माता कामाख्या पौराणिक व्रत कथा संदर्भ एवं व्याख्या सहित

माँ कामाख्या शक्तिपीठ: अम्बुवाची योग और गुप्त साधना का रहस्य

माँ कामाख्या शक्तिपीठ की सम्पूर्ण पौराणिक कथा, अम्बुवाची योग का रहस्य और पूजा विधि। जानिए नील पर्वत पर स्थित इस महाशक्तिपीठ का आध्यात्मिक महत्व और साधना नियम। Read complete Maa Kamakhya Shaktipeeth Ambubachi Yoga Katha Vidhi with puja vidhi & spiritual significance in Hindi.

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प्रस्तावना, पौराणिक उत्पत्ति एवं ग्रंथ संदर्भ

भारतीय आध्यात्मिक चेतना में माँ कामाख्या का स्थान सर्वोपरि है। असम की राजधानी गुवाहाटी के निकट नीलाचल पर्वत पर स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि तंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र और 'महामुद्रा' का प्रतीक है। पौराणिक ग्रंथों जैसे 'कालिका पुराण' और 'देवी भागवत पुराण' के अनुसार, यह इक्यावन शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण 'महापीठ' माना जाता है। यहाँ माता सती का 'योनि' भाग गिरा था, जो स्त्री शक्ति और सृजन की अनंत क्षमता का परिचायक है।

कामाख्या का अर्थ है - 'वह देवी जो इच्छाओं की पूर्ति करती है'। यह स्थान उस दिव्य ऊर्जा का केंद्र है जहाँ शिव और शक्ति का मिलन होता है। यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिलाखंड है जिसे योनि के रूप में पूजा जाता है। इस लेख में हम माँ कामाख्या की उत्पत्ति, अम्बुवाची योग के रहस्य और यहाँ की गुप्त साधना पद्धतियों का विस्तार से वर्णन करेंगे।

तिथि, शुभ मुहूर्त एवं व्रत का माहात्म्य

माँ कामाख्या की साधना और दर्शन के लिए वैसे तो प्रत्येक दिन शुभ है, परंतु 'अम्बुवाची योग' का समय सबसे विशिष्ट माना जाता है। यह पर्व प्रतिवर्ष आषाढ़ मास (जून के मध्य) में आता है, जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है।

  • अम्बुवाची योग: यह समय माता के 'रजस्वला' होने का माना जाता है। इस दौरान तीन दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।
  • माहात्म्य: शास्त्रों के अनुसार, इन तीन दिनों में पृथ्वी की उर्वरता शक्ति अपने चरम पर होती है। इस काल में की गई गुप्त साधना का फल अनंत गुना प्राप्त होता है।
  • विशेष तिथियाँ: नवरात्रि, विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि में यहाँ 'कुमारी पूजा' का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त 'पुष्याभिषेक' और 'मनसा पूजा' भी यहाँ अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाई जाती है।

प्रमुख पात्र एवं दिव्य पृष्ठभूमि

इस पावन कथा के केंद्र में कई दिव्य विभूतियाँ हैं, जिनका संबंध इस शक्तिपीठ की स्थापना और महिमा से है:

  • माता सती: आदिशक्ति का अवतार, जिन्होंने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में देह त्याग दी थी।
  • भगवान शिव: सती के वियोग में तांडव करने वाले और शक्ति के रक्षक।
  • भगवान विष्णु: जिन्होंने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर के अंग किए ताकि सृष्टि का संतुलन बना रहे।
  • कामदेव: प्रेम और इच्छा के देवता, जिन्हें शिव के क्रोध से भस्म होने के बाद इसी स्थान पर पुनः जीवन और रूप प्राप्त हुआ।
  • नरकासुर: एक असुर राजा जिसने देवी को प्राप्त करने का दुस्साहस किया और अंततः देवी के हाथों वध को प्राप्त हुआ।

सम्पूर्ण पौराणिक एवं पावन व्रत कथा

प्राचीन काल की बात है, जब प्रजापति दक्ष ने एक विशाल 'कनखल' यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने समस्त देवताओं, ऋषियों और गंधर्वों को आमंत्रित किया, परंतु अपने ही दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा। माता सती ने जब आकाश मार्ग से देवताओं को जाते देखा, तो उन्होंने महादेव से यज्ञ में जाने का आग्रह किया। शिव ने उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण जाना अपमानजनक हो सकता है, परंतु सती की हठ के आगे वे झुक गए।

