पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर, गुजरात: प्रथम ज्योतिर्लिंग का इतिहास, दर्शन समय एवं यात्रा गाइड | Shri Somnath Temple Gujarat: First Jyotirlinga History, Darshan & Pilgrimage Guide

242 दर्शनार्थी
प्रभास पाटन (वेरावल), गुजरात
प्रकाशित: 28 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान शिव
दर्शन समय सारिणी
प्रातः ०४:०० AM से रात्रि ११:०० PM तक (भस्म आरती ०४:०० AM से ०६:०० AM)
नित्य आरती समय
भस्म आरती: ०४:०० AM | नैवेद्य आरती: १०:३० AM | संध्या आरती: ०७:०० PM | शयन आरती: १०:३० PM
स्थान / नगर
प्रभास पाटन (वेरावल), गुजरात
आराध्य देव
भगवान शिव
दर्शन समय
प्रातः ०४:०० AM से रात्रि ११:०० PM तक (भस्म आरती ०४:०० AM से ०६:०० AM)
आरती समय
भस्म आरती: ०४:०० AM | नैवेद्य आरती: १०:३० AM | संध्या आरती: ०७:०० PM | शयन आरती: १०:३० PM
स्थान / धाम
प्रभास पाटन (वेरावल), जिला गिर सोमनाथ, गुजरात, 362268
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पठन थीम:

१. तृतीय ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर: तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

भारत के हृदय स्थल मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में पावन मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के रमणीय तट पर स्थित अति-प्राचीन तीर्थ नगरी उज्जैन (अवंतिका) में श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (Shri Mahakaleshwar Jyotirlinga Temple, Ujjain) सनातन धर्म के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तृतीय और तंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में महर्षि वेदव्यास जी इसका स्मरण करते हैं: 'उज्जयिन्यां महाकालम्'—अर्थात अवंतिका नगरी के अधिपति साक्षात् भगवान महाकाल हैं।

पौराणिक काल से ही अवंतिका को भारत की सात मोक्षदायिनी पुरियों (अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवंतिका, पुरी) में गिना गया है। खगोल विज्ञान और सूर्य सिद्धांत के अनुसार, उज्जैन पृथ्वी का नाभि-केंद्र (Center of the Earth) और शून्य रेखांश (Zero Meridian) माना जाता रहा है। कर्क रेखा (Tropic of Cancer) भी यहीं से होकर गुजरती है। भगवान महाकालेश्वर केवल समय (Time) के ही नहीं, अपितु महाप्रलय और काल (Death) के भी परम अधिष्ठाता हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में श्री महाकालेश्वर की सबसे अद्वितीय और विलक्षण विशेषता यह है कि यह एकमात्र 'दक्षिणमुखी' (South-Facing) ज्योतिर्लिंग है। वास्तु और तंत्र शास्त्र में दक्षिण दिशा को यमराज (मृत्यु) की दिशा माना गया है। भगवान शिव यहाँ दक्षिण दिशा की ओर मुख करके विराजमान हैं, जिसका अर्थ है कि महाकाल के सम्मुख स्वयं काल और यमराज भी थर-थर कांपते हैं। जो भक्त महाकाल का आश्रय ले लेता है, उसे अकाल मृत्यु, प्रेत बाधा अथवा किसी भी ग्रह दोष का लेशमात्र भी भय नहीं रहता।

२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)

शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता (अध्याय १६ व १७) में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य का अत्यंत रोमांचकारी प्रसंग मिलता है:

॥ दूषण दैत्य का वध एवं हुंकार स्वरूप महाकाल का प्राकट्य ॥

प्राचीन काल में अवंतिका नगरी में 'वेदप्रिय' नामक एक अत्यंत तपस्वी और वेद-वेदांगों के ज्ञाता ब्राह्मण अपने चार पुत्रों (देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और धर्मव्रत) के साथ निवास करते थे। वे प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिव की अनन्य आराधना में लीन रहते थे। उसी कालखंड में रत्नमाल पर्वत पर 'दूषण' नामक एक महाबली और क्रूर असुर ब्रह्मा जी से वरदान पाकर संपूर्ण संसार में हाहाकार मचा रहा था। उसने अवंतिका के ब्राह्मणों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें शिव पूजा बंद करने की धमकी दी।

