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श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर, महाराष्ट्र: 12वें ज्योतिर्लिंग का इतिहास, दर्शन समय एवं संपूर्ण यात्रा गाइड | Shri Grishneshwar Jyotirlinga Temple Maharashtra: History, Darshan Timings & Travel Guide

255 दर्शनार्थी
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), महाराष्ट्र
प्रकाशित: 28 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान शिव
दर्शन समय सारिणी
सुबह 05:30 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक (श्रावण मास में समय विस्तारित हो सकता है)
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | जलहरी पूजन: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:00 PM
स्थान / नगर
छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), महाराष्ट्र
आराध्य देव
भगवान शिव
दर्शन समय
सुबह 05:30 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक (श्रावण मास में समय विस्तारित हो सकता है)
आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | जलहरी पूजन: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:00 PM
स्थान / धाम
वेरुल गाँव, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), महाराष्ट्र 431102, भारत
अक्षर आकार:
पठन थीम:

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिले में स्थित श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shri Grishneshwar Jyotirlinga Temple) भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण है। एलोरा (Verul) की विश्व प्रसिद्ध गुफाओं के निकट स्थित यह मंदिर न केवल एक महान आध्यात्मिक केंद्र है, बल्कि भारतीय वास्तुकला और मराठा स्थापत्य शैली का एक जीवंत प्रमाण भी है। लाल चट्टानों से निर्मित यह मंदिर अपनी शांति, दिव्यता और प्राचीनता के लिए दुनिया भर के शिव भक्तों को आकर्षित करता है। माना जाता है कि यहाँ दर्शन करने से भक्तों के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मंदिर का परिचय एवं पौराणिक इतिहास (History & Legend)

श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास अत्यंत प्राचीन और महिमामयी है। शिव पुराण के अनुसार, यह 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। इस मंदिर के नाम 'घृष्णेश्वर' का अर्थ है 'करुणा के स्वामी'। इस मंदिर की उत्पत्ति के पीछे 'घुश्मा' नामक एक परम शिव भक्त की कथा प्रचलित है।

पौराणिक कथा के अनुसार, दक्षिण देश में देवगिरि पर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहता था। उनकी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण सुदेहा ने अपने पति का विवाह अपनी छोटी बहन घुश्मा से करवा दिया। घुश्मा भगवान शिव की अनन्य भक्त थी और वह प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती थी और उन्हें पास के एक तालाब में विसर्जित कर देती थी।

भगवान शिव की कृपा से घुश्मा को एक सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इससे सुदेहा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गई और उसने एक रात सोते समय घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी और उसके शव को उसी तालाब में फेंक दिया जहाँ घुश्मा शिवलिंग विसर्जित करती थी। अगले दिन, जब घुश्मा को पुत्र की मृत्यु का पता चला, तो वह विचलित नहीं हुई और अपनी नित्य शिव पूजा में लीन रही। जब वह शिवलिंग विसर्जित करने तालाब पर गई, तो भगवान शिव की कृपा से उसका पुत्र जीवित होकर तालाब से बाहर निकल आया।

भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और घुश्मा की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान मांगने को कहा। घुश्मा ने प्रार्थना की कि प्रभु आप लोक कल्याण के लिए सदैव यहाँ निवास करें। घुश्मा की इसी प्रार्थना को स्वीकार करते हुए भगवान शिव वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए और घुश्मा के नाम पर ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'घृष्णेश्वर' पड़ा।

ऐतिहासिक दृष्टि से, इस मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है। 16वीं शताब्दी में मालोजी राजे भोसले (छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा) ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। वर्तमान मंदिर की भव्य संरचना का श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को जाता है, जिन्होंने 18वीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार करवाया था। उन्होंने ही वाराणसी के काशी विश्वनाथ और गया के विष्णुपद मंदिर का भी पुनर्निर्माण कराया था।

मंदिर की स्थापत्य कला एवं गर्भगृह संरचना (Architecture & Structure)

घृष्णेश्वर मंदिर मराठा स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंदिर लाल रंग के बेसाल्ट पत्थरों (Red Volcanic Rock) से बना है, जो इसे एक विशिष्ट आभा प्रदान करता है। मंदिर की वास्तुकला में दक्षिण भारतीय और राजस्थानी शैलियों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।

शिखर और नक्काशी: मंदिर का मुख्य शिखर पांच मंजिला है, जिस पर देवी-देवताओं की अत्यंत सुंदर और बारीक मूर्तियां उकेरी गई हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण, महाभारत और शिव पुराण के विभिन्न प्रसंगों को मूर्तिकला के माध्यम से दर्शाया गया है।

गर्भगृह: मंदिर का गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) काफी गहरा और शांत है। यहाँ स्थापित ज्योतिर्लिंग पूर्वमुखी है। गर्भगृह के भीतर एक नंदी की मूर्ति स्थापित है, जो भगवान शिव की ओर मुख किए हुए है। मंदिर के सभा मंडप में 24 नक्काशीदार स्तंभ हैं, जो मंदिर की छत को सहारा देते हैं। इन स्तंभों पर की गई नक्काशी उस समय के कारीगरों के कौशल को दर्शाती है।

कोर्टयार्ड: मंदिर के चारों ओर एक विशाल प्रांगण है, जहाँ भक्त बैठकर ध्यान और प्रार्थना कर सकते हैं। मंदिर परिसर के भीतर ही एक छोटा सा जल कुंड भी है, जिसे पवित्र माना जाता है।

दर्शन, आरती एवं पूजा का समय (Darshan & Aarti Timings)