जब सती अपने पिता के घर पहुँचीं, तो वहाँ उनका और महादेव का घोर अपमान किया गया। दक्ष ने शिव को 'अमंगलाचारी' और 'कपालधारी' कहकर तिरस्कृत किया। अपने आराध्य और पति का अपमान सती सहन न कर सकीं और उन्होंने यज्ञ की योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर दिया।

सती सती इति जल्पन्तः शिवः प्रलयभैरवः।
भ्रमन् वै त्रैलोक्यं सर्वं सतीदेहं समुद्वहन्॥

जब शिव को यह समाचार मिला, तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने वीरभद्र को भेजकर दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया और सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव करने लगे। उनके क्रोध से संपूर्ण ब्रह्मांड कांपने लगा। सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को ५१ भागों में विभाजित कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे स्थान 'शक्तिपीठ' कहलाए।

नीलाचल पर्वत पर माता सती का 'योनि' भाग गिरा। यहाँ की भूमि दिव्य तेज से प्रज्वलित हो उठी। कालांतर में, जब कामदेव को भगवान शिव ने अपनी तीसरी आँख से भस्म कर दिया था, तब वे अपनी पत्नी रति के साथ इसी स्थान पर आए। उन्होंने यहाँ कठोर तपस्या की और देवी की कृपा से उन्हें पुनः अपना 'काम' (रूप और सौंदर्य) प्राप्त हुआ। इसीलिए इस स्थान का नाम 'कामाख्या' पड़ा।

एक अन्य कथा नरकासुर की है। वह प्राग्ज्योतिषपुर का शक्तिशाली राजा था। उसने देवी कामाख्या की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा। देवी ने एक शर्त रखी - "यदि तुम एक ही रात में, सूर्योदय से पहले, नीलाचल पर्वत के नीचे से मंदिर तक सीढ़ियों का निर्माण कर दोगे, तो मैं तुमसे विवाह करूँगी।" नरकासुर ने अपनी आसुरी शक्तियों से कार्य लगभग पूरा कर लिया था। तब देवी ने माया से एक मुर्गे को समय से पहले ही बांग देने के लिए प्रेरित किया। नरकासुर को लगा कि सुबह हो गई और वह हार गया। क्रोध में उसने उस मुर्गे को मार दिया, परंतु वह स्थान आज भी 'कुक्कुटाचच' के नाम से प्रसिद्ध है और वे अधूरी सीढ़ियाँ 'मेखेलाउजा पथ' कहलाती हैं।

अम्बुवाची योग का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य

अम्बुवाची का शाब्दिक अर्थ है - 'पानी का बोलना' या 'पृथ्वी का रजस्वला होना'। यह एक अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। जिस प्रकार एक स्त्री रजस्वला होने के बाद संतानोत्पत्ति के योग्य होती है, उसी प्रकार माना जाता है कि इन तीन दिनों में धरती माता (देवी) अपनी सृजन शक्ति का नवीनीकरण करती हैं।

इन तीन दिनों में मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक जलधारा बहती है, जो लौह तत्वों की अधिकता के कारण लाल रंग की हो जाती है। इसे देवी का 'रज' माना जाता है। भक्त इस समय मंदिर के बाहर रहकर प्रार्थना करते हैं। चौथे दिन जब कपाट खुलते हैं, तो भक्तों को 'अंगोदक' (पवित्र जल) और 'रक्त वस्त्र' (लाल कपड़ा जो देवी की शिला पर ढका जाता है) प्रसाद के रूप में दिया जाता है। यह वस्त्र सौभाग्य और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।

प्रामाणिक पूजा सामग्री एवं सूची

माँ कामाख्या की पूजा में सात्विक और तांत्रिक दोनों पद्धतियों का समावेश होता है। सामान्य भक्तों के लिए निम्नलिखित सामग्री आवश्यक है:

