जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का पौराणिक परिचय एवं महत्त्व
भारतीय सनातन संस्कृति में माताओं द्वारा अपनी सन्तान की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि एवं दीर्घायु के लिए अनेक व्रत एवं उपवास किए जाते हैं। इनमें आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत (जिसे लोकभाषा में जिउतिया, जीउतिया या जिउतिया पर्व भी कहा जाता है) अत्यंत कठोर, पवित्र और महाफलदायी माना गया है। यह व्रत मुख्यतः निर्जला (बिना जल और अन्न ग्रहण किए) रखा जाता है। इस पावन अवसर पर माताएं अपनी सन्तान पर आने वाले समस्त संकटापन्न योगों के निवारण हेतु जीमूतवाहन देव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार, जो माताएं इस व्रत को निष्ठा, नियम और भक्तिभाव से पूर्ण करती हैं, उनकी सन्तान पर आने वाली अकाल मृत्यु का भय टल जाता है। यह व्रत न केवल पुत्र-पुत्रियों की रक्षा करता है, बल्कि वंश वृद्धि और कुल की कीर्ति को भी क्षय होने से बचाता है। इस महाव्रत का सम्बन्ध महाभारत काल तथा सतयुग की दो अत्यंत दिव्य एवं शिक्षाप्रद कथाओं से है—प्रथम गंधर्वराज जीमूतवाहन का आत्मत्याग और द्वितीय चील व सियारिन (चील्हो-सियारी) का पूर्वजन्म वृत्तान्त।
सम्पूर्ण पावन कथा: राजा जीमूतवाहन एवं नागलोक की रक्षा
प्राचीन काल में गंधर्वों के एक परम प्रतापी, धर्मात्मा एवं दयालु राजा थे, जिनका नाम जीमूतवाहन था। जीमूतवाहन केवल प्रजापालक ही नहीं थे, अपितु वे वैराग्य भावना से परिपूर्ण, परोपकारी तथा सर्वजीव-हितैषी थे। उनके पिता ने जब वृद्धावस्था में प्रवेश किया, तो उन्होंने अपना सम्पूर्ण राज्य जीमूतवाहन को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने हेतु वन चले गए। परन्तु जीमूतवाहन का मन राज-काज और भौतिक सुख-भोगों में नहीं रम पाया। उन्होंने सोचा कि केवल राज्य भोगना जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता, परोपकार ही मानव जीवन का सार है। इसलिए वे भी अपने राज्य का भार अपने भाइयों और मंत्रियों को सौंपकर पिता की सेवा और ईश्वर आराधना हेतु वन चले गए।
मलयवती से विवाह एवं वध्यशिला का दर्शन
वन में निवास करते हुए राजा जीमूतवाहन का विवाह सिद्धों के राजा विश्वावसु की अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पुत्री मलयवती के साथ सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् एक दिन जीमूतवाहन वन में भ्रमण कर रहे थे। भ्रमण करते-करते वे समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि सफेद हड्डियों का एक विशाल टीला लगा हुआ है। इस भयावह दृश्य को देखकर जीमूतवाहन का हृदय दहल उठा। उन्होंने पास ही बैठे एक वृद्ध से पूछा—"हे श्रेष्ठ! यहाँ हड्डियों का यह विशाल स्तूप क्यों है? किस प्राणी के अवशेष हैं ये?"