दूषण की विशाल सेना ने जब ब्राह्मणों पर अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करना चाहा, तब भी वे ब्राह्मण तनिक भी विचलित नहीं हुए और ध्यानमग्न होकर केवल 'हर-हर महादेव' का संकीर्तन करते रहे। जैसे ही दूषण ने ब्राह्मणों को मारने हेतु अपनी तलवार उठाई, उसी क्षण जिस पार्थिव शिवलिंग की वे पूजा कर रहे थे, वहाँ की भूमि भीषण गर्जना के साथ फट गई और उसमें से एक विशाल गड्ढा प्रकट हुआ।

उस पावन भूमि से साक्षात् देवाधिदेव महादेव अत्यंत विकराल, दिगम्बर और प्रलयंकारी 'महाकाल' रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने केवल एक प्रचंड 'हुंकार' (Hoomkar) भरी, और उस दिव्य नाद से निकली अग्नि ज्वाला ने दूषण और उसकी संपूर्ण राक्षसी सेना को क्षण भर में भस्म कर राख का ढेर बना दिया। ब्राह्मणों की प्रार्थना पर कि 'हे प्रभु! संसार के दुर्जनों के नाश और सज्जनों के कल्याण हेतु आप सदा यहीं निवास करें', भगवान शिव वहीं 'महाकालेश्वर' ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।

॥ गोपी-पुत्र बालक श्रीकर की निष्काम भक्ति ॥

शिव पुराण में एक अन्य कथा आती है कि अवंतिका के राजा चंद्रसेन की शिव पूजा को देखकर एक विधवा गोपी के पांच वर्षीय बालक 'श्रीकर' के मन में भी शिव आराधना की तीव्र इच्छा जागी। उसने एक साधारण पत्थर का टुकड़ा उठाया और जंगल में जाकर उसे ही शिवलिंग मानकर पुष्प और धूल से पूजने लगा। जब उसकी माता ने उसे भोजन हेतु बुलाया और वह नहीं उठा, तो माता ने क्रोध में उस पत्थर को दूर फेंक दिया। बालक रोते-रोते मूर्छित हो गया। उसकी इस निष्काम भक्ति से आशुतोष महादेव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उस साधारण पत्थर को साक्षात् दिव्य ज्योतिर्लिंग में परिवर्तित कर दिया और उस गोपी के कुल में आगे चलकर नंदबाबा के अवतरण का वरदान दिया।

३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम

उज्जैन का महाकाल मंदिर भारत के सबसे प्राचीन जीवित मंदिरों में से एक है। इसका ऐतिहासिक सफर गौरव और पुनर्निर्माण का अनुपम उदाहरण है:

कालखंड / वर्ष ऐतिहासिक घटना शासक / योगदानकर्ता
प्राचीन काल (महाभारत काल) अवंतिका राजधानी में महाकाल की पूजा और कालिदास के 'मेघदूतम्' में भव्य वर्णन। सम्राट विक्रमादित्य एवं गुप्त साम्राज्य।
१०वीं-११वीं शताब्दी परमार राजवंश के काल में महाकाल मंदिर का भव्य पाषाण निर्माण। मालवा के राजा भोज एवं उदयादित्य।
ईस्वी सन् १२३४-३५ दिल्ली सल्तनत के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश द्वारा मंदिर का क्रूर विध्वंस। ज्योतिर्लिंग को कोटितीर्थ कुंड में छिपाया गया।
ईस्वी सन् १७३६ मराठा साम्राज्य के पेशवा बाजीराव प्रथम के सेनापति राणोजी शिंदे द्वारा पुनर्निर्माण। वर्तमान मुख्य मंदिर और कोटितीर्थ कुंड का पुनर्निर्माण।
१९वीं शताब्दी ग्वालियर के सिंधिया राजवंश द्वारा मंदिर का व्यापक विस्तार और रखरखाव। महारानी बैजाबाई एवं माधवराव सिंधिया।
११ अक्टूबर २०२२ विश्व प्रसिद्ध 'श्री महाकाल महालोक कॉरिडोर' का भव्य लोकार्पण। भारत सरकार एवं मध्य प्रदेश शासन (८५० करोड़ रुपये की भव्य परियोजना)।

