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माँ भगवती शक्ति कृपा · माता गायत्री / सविता देवता Mantra

गायत्री महामंत्र - ॐ भूर्भुवः स्वः सम्पूर्ण 24 अक्षर शक्ति, अर्थ, जप विधि व वैज्ञानिक महत्व

गायत्री महामंत्र के 24 अक्षर, अर्थ, सही जप विधि और वैज्ञानिक महत्व को जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित संपूर्ण जानकारी के लिए पढ़ें।

इष्ट देव माता गायत्री / सविता देवता
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त एवं त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं)
अनुशंसित माला स्फटिक या रुद्राक्ष की माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
सरल हिंदी भावार्थ:

उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक देवस्वरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

सनातन धर्म में 'गायत्री महामंत्र' को समस्त वेदों का मूल, वेदों की माता और ब्रह्मविद्या का बीज कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद के तृतीय मंडल के बासवें सूक्त का दसवां मंत्र है (ऋग्वेद ३.६२.१०)। इस मंत्र के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं, इसके छंद का नाम 'गायत्री' है और इसके देवता सविता (सूर्य) हैं। सविता का अर्थ केवल भौतिक सूर्य नहीं है, बल्कि वह दिव्य एवं प्राणप्रद चैतन्य शक्ति है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को संचालित करती है और प्रत्येक जीव के भीतर चेतना का संचार करती है।

गायत्री मंत्र को वेदों का हृदय कहा गया है। महर्षि वेद व्यास से लेकर आधुनिक काल के योगियों और संतों तक, सभी ने गायत्री मंत्र की महिमा का गान किया है। यह ऐसा सार्वभौमिक मंत्र है जिसमें किसी जाति, वर्ग या लिंग का बंधन नहीं है। यह मनुष्य की सुप्त शक्तियों को जागृत करने वाला महाविज्ञान है।

मूल शुद्ध मंत्र एवं लिपि

गायत्री महामंत्र का मूल संस्कृत स्वरूप देवनागरी लिपि में इस प्रकार है:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

इस मंत्र का सही उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक अक्षर के उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें साधक के चक्रों को जागृत करती हैं। इस मंत्र में कुल चौबीस अक्षर हैं, जो वेदों के चौबीस प्रमुख महाछंदों और चौबीस शक्तियों के प्रतीक माने गए हैं।

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

गायत्री मंत्र के एक-एक शब्द का अर्थ वेदों और उपनिषदों के आधार पर अत्यंत व्यापक और गहरा है:

  • ॐ : प्रणव मंत्र, जो कि संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ध्वनि और परमात्मा का सर्वोच्च निर्गुण नाम है।
  • भूः : भूर्लोक या भूमंडल, जो स्थूल शरीर, पृथ्वी तत्व और प्राण शक्ति का प्रतीक है।
  • भुवः : भुवर्लोक, अंतरिक्ष, मन का क्षेत्र और प्राणों का विस्तार।
  • स्वः : स्वर्लोक, आकाश, विज्ञानमय कोष और परमानंद या आत्मिक शांति का क्षेत्र।
  • तत् : वह अज्ञात, परब्रह्म परमात्मा।
  • सवितुः : सूर्य के समान तेजस्वी, उत्पन्न करने वाले, सविता देवता (परमात्मा)।
  • वरेण्यम् : वरण करने योग्य, सबसे श्रेष्ठ, पूजनीय और अपनाने योग्य।
  • भर्गः : तेज, पापों का नाश करने वाला प्रकाश, आध्यात्मिक उजाला।
  • देवस्य : दिव्य गुणों से युक्त, देवता का, परमात्मा का।
  • धीमहि : हम ध्यान करते हैं, अपने चित्त में धारण करते हैं।
  • धियः : बुद्धियां, वृत्तियां, अंतःकरण।
  • यः : जो।
  • नः : हमारी।
  • प्रचोदयात् : प्रेरित करे, सन्मार्ग पर लगाए, उद्घाटित करे।

संपूर्ण भावार्थ: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक और दिव्य परमात्मा (सविता) का अपने अंतःकरण में ध्यान करते हैं। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे, ताकि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर परम शांति को प्राप्त कर सकें।

चौबीस अक्षरों की गुप्त शक्ति

गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर चौबीस सिद्धियों और चौबीस शक्तियों के भंडार माने जाते हैं। प्रत्येक अक्षर अपने आप में एक बीज मंत्र है:

क्र.सं.अक्षरसंबंधित शक्ति/देवताप्रधान गुण
1तत्श्रीपवित्रता
2सह्रींऐश्वर्य
3विक्लींयश
4तुःऐंबुद्धि
5वसौःसाहस
6रेश्रींबल
7ण्यंह्रींप्रेम
8भःक्लींआनंद
9र्गोऐंआरोग्य
10देसौःतेज
11वश्रींसमर्पण
12स्यह्रींसहयोग
13धीक्लींसंयम
14मऐंअनुशासन
15हिसौःसंतोष
16धिश्रींक्षमा
17योह्रींदया
18योक्लींकरुणा
19नःऐंसेवा
20प्रसौःपरोपकार
21चोश्रींविवेक
22दह्रींजागृति
23यात्क्लींसिद्धि
24ॐप्रणवमोक्ष