वृद्ध ने करुण स्वर में उत्तर दिया—"हे महात्मन्! यह नागवंश के सर्पों की हड्डियाँ हैं। पक्षीराज गरुड़ प्रतिदिन नागलोक पर आक्रमण करके अनगिनत नागों का भक्षण करते थे। इससे सम्पूर्ण नागलोक विनाश के कगार पर पहुँच गया। तब नागों के राजा वासुकि ने गरुड़देव से प्रार्थना की और दोनों के बीच एक समझौता हुआ। समझौते के अनुसार, नागलोक प्रतिदिन बारी-बारी से एक नाग को गरुड़ के भोजन हेतु 'वध्यशिला' (बलि की शिला) पर भेजेगा। इसके बदले गरुड़देव नागलोक पर सामूहिक आक्रमण नहीं करेंगे। तब से प्रतिदिन एक नाग यहाँ आता है और गरुड़ उसका शिकार करते हैं। यह हड्डियों का ढेर उन्हीं निरपराध नागों का है।"
नागमाता की व्यथा और जीमूतवाहन का महासंकल्प
यह सुनकर जीमूतवाहन का हृदय अत्यंत द्रवित हो उठा। वे सोचने लगे कि केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए दूसरों का बलिचढ़ाना कहाँ का धर्म है? उसी समय जीमूतवाहन ने देखा कि एक वृद्धा नागिन (नागमाता) अपने युवा पुत्र को गले लगाकर बिलख-बिलख कर रो रही थी। उसका पुत्र, जिसका नाम शंखचूड़ था, उस दिन गरुड़ की बलि बनने वाला था। नागमाता का क्रन्दन सुनकर जीमूतवाहन से रहा न गया। वे तुरंत उनके पास पहुँचे और माता के चरण स्पर्श करके बोले—
"हे माता! आप अपने अश्रुओं को रोकें। आज आपका पुत्र गरुड़ का आहार नहीं बनेगा। उसके प्राणों की रक्षा के लिए मैं स्वयं अपने शरीर को गरुड़देव के समक्ष समर्पित करूँगा। मेरे जीते जी किसी माता की गोद सूनी नहीं होगी।"
शंखचूड़ ने इस बात का कड़ा विरोध किया और कहा—"हे धर्मात्मन्! आप एक सर्वगुण सम्पन्न राजा हैं। आपके प्राण अत्यंत मूल्यवान हैं। मैं एक तुच्छ नाग होकर आपके प्राणों की आहुति कैसे ले सकता हूँ? बलि का विधान मेरा है, इसलिए बलि मुझे ही चढ़ना चाहिए।" परन्तु जीमूतवाहन अपने संकल्प पर अडिग रहे। उन्होंने शंखचूड़ को गोकर्ण तीर्थ में पूजा करने हेतु भेज दिया और स्वयं लाल वस्त्र ओढ़कर बलि की शिला (वध्यशिला) पर लेट गए।
पक्षिश्रेष्ठ गरुड़ का आगमन और हृदय परिवर्तन
नियत समय पर पक्षीराज गरुड़ आकाश मार्ग से तीव्र वेग से आए। उन्होंने वध्यशिला पर लाल वस्त्र में लिपटे जीमूतवाहन को देखा और अपने तीखे पंजों में दबाकर विशाल पर्वत के शिखर पर ले गए। गरुड़देव ने अपनी चोंच से जीमूतवाहन के मांस को नोचना प्रारम्भ किया। परन्तु यह क्या? जीमूतवाहन के मुख पर पीड़ा का कोई भाव नहीं था, न ही वे क्रन्दन कर रहे थे। इसके विपरीत, उनके चेहरे पर एक अलौकिक सन्तोष और मन्द मुस्कान थी।
गरुड़देव आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने तुरंत भक्षण करना रोक दिया और पूछा—"हे पुरुष श्रेष्ठ! तुम कौन हो? सामान्यतः कोई भी नाग मेरे भय से काँपने लगता है और प्राणों की भीख माँगता है। परन्तु तुम सहर्ष अपने प्राण दे रहे हो और तुम्हारे चेहरे पर रत्ती भर भी भय नहीं है? सत्य बताओ, तुम कौन हो?"
जीमूतवाहन ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया—"हे पक्षीराज! आप अपना भोजन पूर्ण कीजिए। मेरे परिचय से अधिक महत्त्वपूर्ण आपका भोजन है। एक दुःखी माता के पुत्र की रक्षा करना मेरा परम कर्तव्य था, जो आज पूर्ण हो रहा है।"
उसी समय शंखचूड़ भी दौड़ता हुआ वहाँ पहुँच गया और चिल्लाया—"हे गरुड़देव! रुक जाइए! यह आपका आहार नहीं हैं। ये तो गंधर्वराज जीमूतवाहन हैं। असली नाग तो मैं हूँ, आप मुझे मारिए!"
यह दृश्य देखकर गरुड़देव का हृदय स्तब्ध रह गया। वे जीमूतवाहन के इस अप्रतिम परोपकार और त्याग से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने भावविभोर होकर कहा—"हे महात्मन्! आपने परोपकार की ऐसी मिसाल पेश की है जो तीनों लोकों में दुर्लभ है। आपकी इस भक्ति और त्याग से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। माँगिए, आप क्या वरदान माँगना चाहते हैं?"
