का रूप धारण किया और भगवान शिव 'अर्जुन' (श्वेत कांति) बनकर वहाँ नित्य रमण करने लगे। इस प्रकार 'मल्लिका' और 'अर्जुन' के पावन मिलन से यह दिव्य ज्योतिर्लिंग 'मल्लिकार्जुन' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। प्रत्येक अमावस्या को भगवान शिव और प्रत्येक पूर्णिमा को माता पार्वती कार्तिकेय से मिलने यहाँ पधारते हैं।
॥ राजकुमारी चंद्रवती एवं कामधेनु का दुग्धाभिषेक ॥
एक अन्य लोक-कथा के अनुसार चंद्रगुप्त की राजकन्या चंद्रवती अपने राज्य के संकटों से विरक्त होकर श्रीशैलम के जंगलों में रहने लगी। वहाँ उसने देखा कि उसकी एक विशेष कपिला गाय प्रतिदिन एक निश्चित शिला पर जाकर स्वतः अपने स्तनों से दूध की धारा बहाती है। राजकुमारी ने जब उस स्थान की खुदाई कराई, तो वहाँ से साक्षात् ज्योतिर्मय शिवलिंग प्रकट हुआ। राजकुमारी ने वहीं पुष्पों से भगवान की पूजा की और एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे अखंड सौभाग्य और भक्ति का वरदान दिया।
३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम
श्रीशैलम मंदिर का ऐतिहासिक कालक्रम लगभग दो सहस्राब्दियों से अधिक प्राचीन है। दक्षिण भारत के अनेक महान हिंदू राजवंशों ने इस तीर्थ के विस्तार और संवर्धन में अपना सर्वस्व समर्पित किया:
| कालखंड / वर्ष | राजवंश / शासक | ऐतिहासिक योगदान |
|---|---|---|
| प्रथम शताब्दी ईस्वी | सातवाहन राजवंश | शिलालेखों में श्रीशैलम तीर्थ का प्राचीनतम उल्लेख और पूजा संरक्षण। |
| ईस्वी सन् ३००-५०० | इक्ष्वाकु एवं पल्लव राजवंश | मंदिर के प्रारंभिक पाषाण मंडपों और पाताल गंगा की सीढ़ियों का निर्माण। |
| १२वीं-१३वीं शताब्दी | काकतीय राजवंश (रानी रुद्रमादेवी) | मंदिर की विशाल परकोटे की चारदीवारी (प्राकारम) और मुख्य गोपुरम का निर्माण। |
| १४वीं शताब्दी (१३१३) | रेड्डी राजवंश (प्रोलय वेमा रेड्डी) | पाताल गंगा तक उतरने हेतु प्रसिद्ध सोपान मार्ग (Steps Route) का निर्माण। |
| १५१६ ईस्वी | विजयनगर साम्राज्य (महाराजा कृष्णदेवराय) | भव्य स्वर्ण मंडप, मुख्य राजगोपुरम और विस्तृत सभा मंडपों का निर्माण। |
| १६७७ ईस्वी | छत्रपति शिवाजी महाराज | मंदिर के उत्तरी गोपुरम का निर्माण कराया और माँ भ्रमराम्बा की कठोर साधना की। |
छत्रपति शिवाजी महाराज ने १६७७ में अपने दक्षिण विजय अभियान के दौरान श्रीशैलम में डेरा डाला था। उन्होंने माँ भ्रमराम्बा के दर्शन किए और मंदिर में गहन ध्यान लगाया। जनश्रुति के अनुसार माँ भ्रमराम्बा ने प्रसन्न होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दिए थे और अपनी दिव्य 'भवानी तलवार' का तेज प्रदान किया था।
४. मंदिर की वास्तुकला एवं परिसर संरचना (Dravidian Architecture)
श्री मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर विजयनगर एवं द्रविड़ स्थापत्य कला का एक विस्मयकारी उदाहरण है। पूरा मंदिर एक विशाल किले के समान प्रतीत होता है:
- १. विशाल प्राकारम दीवार (The Great Enclosure Wall): मंदिर परिसर लगभग दो हेक्टेयर भूमि पर फैला हुआ है। इसके चारों ओर २० से २६ फीट ऊंची और ६०० फीट लंबी विशाल पत्थर की दीवार बनी है। इस दीवार पर महाभारत, रामायण, शिव पुराण और शिव लीलाओं के सैकड़ों दृश्य अत्यंत बारीक नक्काशी में उकेरे गए हैं।
- २. चार भव्य गोपुरम (Four Towering Gateways): मंदिर में प्रवेश हेतु चारों दिशाओं में ऊंचे गोपुरम बने हैं। पूर्वी दिशा का मुख्य 'कृष्णदेवराय गोपुरम' अपनी भव्यता और मूर्तिकला के लिए विख्यात है। उत्तरी गोपुरम का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा कराया गया था।