वर्तमान समय में 'श्री महाकाल महालोक' के निर्माण से मंदिर का क्षेत्रफल २ हेक्टेयर से बढ़कर २० हेक्टेयर से अधिक हो गया है, जहाँ भगवान शिव की लीलाओं पर आधारित २०० से अधिक भव्य मूर्तियां, १०८ नक्काशीदार स्तंभ और कमल कुंड श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

४. मंदिर की त्रि-स्तरीय वास्तुकला एवं कोटितीर्थ कुंड

श्री महाकालेश्वर मंदिर भूमिज, चालुक्य एवं मराठा स्थापत्य शैली का अद्भुत समन्वय है। यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जो तीन मंजिलों (Three Tiers) में विभक्त है:

  • १. अधोतल (Ground Floor) - श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग: सबसे निचली मंजिल के पाताल-समान गर्भगृह में साक्षात् स्वयंभू दक्षिणमुखी महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। गर्भगृह में चांदी के छत्र, चांदी की वेदी और अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है।
  • २. मध्य तल (First Floor) - श्री ओंकारेश्वर महादेव: गर्भगृह के ठीक ऊपर दूसरी मंजिल पर भगवान ओंकारेश्वर का पावन शिवलिंग प्रतिष्ठित है, जहाँ वर्ष भर श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं।
  • ३. शीर्ष तल (Top Floor) - श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर: मंदिर के सबसे ऊपरी शिखर तल पर भगवान नागचंद्रेश्वर की अत्यंत दुर्लभ ११वीं शताब्दी की प्रतिमा स्थित है, जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती शेषनाग के दस फनों के आसन पर विराजमान हैं। यह मंदिर वर्ष में केवल एक दिन (नागपंचमी पर २४ घंटे हेतु) ही खोला जाता है।
  • ४. पावन कोटितीर्थ कुंड (Koti Tirtha Kunda): मंदिर प्रांगण में एक विशाल प्राचीन जलकुंड स्थित है जिसे कोटितीर्थ कुंड कहा जाता है। इसमें देश भर के पावन तीर्थों का जल समाहित माना जाता है। इल्तुतमिश के आक्रमण के समय पुजारियों ने ज्योतिर्लिंग को इसी कुंड के जल में सुरक्षित छिपाकर रखा था।

५. विश्वविख्यात भस्म आरती एवं दैनिक पूजा-आरती क्रम (Bhasma Aarti Details)

महाकालेश्वर मंदिर का सबसे अलौकिक और विश्वविख्यात आकर्षण 'भस्म आरती' (Bhasma Aarti) है, जो प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में संपन्न होती है:

अलौकिक भस्म आरती

०४:०० AM - ०६:०० AM

कंडे की पवित्र भस्म से भगवान महाकाल का दिव्य श्रृंगार एवं आरती।

नैवेद्य / भोग आरती

१०:३० AM - ११:०० AM

राजभोग अर्पण, शंखनाद एवं मध्याह्न महाआरती।

संध्या महाआरती

०७:०० PM - ०७:४५ PM

सुगंधित द्रव्य, भांग-चंदन श्रृंगार एवं संध्या दीपदान।

शयन आरती

१०:३० PM - ११:०० PM

दिन की अंतिम आरती, पुष्प मुकुट अर्पण एवं शयन सेवा।

भस्म आरती का रहस्य एवं वेशभूषा नियम: प्राचीन काल में श्मशान की ताजी भस्म से आरती होती थी, परंतु वर्तमान में शुद्ध कपिला गाय के गोबर से बने उपलों (कंडों), शमी, पीपल, पलाश और अमलतास की काष्ठ से वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा तैयार की गई शुद्ध 'कपाल भस्म' से भगवान का अभिषेक किया जाता है। भस्म आरती देखने हेतु पुरुषों को शुद्ध बिना सिला सूती धोती और सोला तथा महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है। आरती के दौरान जब भस्म चढ़ाई जाती है, तो महिलाओं को कुछ क्षणों हेतु घूंघट करने का शास्त्रीय नियम है।

६. प्रमुख उत्सव, सावन सवारी एवं सिंहस्थ कुंभ महापर्व (Festivals)

अवंतिका नगरी में भगवान महाकाल के पावन पर्व अत्यंत वैभव और उल्लास से मनाए जाते हैं:

१. सावन-भादों में महाकाल की शाही सवारी

श्रावण और भाद्रपद मास के प्रत्येक सोमवार को भगवान महाकाल अपनी प्रजा का हालचाल जानने हेतु चांदी की भव्य पालकी में नगर भ्रमण पर निकलते हैं। शाही सवारी में लाखों श्रद्धालु, पुलिस बैंड, तोपों की सलामी और संतों की मंडलियां शामिल होती हैं। शिप्रा के रामघाट पर भगवान का जलाभिषेक किया जाता है।

२. महाशिवरात्रि एवं शिव-नवरात्रि (९ दिवसीय महापर्व)

उज्जैन में महाशिवरात्रि से ९ दिन पूर्व 'शिव-नवरात्रि' प्रारंभ होती है। प्रतिदिन भगवान महाकाल का अलग-अलग स्वरूपों (शेषनाग, मनमहेश, घटाटोप, उमा-महेश आदि) में नयनाभिराम श्रृंगार होता है। शिवरात्रि पर भगवान को सवा मन फल और फूलों का सेहरा बांधा जाता है।

३. सिंहस्थ कुंभ महापर्व (प्रत्येक १२ वर्ष में)

जब गुरु ग्रह सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब शिप्रा नदी के तट पर विश्वविख्यात 'सिंहस्थ महाकुंभ' का आयोजन होता है, जिसमें करोड़ों साधु-संत, नागा संन्यासी और श्रद्धालु अमृत स्नान करते हैं।

४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम

उज्जैन में ग्रीष्मकाल में अत्यधिक गर्मी पड़ती है। अतः महाकाल दर्शन हेतु अक्टूबर से मार्च का समय मौसम की दृष्टि से सर्वाधिक सुखद और अनुकूल रहता है।

७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें? (How to Reach Ujjain)

उज्जैन देश के सभी प्रमुख नगरों से परिवहन के सभी माध्यमों द्वारा सुगमता से जुड़ा हुआ है:

  • हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, इंदौर (IDR - लगभग ५५ किमी) है। इंदौर से उज्जैन के लिए फोर-लेन सुपर एक्सप्रेसवे द्वारा मात्र १ घंटे में टैक्सी अथवा इंटरसिटी बस द्वारा पहुँचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग (By Train): उज्जैन जंक्शन (UJN) भारतीय रेलवे के पश्चिम रेलवे मंडल का प्रमुख स्टेशन है। यह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, वाराणसी, जयपुर, बेंगलुरु और पुणे से सैकड़ों सुपरफास्ट एवं राजधानी/वंदे भारत ट्रेनों से सीधे जुड़ा हुआ है।
  • सड़क मार्ग (By Road): उज्जैन इंदौर (५५ किमी), भोपाल (१९० किमी), कोटा (२६० किमी) और अहमदाबाद (३९० किमी) से शानदार राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों द्वारा जुड़ा है। नियमित एसी व वोल्वो बसें उपलब्ध हैं।

८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं सावधानियां

श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा श्रद्धालुओं हेतु उच्च स्तरीय व्यवस्थाएं की गई हैं:

  • १. भस्म आरती ऑनलाइन अग्रिम बुकिंग: भस्म आरती में सम्मिलित होने हेतु मंदिर प्रबंध समिति की आधिकारिक वेबसाइट (shrimahakaleshwar.com) से लगभग ३० से ६० दिन पूर्व ऑनलाइन अनुमति (Permission) लेना अनिवार्य है। प्रतिदिन कुछ सीटें ऑफलाइन काउंटर से एक दिन पूर्व प्रातः काल भी उपलब्ध कराई जाती हैं।
  • २. मंदिर समिति के धर्मशाला व विश्राम गृह: मंदिर समिति के भव्य विश्राम धाम—महाकाल विश्राम गृह, त्रिवेणी विश्राम गृह, और हरसिद्धि धर्मशाला उपलब्ध हैं।
  • ३. मोबाइल एवं सुरक्षा नियम: गर्भगृह और नंदी हॉल में मोबाइल फोन ले जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है। मंदिर के बाहर सुरक्षा काउंटरों पर निःशुल्क मोबाइल और जूता-चप्पल लॉकर उपलब्ध हैं।