जीमूतवाहन ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की—"हे पक्षीराज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि आज के बाद आप किसी भी नाग का भक्षण नहीं करेंगे। और जिन नागों को आपने पूर्व में मार डाला है, उन्हें पुनः जीवनदान प्रदान करें।"
गरुड़देव ने जीमूतवाहन की प्रार्थना स्वीकार की। उन्होंने अमृत की वर्षा करके उन सभी नागों को पुनः जीवित कर दिया जिनकी अस्थियाँ वहाँ एकत्र थीं और भविष्य में कभी सर्पों का भक्षण न करने की प्रतिज्ञा ली। जीमूतवाहन के इस दिव्य त्याग के कारण ही आश्विन कृष्ण अष्टमी को जीमूतवाहन देव की पूजा का विधान प्रारम्भ हुआ। माना जाता है कि जो माताएँ इस दिन राजा जीमूतवाहन का ध्यान करती हैं, उनके पुत्रों की आयु दीर्घ होती है और वे समस्त संकटों से सुरक्षित रहते हैं।
चील और सियारिन की पूर्वजन्म कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत में राजा जीमूतवाहन के साथ-साथ चील (चील्हो) और सियारिन (सियारी) की कथा सुनने का विशेष पौराणिक महत्त्व है। इसके बिना यह व्रत अपूर्ण माना जाता है।
पौराणिक गाथा के अनुसार, एक समय नर्मदा नदी के तट पर एक विशाल पाकड़ (पाकर) का वृक्ष था। उस वृक्ष की ऊपरी शाखाओं पर एक चील रहती थी और वृक्ष के नीचे बनी गुफा में एक सियारिन (मादा गीध/सियार) निवास करती थी। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक बार उन्होंने नगर की स्त्रियों को जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत रखते और जीमूतवाहन देव की पूजा करते देखा। दोनों ने भी तय किया कि वे अपनी सन्तान के कल्याण हेतु यह व्रत अवश्य रखेंगी।
व्रत का पालन और सियारिन का नियम भंग
आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन चील और सियारिन दोनों ने निर्जला उपवास रखा। दिनभर दोनों ईश्वर भक्ति में लीन रहीं। परन्तु रात्रि के समय परिस्थिति बदल गई। जिस श्मशान घाट के समीप वह वृक्ष था, वहाँ किसी धनवान व्यक्ति का दाह-संस्कार किया गया था। रात के अंधकार में अधजले शव की दुर्गन्ध और मांस की महक सियारिन की नासिकाओं तक पहुँची। सियारिन क्षुधा (भूख) सहन न कर सकी। उसकी निष्ठा डगमगा गई। उसने चील से छिपाकर श्मशान जाकर अधजले मांस और हड्डियों का भक्षण कर लिया और जल पीकर अपना व्रत भंग कर दिया।
दूसरी ओर, चील ने अत्यंत नियम, निष्ठा और भक्तिभाव से सम्पूर्ण रात्रि निर्जला उपवास रखा। उसने भूख और प्यास के कष्ट को सहा, परन्तु व्रत के नियमों का तनिक भी उल्लंघन नहीं किया। अगले दिन प्रातःकाल चील ने पूर्ण विधि-विधान से पारण किया।
अगले जन्म की गाथा: चीलावती और कपूरावती
समय बीतने पर कालचक्र के प्रभाव से दोनों की मृत्यु हो गई। अगले जन्म में दोनों ने भास्कर राजा के राज्य में जन्म लिया। चील अपने श्रेष्ठ कर्मों और कठोर व्रत के प्रभाव से राजा की बड़ी पुत्री के रूप में जन्मी, जिसका नाम चीलावती (कहीं-कहीं शीलवती) रखा गया। उसका विवाह राजा के साथ हुआ और वह महारानी बनी। वहीं, नियम भंग करने वाली सियारिन छोटी बहन के रूप में जन्मी, जिसका नाम कपूरावती रखा गया, और उसका विवाह राज्य के मंत्री से हुआ।
चीलावती के जितने भी पुत्र हुए, वे जीमूतवाहन देव की कृपा से अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान, साहसी और दीर्घायु हुए। दूसरी ओर, कपूरावती के गर्भ से जो भी सन्तान जन्म लेती, वह कुछ ही दिनों में मृत्यु को प्राप्त हो जाती अथवा मृत ही पैदा होती थी। कपूरावती अपने पुत्रों के शोक में संतप्त रहने लगी।
कपूरवती की ईर्ष्या और सत्य का बोध
अपनी बहन चीलावती के सात सुंदर और जीवित पुत्रों को देखकर कपूरावती के मन में ईर्ष्या की ज्वाला जलने लगी। उसने चीलावती के पुत्रों को मारने के लिए अनेक षड्यंत्र रचे। उसने चीलावती के पुत्रों के सिर कटवाकर उन्हें ढककर चीलावती के पास भिजवाया। परन्तु जीमूतवाहन देव की असीम कृपा से वे कटे हुए सिर मिट्टी के खिलौनों में बदल गए और चीलावती के पुत्र सही-सलामत खेलत हुए घर लौट आए। कपूरावती का हर षड्यंत्र निष्फल हो गया।
अंततः निराश होकर कपूरावती अपनी बड़ी बहन चीलावती के चरणों में गिर पड़ी और रोते हुए बोली—"हे बहन! मेरी सन्तान बार-बार मृत्यु को प्राप्त हो जाती है, जबकि तुम्हारे पुत्रों का बाल भी बाँका नहीं होता। मैंने तुम्हारे पुत्रों का वध करने का प्रयास किया, फिर भी वे जीवित हैं। इस अलौकिक चमत्कार का रहस्य क्या है?"
