मुख्य पृष्ठ / मंत्र संग्रह / Mantra / श्री सूर्य गायत्री मंत्र - ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्
भगवान श्री हरि कृपा · भगवान सूर्य नारायण Mantra

श्री सूर्य गायत्री मंत्र - ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्

श्री सूर्य गायत्री मंत्र (ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि...) के संपूर्ण वैदिक विधि, अर्थ, नियम, ध्यान श्लोक और चमत्कारी लाभ पढ़ें।

इष्ट देव भगवान सूर्य नारायण
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त एवं प्रातः काल (सूर्योदय के समय)
अनुशंसित माला स्फटिक या रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्
सरल हिंदी भावार्थ:

हे आदिति पुत्र सूर्य देव! हम आपको जानते हैं, हे प्रभाकर (प्रकाश देने वाले)! हम आपका ध्यान करते हैं। वह सूर्य देव हमारी बुद्धि और चेतना को प्रेरित एवं प्रकाशित करें।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म और वेदों में भगवान सूर्य को जगत की आत्मा ('आत्मनः जगतस्तस्थुषश्च') कहा गया है। ऋग्वेद से लेकर समस्त पुराणों तक सूर्य उपासना को प्रत्यक्ष और अमोघ फलदायी माना गया है। गायत्री छंद की विशिष्ट ऊर्जा और भगवान सूर्य के तेजोमय स्वरूप का अद्भुत समन्वय ही श्री सूर्य गायत्री मंत्र है। वैदिक ज्योतिष और साधना पद्धति में इस मंत्र को प्राण-प्रतिष्ठा, तेजस्विता, और वैचारिक शुद्धि का सर्वोच्च साधन माना गया है।

इस मंत्र के ऋषि विश्वामित्र अथवा परंपराप्राप्त वैदिक द्रष्टा ऋषि हैं, छंद गायत्री है, और देवता प्रत्यक्ष भगवान सूर्य नारायण हैं। सूर्य गायत्री का नियमित जप करने वाले साधक के जीवन से अज्ञान का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है और उसके भीतर दिव्य बुद्धि (प्रज्ञा) का जागरण होता है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि

भक्तजन सुविधा और पूर्ण शुद्धता के लिए इस मंत्र को देवनागरी और रोमन लिपि दोनों में समझ सकते हैं:

ॐ आदित्याय विद्महे प्रभाकराय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है:

  • ॐ: ब्रह्मांड का मूल नाद, प्रणव अक्षर जो परमात्मा का प्रतीक है।
  • आदित्याय: अदिति के पुत्र (सूर्य देव) को।
  • विद्महे: हम जानते हैं या पहचानते हैं।
  • प्रभाकराय: प्रकाश या प्रभा फैलाने वाले को (ऊर्जा और दीप्ति के प्रदाता)।
  • धीमहि: हम ध्यान करते हैं (अपने अंतःकरण में स्थापित करते हैं)।
  • तन्नः: वे हमारे।
  • सूर्यः: सूर्य देव।
  • प्रचोदयात्: हमारी बुद्धि, प्रेरणा और चेतना को प्रेरित एवं सन्मार्ग पर प्रवृत्त करें।

समग्र भावार्थ: हम सर्वव्यापी अदिति नंदन सूर्य देव को भली-भांति जानते हैं और उन प्रकाशपुंज प्रभाकर का अपने हृदय में ध्यान करते हैं। वे सूर्य देवता हमारी बुद्धि को सत्कर्मों और दिव्यता की ओर प्रेरित करें।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी वैदिक मंत्र के अनुष्ठान से पूर्व विनियोग और ध्यान का अत्यधिक महत्व होता है:

विनियोग

अस्य श्री सूर्य गायत्री मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, सूर्यो देवता, आदित्याय इति बीजम्, प्रभाकराय इति शक्तिः, प्रचोदयात् इति कीलकम्, सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक

जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोरारिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥

अर्थ: जो गुड़हल के फूल के समान कांति वाले हैं, कश्यप ऋषि के पुत्र हैं, अत्यधिक प्रकाशमान हैं, अंधकार के शत्रु हैं और समस्त पापों का नाश करने वाले हैं, ऐसे दिवाकर (सूर्य) को मैं प्रणाम करता हूँ।

जप विधि व नियम

श्री सूर्य गायत्री मंत्र की साधना करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर। ब्रह्म मुहूर्त में किया गया जप सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है।
  • दिशा: साधक का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
  • माला: स्फटिक, लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना चाहिए।
  • संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) या 3, 5, 11 माला का जाप करना उत्तम है।
  • अर्घ्य दान: मंत्र जाप के पश्चात तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत और रोली मिलाकर उगते हुए सूर्य को 'ॐ सूर्याय नमः' कहते हुए अर्घ्य प्रदान करें।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

श्री सूर्य गायत्री मंत्र के निरंतर जाप से जीवन में निम्नलिखित सकारात्मक बदलाव आते हैं:

  • शारीरिक आरोग्य: सूर्य देव की उपासना से हड्डियां मजबूत होती हैं, नेत्र ज्योति बढ़ती है और चर्म तथा हृदय संबंधी रोगों में लाभ मिलता है।
  • तेज और ओज: चेहरे पर एक अलग चमक और आकर्षण (तेज) प्रकट होता है। समाज में मान-प्रतिष्ठा और यश की वृद्धि होती है।
  • मानसिक बौद्धिक विकास: छात्रों के लिए यह मंत्र अत्यधिक लाभकारी है क्योंकि यह स्मरण शक्ति, एकाग्रता और तीव्र बुद्धि प्रदान करता है।
  • नकारात्मकता का नाश: यह मंत्र साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक कवच (औरा) का निर्माण करता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जाएं दूर रहती हैं।

सावधानियां एवं नियम

साधना के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  • मंत्र जाप के समय मन को शांत रखें और अशुद्ध विचारों से बचें।
  • सात्विक भोजन का सेवन करें और मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग करें।
  • रविवार के दिन विशेष उपवास या अधिक संख्या में मंत्र जाप करना अति शुभ माना जाता है।
  • उच्चारण की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें। यदि उच्चारण में संशय हो तो किसी योग्य गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करें।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
शारीरिक आरोग्य, नेत्र ज्योति, मानसिक स्पष्टता, तेज, ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
स्नान करके पवित्र श्वेत या लाल वस्त्र पहनें, तांबे के लोटे से अर्घ्य दें और सात्विक आहार अपनाएं

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त एवं प्रातः काल (सूर्योदय के समय) में स्फटिक या रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!