लाल पुष्प (विशेषकर गुड़हल)लाल सिंदूर (कामाख्या सिंदूर)
लाल चुनरी या वस्त्रधूप, दीप और अगरबत्ती
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)नारियल और ऋतु फल
कलावा (मौली)अक्षत (बिना टूटे चावल)
सुपारी और पान के पत्तेइत्र और कपूर

क्रमबद्ध व्रत पूजन विधि एवं संकल्प नियम

माँ कामाख्या की पूजा के लिए साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए।

  • स्नान एवं शुद्धि: पवित्र नदी या घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें और लाल वस्त्र धारण करें।
  • संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए संकल्प लें।
  • ध्यान: माँ कामाख्या का ध्यान करें। उन्हें एक ऐसी देवी के रूप में देखें जो सिंह पर सवार हैं और जिनके मुखमंडल पर करोड़ों सूर्यों का तेज है।
  • अभिषेक: यदि घर पर यंत्र या चित्र है, तो उसे गंगाजल से शुद्ध करें।
  • अर्पण: माता को लाल पुष्प, सिंदूर और इत्र अर्पित करें।
  • मंत्र जप: 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कामाख्यै नमः' मंत्र का कम से कम १०८ बार जप करें।
  • भोग: माता को हलवा, पूरी या फलों का भोग लगाएं।

ध्यान मंत्र, स्तुति एवं समर्पण श्लोक

साधना के समय इस मंत्र का उच्चारण अत्यंत प्रभावशाली होता है:

कामाख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी।
त्वं देवी जगतां माता योनिमुद्रे नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नील पर्वत पर निवास करने वाली, वर देने वाली देवी कामाख्या! आप संपूर्ण जगत की माता हैं, आपकी योनि मुद्रा को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

समापन आरती एवं क्षमा प्रार्थना

पूजा के अंत में माँ की आरती करें और अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करें:

"हे माँ कामाख्या, मैं मंत्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन हूँ। मैंने जो भी पूजा की है, उसे स्वीकार करें और मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। मेरे परिवार और समस्त जगत का कल्याण करें।"

व्रत के आवश्यक नियम, पारणा विधि एवं सावधानियां

कामाख्या साधना या अम्बुवाची के दौरान कुछ कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • ब्रह्मचर्य: साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • भूमि शयन: संभव हो तो जमीन पर सोएं।
  • अम्बुवाची निषेध: अम्बुवाची के तीन दिनों में भूमि की खुदाई, हल चलाना या बीज बोना वर्जित है।
  • भोजन: सात्विक भोजन ग्रहण करें। लहसुन और प्याज का त्याग करें।
  • पारणा: चौथे दिन मंदिर के कपाट खुलने के बाद या पूजा संपन्न होने के बाद कन्या पूजन करके व्रत का पारण करें।

आधुनिक एवं दैनिक जीवन में कथा की सीख

माँ कामाख्या की कथा हमें सिखाती है कि सृष्टि में स्त्री शक्ति ही समस्त ऊर्जा का मूल है। यह कथा रजस्वला धर्म के प्रति समाज की संकीर्ण सोच को चुनौती देती है और उसे 'पवित्रता' और 'सृजन' के उत्सव के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। कामाख्या का संदेश है कि इच्छाएं (काम) बुरी नहीं हैं, यदि उन्हें धर्म और मर्यादा के साथ जोड़ा जाए। यह हमें धैर्य, समर्पण और अटूट विश्वास की शक्ति सिखाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

अम्बुवाची योग: पृथ्वी के रजस्वला होने का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य

माँ कामाख्या शक्तिपीठ में मनाया जाने वाला अम्बुवाची मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के पुनरुद्धार का एक विशिष्ट कालखंड है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ मास में मृगशिरा नक्षत्र के चतुर्थ चरण से लेकर आर्द्रा नक्षत्र के प्रथम चरण तक की अवधि में माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। इस समय को 'अम्बुवाची योग' कहा जाता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार, जिस प्रकार स्त्री की प्रजनन क्षमता उसके मासिक धर्म से जुड़ी होती है, उसी प्रकार पृथ्वी की सृजन शक्ति का नवीनीकरण इस काल में होता है। यह वह समय है जब प्रकृति अपनी पूर्ण उर्वरता को प्राप्त करने के लिए विश्राम की अवस्था में जाती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस अवधि में ब्रह्मपुत्र नदी के जल में लौह अयस्क (Iron Oxide) की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे जल का रंग रक्त के समान लाल हो जाता है। आध्यात्मिक साधक इसे देवी के रज के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह के द्वार तीन दिनों के लिए पूर्णतः बंद कर दिए जाते हैं। इन तीन दिनों में न तो कोई पूजा-अर्चना होती है और न ही कोई धार्मिक अनुष्ठान सार्वजनिक रूप से किया जाता है। यहाँ तक कि स्थानीय किसान भी इस अवधि में भूमि की खुदाई या बुवाई नहीं करते, क्योंकि पृथ्वी को इस समय 'विश्राम' की आवश्यकता मानी जाती है।