- ३. मुख्य गर्भगृह एवं स्वर्ण मंडप: गर्भगृह में छोटा परंतु अत्यंत तेजस्वी स्वयंभू शिवलिंग प्रतिष्ठित है। शिवलिंग के चारों ओर पीतल और चांदी की वेदी है। महाराजा कृष्णदेवराय द्वारा निर्मित गर्भगृह के सामने का मंडप नक्काशीदार स्तंभों पर टिका हुआ है और इसका शिखर स्वर्ण-पत्रों से मढ़ा हुआ है।
- ४. माँ भ्रमराम्बा शक्तिपीठ मंदिर: मल्लिकार्जुन गर्भगृह के पीछे कुछ ऊंचाई पर माँ भ्रमराम्बा का भव्य मंदिर स्थित है। यहाँ माता आठ भुजाओं वाली महिषासुर मर्दिनी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि जब अरुणासुर दैत्य ने उत्पात मचाया था, तब माता ने असंख्य भंवरों (मधुमक्खियों) का रूप धारण कर उसका संहार किया था, इसलिए वे 'भ्रमराम्बा' कहलाईं।
५. दर्शन समय, दैनिक आरती एवं स्पर्श दर्शन (Darshan & Aarti Schedule)
श्रीशैलम मंदिर की एक अत्यंत पावन और दुर्लभ विशेषता 'स्पर्श दर्शन' (Sparsha Darshan) है, जहाँ भक्त गर्भगृह के भीतर जाकर अपने हाथों से साक्षात् ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर सकते हैं और उस पर जल व बिल्वपत्र अर्पित कर सकते हैं:
प्रातः सुप्रभात सेवा एवं मंगलारती
०४:३० AM - ०५:३० AM
सुप्रभातम् पठन, गर्भगृह शुद्धि एवं प्रथम दिव्य महामंगलारती।
सर्वदर्शन एवं स्पर्श दर्शन
०६:०० AM - ०३:३० PM
सामान्य श्रद्धालुओं हेतु दर्शन एवं निर्धारित समय पर स्पर्श दर्शन।
संध्या महाआरती एवं शयनोत्सव
०६:०० PM - १०:०० PM
प्रदोष पूजा, धूप आरती, एकान्त सेवा एवं रात्रि शयन आरती।
स्पर्श दर्शन का शास्त्रीय नियम: स्पर्श दर्शन हेतु पुरुषों के लिए केवल धोती और उत्तरीय (अंगवस्त्रम) तथा महिलाओं के लिए साड़ी या पारंपरिक परिधान अनिवार्य है। पाश्चात्य वस्त्र (जींस, पैंट, टी-शर्ट) पहनकर गर्भगृह में स्पर्श दर्शन की अनुमति नहीं दी जाती।
६. प्रमुख उत्सव, ब्रह्मोत्सव एवं यात्रा मुहूर्त (Festivals & Best Time)
श्रीशैलम तीर्थ में वर्ष भर अनेक पावन ब्रह्मोत्सव और मेले आयोजित किए जाते हैं:
१. महाशिवरात्रि ब्रह्मोत्सव (७ दिवसीय महापर्व)
माघ/फाल्गुन मास में सात दिनों तक विशाल ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। इस दौरान पागलंकरण (विशाल पगड़ी बांधने की रस्म), कल्याणोत्सव (शिव-पार्वती विवाह), रथोत्सव और पाताल गंगा में चक्रस्नान का भव्य आयोजन होता है।
२. उगादि उत्सव (तेलुगु नववर्ष)
चैत्र मास में उगादि पर कर्नाटक और महाराष्ट्र से लाखों पदयात्री (पैदल तीर्थयात्री) सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर श्रीशैलम पहुंचते हैं और भगवान मल्लिकार्जुन को नीम-गुड़ का नैवेद्य अर्पित करते हैं।
३. शारदीय नवरात्रि एवं कुंकुमार्चन
अश्विन मास में माँ भ्रमराम्बा शक्तिपीठ पर नौ दिनों तक विशेष कुंकुमार्चन, चंडी होम और नवदुर्गा श्रृंगार किए जाते हैं, जिसमें दूर-दूर से तंत्र साधक साधना हेतु आते हैं।
४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम
नल्लामाला की पहाड़ियों में स्थित होने से यहाँ ग्रीष्मकाल में तेज गर्मी पड़ती है। अतः श्रीशैलम यात्रा हेतु सितंबर से मार्च का समय अत्यंत सुखद, हरा-भरा और सर्वोत्तम माना जाता है।
७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें? (How to Reach Srisailam)
श्रीशैलम पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित है, अतः यहाँ सड़क मार्ग का विशेष महत्व है:
- हवाई मार्ग (By Air): निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद (HYD - लगभग २१५ किमी) है। हैदराबाद से श्रीशैलम के लिए नियमित टैक्सियां और सरकारी बसें (TSRTC / APSRTC) उपलब्ध हैं।
- रेल मार्ग (By Train): निकटतम रेलवे स्टेशन मारकापुर रोड (Markapur Road - MRK - लगभग ८५ किमी) है। इसके अतिरिक्त प्रमुख रेलवे जंक्शन नंध्याल (Nandyal - लगभग १४० किमी) और कुरनूल (Kurnool - लगभग १८० किमी) हैं, जहाँ से नियमित बसें और कैब मिलती हैं।
- सड़क मार्ग (By Road): हैदराबाद (२१५ किमी), विजयवाड़ा (२५० किमी), गुंटूर (२२० किमी), और बेंगलुरु (५३० किमी) से श्रीशैलम के लिए सीधी वोल्वो, डीलक्स और एक्सप्रेस बसें निरंतर चलती हैं। नल्लामाला टाइगर रिजर्व के घने जंगलों से होकर गुजरने वाला घाट रोड अत्यंत मनोरम है (ध्यान रहे कि रात ९:०० से सुबह ६:०० बजे तक वन विभाग द्वारा जंगल का गेट सुरक्षा कारणों से बंद रहता है)।
८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं सावधानियां
श्रीशैलम देवस्थानम ट्रस्ट द्वारा तीर्थयात्रियों के लिए व्यापक प्रबंध किए गए हैं:
- १. देवस्थानम आवास (Devasthanam Cottages): ट्रस्ट के गंगा सदन, गौरी सदन, शिव सदन और मल्लिका सदन जैसे विशाल कॉटेज और डॉर्मिटरी उपलब्ध हैं। इन सभी की अग्रिम बुकिंग श्रीशैलम देवस्थानम की आधिकारिक वेबसाइट (srisailamonline.com) से की जा सकती है।
- २. जंगल मार्ग रात्रि प्रतिबंध: नल्लामाला अभयारण्य में रात्रि ९:०० बजे से प्रातः ०६:०० बजे तक वाहनों का आवागमन पूर्णतः वर्जित है। अतः अपनी यात्रा का समय दिन के समय ही नियोजित करें।
- ३. अन्नदानम (निःशुल्क भोजन): श्रीशैलम देवस्थानम द्वारा प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं को 'नित्य अन्नदानम भवन' में अत्यंत स्वादिष्ट, शुद्ध और सात्विक दक्षिण भारतीय भोजन (प्रसादम) निःशुल्क परोसा जाता है।
९. आस-पास के प्रमुख दर्शनीय एवं धार्मिक स्थल (Nearby Attractions)
श्रीशैलम यात्रा में मंदिर के अतिरिक्त निम्नलिखित दिव्य स्थलों के दर्शन अत्यंत पुण्यकारी हैं:
- पाताल गंगा (Pathala Ganga): मंदिर से २ किमी नीचे घाटी में बहने वाली पावन कृष्णा नदी। यहाँ श्रद्धालु सीढ़ियों अथवा आधुनिक रोपवे (Ropeway) द्वारा उतरकर पवित्र स्नान करते हैं। यहाँ नौका विहार की सुविधा भी उपलब्ध है।
- साक्षी गणपति मंदिर (Sakshi Ganapati): श्रीशैलम से ३ किमी पूर्व। मान्यता है कि यहाँ के गणपति भगवान शिव के सम्मुख साक्षी (गवाही) देते हैं कि किस-किस भक्त ने श्रीशैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। अतः श्रीशैलम से लौटते समय यहाँ दर्शन अनिवार्य है।
- पालधारा-पंचधारा (Phaladhara Panchadhara): एक सुंदर प्राकृतिक जलप्रपात जहाँ निरंतर पांच जलधाराएं गिरती हैं। यहीं पर जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने घोर तपस्या की थी।
- शिखरेश्वरम (Shikhareswaram): श्रीशैलम का सर्वोच्च पर्वत शिखर (समुद्र तल से २८३० फीट)। यहाँ भगवान शिखरेश्वर का मंदिर है। यहाँ स्थित नंदी के सींगों के बीच से मुख्य मल्लिकार्जुन मंदिर के शिखर का दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।
- अक्का महादेवी गुफाएं (Akka Mahadevi Caves): पाताल गंगा से नाव द्वारा १० किमी दूर घने जंगल में स्थित प्राचीन गुफाएं, जहाँ १२वीं शताब्दी की महान शिवभक्त संत कवयित्री अक्का महादेवी ने तपस्या कर मुक्ति पाई थी।