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

किसी भी अनुष्ठानिक जप से पूर्व विनियोग और ध्यान करना अनिवार्य माना जाता है ताकि जपकर्ता की ऊर्जा मंत्र के साथ संरेखित हो सके।

विनियोग

दाएं हाथ में जल लेकर विनियोग बोला जाता है और अंत में जल जमीन पर छोड़ दिया जाता है:

अस्य श्री गायत्री मंत्रस्य विश्वामित्र ऋषिः, गायत्री छन्दः, सविता देवता, विश्वामित्रो ऋषिः, ॐ शक्तिः, ॐ बीजं, ॐ कीलकं, गायत्री प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

ध्यान श्लोक

जप से पहले मां गायत्री का मानसिक ध्यान इस प्रकार करना चाहिए:

मुक्ताक्तालयसंस्थितां मणिमयीं हस्तैर्धतीमक्षस्रक् कुण्डिकां च अभयं च वरं दधतीं त्रिमुखैः नेत्रैर्युक्तां त्रिपादयुक्तां त्रिवर्णमण्डितां ध्यायेद्गायत्रीं भवानीं त्रिदिवसुखकरां कामदामुत्रलोकम्।

अर्थात्: जो माता गायत्री मुक्ता और मलय पर्वत पर निवास करती हैं, जिनके हाथों में रुद्राक्ष की माला, कमंडलु, अभय मुद्रा और वर मुद्रा है, जिनके तीन मुख, तीन नेत्र और तीन चरण हैं, जो त्रिवर्णों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद) से मंडित हैं, ऐसी भवानी रूपी गायत्री का हम ध्यान करते हैं जो त्रिलोकी को सुख देने वाली और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

जप विधि व नियम

गायत्री मंत्र का अनुष्ठान या नियमित जप विधि-विधान से करने पर शत-प्रतिशत फल प्राप्त होता है:

  • समय: सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (सूर्यदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व) है। इसके अतिरिक्त त्रिकाल संध्या (प्रातःकाल, मध्याह्न और सूर्यास्त के समय) भी जप किया जा सकता है।
  • स्थान: शांत कमरा, पूजा कक्ष, मंदिर या पवित्र नदी का तट। आसन कुशा या ऊन का होना चाहिए।
  • दिशा: जप करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • माला: स्फटिक, रुद्राक्ष या तुलसी की माला का उपयोग करना चाहिए। माला से जप करते समय सुमेरु को लांघा नहीं जाता।
  • जप संख्या: प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) या 3, 5, 11 माला का नियम रखना चाहिए।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

गायत्री मंत्र के नियमित जप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति होती है:

  • मानसिक शांति व एकाग्रता: विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र बुद्धि, स्मरण शक्ति और एकाग्रता को तीव्र करता है।
  • तेज और ओज की वृद्धि: सूर्य की तरह शरीर और चेहरे पर एक अलग ही दिव्य चमक और ओज उत्पन्न होता है।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर और शरीर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • आरोग्य लाभ: श्वास संबंधी विकार, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याएं दूर होती हैं।
  • आत्मज्ञान और मुक्ति: यह मनुष्य को भवसागर से पार उतारकर आत्मबोध की ओर ले जाता है।

सावधानियां एवं नियम

जप के दौरान निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  • मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। मन में जप करते समय भी शब्दों की स्पष्टता जरूरी है।
  • जप काल में पूर्ण सात्विकता (शाकाहारी आहार, विचार और आचरण) का पालन करें।
  • क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या से दूर रहें।
  • अशुद्ध अवस्था में मानसिक जप ही करें, मुख से उच्चारण न करें।
  1. क्या महिलाएं गायत्री मंत्र का जप कर सकती हैं?

    हाँ, शास्त्रों और पुराणों के अनुसार महिलाएं पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ गायत्री मंत्र का जप कर सकती हैं। इतिहास में गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं ने वेदों और गायत्री साधना में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है।

  2. गायत्री मंत्र का जप करने का सबसे सही समय कौन सा है?

    ब्रह्म मुहूर्त (सूर्यदय से ठीक पहले) गायत्री मंत्र के जप के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसके अलावा प्रातःकाल सूर्योदय के समय भी यह अत्यंत फलदायी होता है।

  3. क्या बिना माला के भी गायत्री मंत्र का जप किया जा सकता है?

    हाँ, आप उंगलियों के पोरों पर (कर-माला) या मानसिक रूप से भी गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं। मानसिक जप का फल सबसे अधिक और सूक्ष्म होता है।

  4. गायत्री मंत्र के कुल कितने अक्षर होते हैं और इनका क्या महत्व है?

    गायत्री मंत्र में कुल 24 अक्षर होते हैं। ये 24 अक्षर वेदों के चौबीस प्रमुख छंदों और चौबीस दिव्य शक्तियों के प्रतीक हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करते हैं।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
बुद्धि का विकास, मानसिक शांति, एकाग्रता, ओज-तेज की वृद्धि और मोक्ष प्राप्ति
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
जप के दौरान पवित्रता, सात्विकता और मौन का विशेष ध्यान रखें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त एवं त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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