अम्बुवाची योग के दौरान नीलाचल पर्वत की ऊर्जा का स्तर अत्यंत तीव्र हो जाता है। साधकों का मानना है कि इन तीन दिनों में की गई मानसिक साधना अन्य दिनों की तुलना में सहस्त्र गुना अधिक फलदायी होती है। यह समय 'निवृत्ति' का है, जहाँ बाहरी शोर को त्यागकर अंतर्मुखी होने का विधान है। भक्तगण मंदिर के बाहर दीप प्रज्वलित कर माँ के निराकार स्वरूप का ध्यान करते हैं और चौथे दिन जब मंदिर के द्वार खुलते हैं, तो उसे 'शुद्धिकरण' के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

नीलाचल पर्वत पर दस महाविद्याओं का वास और गुप्त तंत्र साधना

कामाख्या मंदिर केवल एक शक्तिपीठ नहीं है, बल्कि यह 'दस महाविद्याओं' का सिद्ध केंद्र है। नीलाचल पर्वत के विभिन्न कोनों में माँ काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला के मंदिर स्थित हैं। अम्बुवाची के दौरान इन सभी महाविद्याओं की ऊर्जा एक बिंदु पर केंद्रित हो जाती है। गुप्त साधना करने वाले अघोरी और तांत्रिक इस समय को 'महायोग' की संज्ञा देते हैं। वे श्मशान साधना और चक्र पूजा के माध्यम से अपनी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं।

"कामाख्यां कामदां काम्यां कामरूप-निवासिनीम्। कामदां कामिनीं काम्याम् कामाख्यां प्रणमाम्यहम्॥" - यह मंत्र साधक को काम और मोक्ष दोनों की प्राप्ति में सहायक होता है, विशेषकर अम्बुवाची के गुप्त काल में।

साधना की दृष्टि से, अम्बुवाची के तीन दिन 'मौन साधना' के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, इन दिनों में माँ कामाख्या अपनी समस्त शक्तियों के साथ 'योनि मुद्रा' में विराजमान रहती हैं। साधक इस समय 'बीज मंत्रों' का जाप करते हैं। यहाँ की साधना में 'वामाचार' और 'दक्षिणाचार' दोनों पद्धतियों का समावेश मिलता है, लेकिन गुप्त साधना का मुख्य उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति के साथ एकाकार होना है।

अंगोदक और रक्त वस्त्र: महाप्रसाद का आध्यात्मिक महत्व

अम्बुवाची उत्सव की समाप्ति पर भक्तों को जो प्रसादम प्राप्त होता है, वह अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी माना जाता है। इसे 'अंगोदक' और 'रक्त वस्त्र' (अम्बुवाची वस्त्र) कहा जाता है। जब तीन दिनों के बाद मंदिर के द्वार खुलते हैं, तो देवी की प्रतिमा (योनि शिला) को सफेद वस्त्रों से ढका जाता है, जो देवी के रज से रक्तवर्ण (लाल) हो जाते हैं। इस लाल वस्त्र के छोटे-छोटे टुकड़ों को भक्तों में वितरित किया जाता है। तंत्र शास्त्र में इस वस्त्र को धारण करना या अपने पूजा स्थल पर रखना सुरक्षा कवच के समान माना गया है।

मान्यता है कि जिस घर में माँ कामाख्या का यह रक्त वस्त्र होता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियाँ, तंत्र बाधा और दरिद्रता का वास नहीं होता। इस वस्त्र को धारण करके साधना करने से एकाग्रता बढ़ती है और इष्ट देव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। वहीं 'अंगोदक' वह जल है जिससे देवी का शुद्धिकरण किया जाता है। इस जल का आचमन करने से शारीरिक व्याधियों से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति का अनुभव होता है।