मंदिर भक्तों के लिए प्रतिदिन सुबह जल्दी खुल जाता है। यहाँ की आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने के लिए सुबह की आरती में शामिल होना सबसे उत्तम माना जाता है।

आयोजन/पूजा समय
मंदिर खुलने का समय 05:30 AM
मंगला आरती 05:30 AM - 06:00 AM
जलहरी पूजन (अभिषेक) 01:00 PM - 01:30 PM
संध्या आरती 07:00 PM - 07:30 PM
शयन आरती 09:00 PM
मंदिर बंद होने का समय 09:30 PM

विशेष नोट: श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) के दौरान मंदिर के समय में परिवर्तन हो सकता है और दर्शन के लिए लंबी कतारें हो सकती हैं।

प्रमुख त्यौहार एवं उत्सव (Festivals & Special Celebrations)

घृष्णेश्वर मंदिर में साल भर कई उत्सव मनाए जाते हैं, लेकिन निम्नलिखित त्यौहारों का विशेष महत्व है:

  • महाशिवरात्रि: यह यहाँ का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक करने आते हैं। पूरे मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है।
  • श्रावण मास: हिंदू कैलेंडर के अनुसार श्रावण का महीना भगवान शिव को समर्पित है। इस पूरे महीने में विशेष पूजा, अभिषेक और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। प्रत्येक सोमवार (श्रावण सोमवार) को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
  • वैकुंठ चतुर्दशी: इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की संयुक्त पूजा का विधान है, जिसे यहाँ बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मंदिर तक कैसे पहुंचे (How to Reach - Air, Train, Road)

घृष्णेश्वर मंदिर महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

हवाई मार्ग द्वारा: सबसे नजदीकी हवाई अड्डा औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से आप टैक्सी या बस के माध्यम से मंदिर पहुँच सकते हैं।

रेल मार्ग द्वारा: औरंगाबाद रेलवे स्टेशन मुख्य स्टेशन है, जो भारत के प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद और पुणे से जुड़ा हुआ है। स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है।

सड़क मार्ग द्वारा: औरंगाबाद से एलोरा के लिए नियमित बसें और निजी टैक्सियाँ उपलब्ध हैं। यह मंदिर औरंगाबाद-चालीसगाँव रोड पर स्थित है। यदि आप पुणे (250 किमी) या मुंबई (350 किमी) से आ रहे हैं, तो आप सड़क मार्ग से भी आसानी से पहुँच सकते हैं।

यात्रियों के लिए उपयोगी सुझाव (Best Season, Dress Code, Accommodation)

यात्रा को सुखद बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:

  • सबसे अच्छा समय: अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ आने के लिए सबसे सुखद होता है क्योंकि मौसम सुहावना रहता है। मानसून के दौरान भी यहाँ की हरियाली देखने लायक होती है।
  • ड्रेस कोड (Dress Code): घृष्णेश्वर मंदिर में एक विशेष परंपरा है। पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश करने और ज्योतिर्लिंग को स्पर्श करने के लिए अपनी शर्ट या ऊपरी वस्त्र उतारने पड़ते हैं (केवल धोती या पैंट में प्रवेश की अनुमति है)। महिलाओं के लिए साड़ी या सलवार कमीज जैसे शालीन वस्त्र अनिवार्य हैं।
  • फोटोग्राफी: मंदिर के गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी सख्त वर्जित है।
  • आवास: औरंगाबाद शहर में रुकने के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें बजट होटल से लेकर लग्जरी रिसॉर्ट्स तक शामिल हैं। मंदिर के पास भी कुछ धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।

आस-पास के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल (Nearby Places to Visit)

घृष्णेश्वर की यात्रा के साथ आप निम्नलिखित स्थानों का भ्रमण भी कर सकते हैं:

  1. एलोरा की गुफाएं (Ellora Caves): मंदिर से मात्र 1-2 किमी की दूरी पर स्थित ये गुफाएं यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। यहाँ का कैलाश मंदिर वास्तुकला का चमत्कार है।
  2. दौलताबाद किला (Daulatabad Fort): यह एक अभेद्य किला है जो अपनी रणनीतिक बनावट के लिए जाना जाता है।
  3. बीबी का मकबरा: इसे 'दक्कन का ताज' भी कहा जाता है, जो औरंगाबाद शहर में स्थित है।
  4. भद्रा मारुति मंदिर: खुल्दाबाद में स्थित यह मंदिर हनुमान जी की शयन मुद्रा के लिए प्रसिद्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या घृष्णेश्वर मंदिर में ज्योतिर्लिंग को स्पर्श करने की अनुमति है?
उत्तर: हाँ, भक्त ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए पुरुषों को अपने ऊपरी वस्त्र (शर्ट/टी-शर्ट) उतारने अनिवार्य हैं।

प्रश्न 2: औरंगाबाद से घृष्णेश्वर मंदिर पहुँचने में कितना समय लगता है?
उत्तर: सड़क मार्ग से औरंगाबाद शहर से मंदिर पहुँचने में लगभग 1 से 1.5 घंटे का समय लगता है।

प्रश्न 3: क्या मंदिर के पास पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है?
उत्तर: हाँ, मंदिर परिसर के पास पर्याप्त पार्किंग स्थान उपलब्ध है।

प्रश्न 4: क्या मंदिर में दर्शन के लिए कोई शुल्क है?
उत्तर: सामान्य दर्शन निःशुल्क हैं, हालांकि विशेष पूजा या अभिषेक के लिए निर्धारित शुल्क देना होता है।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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