९. उज्जैन के प्रमुख दर्शनीय एवं धार्मिक स्थल (Nearby Attractions)

उज्जैन यात्रा में महाकाल दर्शन के साथ निम्नलिखित अत्यंत पवित्र तीर्थों के दर्शन अनिवार्य हैं:

  1. काल भैरव मंदिर (Kaal Bhairav): उज्जैन के सेनापति भगवान काल भैरव का प्रसिद्ध मंदिर जहाँ भगवान को मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है, जिसे वे चमत्कारिक रूप से ग्रहण कर लेते हैं।
  2. हरसिद्धि माता शक्तिपीठ (Harsiddhi Temple): ५१ शक्तिपीठों में से एक जहाँ माता सती की 'बाईं कोहनी' गिरी थी। यहाँ दो विशाल दीपस्तंभ हैं जिन्हें संध्या समय प्रज्वलित किया जाता है। यह सम्राट विक्रमादित्य की कुलदेवी हैं।
  3. मंगलनाथ मंदिर (Mangalnath Temple): मत्स्य पुराण के अनुसार यह भूमि मंगल ग्रह की जन्मभूमि है। कुंडली में मांगलिक दोष निवारण और भात पूजा हेतु यह विश्व का एकमात्र केंद्र है।
  4. महर्षि सांदीपनि आश्रम (Sandipani Ashram): वह पावन स्थल जहाँ भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा ने महर्षि सांदीपनि से ६४ दिनों में ६४ कलाओं और १४ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण की थी।
  5. रामघाट एवं शिप्रा नदी (Ram Ghat): शिप्रा का सबसे प्राचीन स्नान घाट जहाँ भगवान राम ने राजा दशरथ का श्राद्ध किया था और जहाँ सिंहस्थ कुंभ का मुख्य शाही स्नान होता है।
  6. गढकालिका मंदिर: महाकवि कालिदास की आराध्या देवी का पावन मंदिर।

१०. प्रामाणिक प्रश्नोत्तरी (FAQ)

भस्म आरती की अनुमति श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की आधिकारिक वेबसाइट (shrimahakaleshwar.com) से ली जा सकती है। सामान्य नंदी हॉल प्रवेश हेतु २०० रुपये प्रति व्यक्ति का ऑनलाइन शुल्क निर्धारित है, जबकि चलित भस्म आरती (पीछे की कतारों से दर्शन) निःशुल्क भी उपलब्ध रहती है। आधार कार्ड के साथ अग्रिम बुकिंग आवश्यक है।

नहीं, सामान्य दर्शन कतार से पूरी तरह निःशुल्क है। जो श्रद्धालु लंबी कतारों से बचकर शीघ्र दर्शन करना चाहते हैं, उनके लिए मंदिर समिति द्वारा २५० रुपये का 'शीघ्र दर्शन' (VIP Protocol) पास उपलब्ध कराया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार दक्षिण दिशा यमराज की दिशा है जो मृत्यु और संहार का प्रतीक है। भगवान महाकाल का मुख दक्षिण की ओर होने के कारण वे दक्षिण दिशा से आने वाले समस्त अकाल मृत्यु, प्रेत बाधा और व्याधियों को निष्प्रभावी कर देते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकाल ही दक्षिणमुखी हैं।

मंदिर के शीर्ष तल पर स्थित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर वर्ष में केवल एक बार 'नागपंचमी' (श्रावण शुक्ल पंचमी) के दिन २४ घंटे के लिए खुलता है। यहाँ ग्यारहवीं शताब्दी की अद्भुत प्रतिमा है जिसमें शिव-पार्वती शेषनाग के फनों पर विराजमान हैं। इसके दर्शन से कालसर्प दोष और सर्प भय समूल नष्ट हो जाता है।

लगभग ९०० मीटर लंबे श्री महाकाल महालोक कॉरिडोर में भगवान शिव की भव्य मूर्तियों, भित्तिचित्रों, त्रिवेणी संग्रहालय और रुद्रसागर झील को देखने के लिए कम से कम १.५ से २ घंटे का समय लगता है। संध्या समय जब प्रकाश व्यवस्था और फव्वारे चलते हैं, तब इसका सौंदर्य देखते ही बनता है।
तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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