प्रसाद का प्रकार प्राप्ति का समय आध्यात्मिक लाभ उपयोग की विधि
रक्त वस्त्र (अंगवस्त्र) चौथे दिन (द्वार खुलने पर) सुरक्षा, सौभाग्य और तंत्र बाधा निवारण दाहिनी भुजा पर बांधें या तिजोरी में रखें
अंगोदक (चरणामृत) शुद्धिकरण के पश्चात रोग मुक्ति और आंतरिक शुद्धि श्रद्धापूर्वक आचमन करें
सिंदूर प्रसाद नित्य दर्शन के समय सौभाग्य और आकर्षण शक्ति माथे पर तिलक के रूप में लगाएं

साधकों के लिए विशेष नियम और निषेध

अम्बुवाची काल के दौरान साधना करने वाले भक्तों और सामान्य तीर्थयात्रियों के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन अनिवार्य होता है। इन तीन दिनों में किसी भी प्रकार का मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश वर्जित होता है। साधक जमीन पर शयन करते हैं और केवल फलाहार ग्रहण करते हैं। मंदिर परिसर में अगरबत्ती या दीपक जलाना भी वर्जित होता है, क्योंकि इसे देवी के विश्राम में बाधा माना जाता है।

भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे इस समय केवल 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कामाख्यायै नमः' मंत्र का मानसिक जाप करें। चौथे दिन जब मंदिर के द्वार खुलते हैं, तो सबसे पहले 'धर्मध्वजा' का पूजन होता है और उसके बाद ही सामान्य दर्शन प्रारंभ होते हैं। इस समय उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए प्रशासन और मंदिर ट्रस्ट द्वारा विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं, ताकि भक्तों को माँ के दिव्य स्वरूप के दर्शन सुगमता से हो सकें।

कामाख्या यात्रा और दर्शन हेतु व्यावहारिक निर्देश

यदि आप अम्बुवाची मेले या सामान्य दिनों में माँ कामाख्या के दर्शन की योजना बना रहे हैं, तो कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है और हवाई अड्डे से यह लगभग 20 किलोमीटर दूर है। नीलाचल पर्वत पर चढ़ने के लिए बस और टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन कई श्रद्धालु पैदल मार्ग (मेखला मार्ग) से जाना पसंद करते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

  • दर्शन का समय: सामान्य दिनों में मंदिर सुबह 8:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और फिर दोपहर 2:30 बजे से सूर्यास्त तक खुला रहता है।
  • विशेष पास: शीघ्र दर्शन के लिए मंदिर काउंटर से विशेष टिकट उपलब्ध होते हैं, हालांकि सामान्य कतार में लगने पर माँ के करीब जाने का अधिक समय मिलता है।
  • वेशभूषा: मंदिर में प्रवेश के लिए पारंपरिक भारतीय वेशभूषा (साड़ी, सूट या धोती-कुर्ता) को प्राथमिकता दी जाती है।
  • आस-पास के स्थल: कामाख्या दर्शन के साथ-साथ उमानंद मंदिर (ब्रह्मपुत्र नदी के बीच), वशिष्ठ आश्रम और नवग्रह मंदिर के दर्शन अवश्य करें।

माँ कामाख्या की यह पावन भूमि श्रद्धा और रहस्य का संगम है। यहाँ आने वाला हर भक्त अपनी झोली भरकर ले जाता है। चाहे वह तंत्र का साधक हो या साधारण गृहस्थ, माँ की ममतामयी दृष्टि सभी पर समान रूप से बनी रहती है। अम्बुवाची का यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के चक्र का सम्मान करना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है।

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संपादकीय नीति एवं प्रामाणिकता संदर्भ

यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।

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Vivek.Kumar

भक्तिलोक के वरिष्ठ धार्मिक शोधकर्ता एवं पौराणिक कथा संपादक। सनातन धर्म, व्रत-त्योहारों, वैदिक अनुष्ठानों और भक्ति परंपराओं पर प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने हेतु समर्पित।

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