मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
सनातन वैदिक परंपरा में किसी भी अनुष्ठान, यज्ञ, जप, ध्यान या देव-पूजन से पूर्व साधक की आंतरिक और बाह्य शुद्धि को सर्वोपरि माना गया है। भौतिक शरीर और मन की शुद्धि के बिना किया गया कोई भी जप या अनुष्ठान पूर्ण फलदायी नहीं होता। इसी शाश्वत आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए हमारे ऋषियों ने 'अपवित्रः पवित्रो वा' मंत्र को प्राण प्रतिष्ठा और सुरक्षा कवच के रूप में स्थापित किया है। यह मंत्र केवल एक सामान्य श्लोक नहीं है, बल्कि यह चेतना को तुरंत स्थूल से सूक्ष्म और दिव्य स्तर पर रूपांतरित करने की एक महाकुंजी है।
वेदों और पुराणों के अनुसार, जब मनुष्य सांसारिक गतिविधियों में व्यस्त रहता है, तो उसके मन, कर्म और शरीर पर अनजाने में कई प्रकार के मानसिक और वातावरणीय मलिनता का आवरण चढ़ जाता है। ऐसे में जब वह सीधे भगवद आराधना या मंत्र जप करने बैठता है, तो उसकी ऊर्जा खंडित हो सकती है। इस मंत्र का स्मरण करते ही साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि का ऊर्जा कवच निर्मित हो जाता है। इसके ऋषि वेदव्यास या विभिन्न तांत्रिक एवं पौराणिक परंपराओं के आचार्य माने जाते हैं। इसके छंद और देवता प्रत्यक्ष रूप से भगवान विष्णु (पुण्डरीकाक्ष) तथा आदि शक्ति माँ गायत्री के प्राकट्य से जुड़े हैं।
मूल शुद्ध मंत्र एवं लिप्यंतरण
देवनागरी लिपि में मूल मंत्र:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्ववस्थां गतोपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
रोमन लिप्यंतरण :
Om Apavitrah Pavitro Va Sarvavastham Gatopi Va。
Yah Smaret Pundarikaksham Sa Bahyabhyantarah Shuchih॥
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस महान मंत्र के प्रत्येक शब्द का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है जो साधक को दिव्यता से जोड़ता है:
- ॐ: ब्रह्मांडीय मूल ध्वनि, परमात्मा का सर्वोच्च प्रतीक।
- अपवित्रः: अशुद्ध, मलिन अवस्था में या बिना स्नान आदि के।
- पवित्रो वा: अथवा पूर्ण रूप से पवित्र और शुद्ध अवस्था में।
- सर्ववस्थां गतोपि वा: जीवन की किसी भी परिस्थिति, अवस्था या स्थिति में पहुँचा हुआ हो (चाहे वह संकट में हो, रोग में हो या सामान्य स्थिति में)।
- यः: जो कोई भी मनुष्य या साधक।
- स्मरेत्: स्मरण करता है, ध्यान करता है, नामजप करता है।
- पुण्डरीकाक्षं: कमल के समान नेत्रों वाले भगवान विष्णु या परम परमात्मा (जिन्हें गायत्री के मूल स्रोत में भी परब्रह्म माना गया है)।
- सः: वह साधक या मनुष्य।
- बाह्याभ्यन्तरः: बाहर से (शरीर, वस्त्र, वातावरण) और भीतर से (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)।
- शुचिः: पवित्र, निर्मल, पावन हो जाता है।
भावार्थ: मनुष्य चाहे किसी भी दशा में हो—चाहे वह शारीरिक रूप से अशुद्ध हो, मानसिक रूप से विचलित हो या पूर्णतः पवित्र हो—यदि वह कमल नयन भगवान पुण्डरीकाक्ष (परमात्मा) का स्मरण करता है, तो वह तत्काल बाहर और भीतर दोनों प्रकार से पवित्र हो जाता है। यह मंत्र साधक को पल भर में दैवीय कृपा से आच्छादित कर देता है।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
किसी भी मंत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए विनियोग और न्यास अनिवार्य अंग हैं। इस मंत्र का विनियोग इस प्रकार है:
विनियोगः
अस्य श्री पवित्रीकरण मंत्रस्य विष्णु ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीपुण्डरीकाक्षो देवता, बाह्याभ्यन्तर शुच्यर्थे जपे विनियोगः।
ध्यान श्लोक:
शान्तकारम भुजगशयनम पद्मनाभम सुरेशम,
विश्वाधारम गगनसदृशम मेघवर्णम शुभांगम।
लक्ष्मीकान्तम कमलनेत्रम योगिभिर्ध्यानगम्यम,
वन्दे विष्णुम भवभयहरम सर्वलोकैकनाथम॥
यह ध्यान श्लोक साधक के मन में भगवान विष्णु और माँ गायत्री के उस विराट स्वरूप को जागृत करता है जो समस्त भयों का नाश करने वाला है।
जप विधि, माला चयन एवं शुभ मुहूर्त
इस प्राण प्रतिष्ठा और सुरक्षा मंत्र के अनुष्ठान के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- समय: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में या दैनिक पूजा, संध्या वंदना एवं किसी भी बड़े अनुष्ठान (जैसे गायत्री साधना या हवन) से ठीक पहले।
- दिशा: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
- माला: स्फटिक माला, रुद्राक्ष माला या तुलसी माला का उपयोग किया जा सकता है।
- जप संख्या: सामान्य शुद्धि के लिए 3, 5 या 108 बार (एक माला) इसका जाप किया जाता है। जल हाथ में लेकर इस मंत्र को बोलते हुए अपने ऊपर और पूजन सामग्री पर छिड़काव भी किया जाता है (मार्जन विधि)।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
इस मंत्र के नियमित प्रयोग और स्मरण से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- तत्काल शुद्धि: शारीरिक, मानसिक और वातावरणीय अशुद्धियों का तुरंत निवारण होता है।
- सुरक्षा कवच: यह मंत्र साधक के चारों ओर एक अदृश्य आध्यात्मिक सुरक्षा कवच का निर्माण करता है, जिससे नकारात्मक शक्तियां और बाधाएं दूर रहती हैं।
- प्राण प्रतिष्ठा में सहायक: किसी भी विग्रह, यंत्र या प्राण-प्रतिष्ठित होने वाली वस्तु में ऊर्जा का संचार करने के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावी है।
- एकाग्रता और शांति: मन का भटकाव दूर होता है और ध्यान में गहराई आती है।
सावधानियां एवं नियम
इस मंत्र के जप के दौरान निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें:
- उच्चारण की स्पष्टता पर विशेष बल दें।
- मन में पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखें कि परमात्मा की कृपा से आप पूरी तरह पवित्र हो चुके हैं।
- साधना काल में तामसिक भोजन और विचारों से दूर रहें।
- यह मंत्र हर प्रकार के कर्मकांड और पूजा से पहले किया जाने वाला सार्वभौमिक मंत्र है, अतः इसके लिए किसी कठिन नियम की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध भाव जरूरी है।