तब चीलावती को अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो आया। उसने अपनी बहन से कहा—"हे कपूरावती! तुम्हें अपने पूर्वजन्म का ज्ञान नहीं है। पूर्वजन्म में तुम सियारिन और मैं चील थीं। हम दोनों ने मिलकर जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) का निर्जला व्रत रखा था। परन्तु तुमने भूख के वशीभूत होकर रात में मांस खाकर व्रत तोड़ दिया था, जबकि मैंने भक्तिपूर्वक निर्जल रहकर व्रत पूर्ण किया था। तुम्हारे उसी नियम-भंग का दोष आज तुम्हारी सन्तानों पर पड़ रहा है, जिससे वे जीवित नहीं रहतीं।"
यह सुनकर कपूरावती को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ। उसने जीमूतवाहन देव से क्षमा याचना की और अगले वर्ष से अत्यंत श्रद्धा, निष्ठा और कठोर नियमों के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण किया। इसके प्रभाव से उसे भी दीर्घायु एवं आरोग्य सन्तान की प्राप्ति हुई।
जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत पूजन विधि एवं आवश्यक सामग्री
जीवित्पुत्रिका व्रत तीन दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है। इसकी पूजा विधि निम्नलिखित चरणों में सम्पन्न की जाती है—
व्रत के तीन प्रमुख दिन
- पहला दिन (सप्तमी - नहाय-खाय): इस दिन माताएँ स्नान ध्यान करके केवल शुद्ध और सात्त्विक भोजन ग्रहण करती हैं। भोजन में मड़ुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग, कंद (सतपुतिया/तोरई) आदि शामिल किया जाता है। रात्रि में ओठगन (सरगी) की परम्परा निभाई जाती है।
- दूसरा दिन (अष्टमी - निर्जला व्रत): यह मुख्य व्रत का दिन होता है। पूरे दिन और रात बिना जल और अन्न के कठोर निर्जला उपवास रखा जाता है। सायंकाल या प्रदोष काल में जीमूतवाहन देव और चील-सियारिन की पूजा की जाती है।
- तीसरा दिन (नवमी - पारण): सूर्योदय के पश्चात पूजा करके व्रत का पारण किया जाता है। ब्राह्मणों और निर्धनों को दान दिया जाता है।
पूजा की आवश्यक सामग्री
| पूजा सामग्री | धार्मिक महत्त्व / उपयोग |
|---|---|
| जीमूतवाहन देव की प्रतिमा/चित्र | मुख्य आराध्य देव की स्थापना हेतु |
| कुश (घास) की आकृति | राजा जीमूतवाहन का प्रतीक बनाकर पूजने हेतु |
| गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी | चील और सियारिन की प्रतिमा बनाने के लिए |
| लाला/पीला जिउतिया धागा (धागा) | पूजा के बाद माताओं द्वारा गले में धारण करने हेतु |
| सरसों का तेल व खरी (खली) | चील-सियारिन को अर्पित करने एवं सन्तान के सिर पर लगाने हेतु |
| अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, सिन्दूर | षोडशोपचार पूजन हेतु |
| फल, बांस के पत्ते, चना, मड़ुआ | नैवेद्य (भोग) अर्पण हेतु |
पूजन की चरणबद्ध विधि
- अष्टमी के दिन सायंकाल में पूजा स्थल को स्वच्छ करके गंगाजल से पवित्र करें।
- तालाब या मिट्टी का छोटा स्वरूप (पोखरा) बनाकर वहाँ कुश से राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित करें।
- गोबर और मिट्टी से चील (चील्हो) और सियारिन (सियारी) की आकृति बनाएँ और उन्हें पोखरे के किनारे स्थापित करें।
- जीमूतवाहन देव को अक्षत, चन्दन, सिन्दूर, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
- चील और सियारिन की आकृतियों पर सरसों का तेल और खरी (ससों की खली) चढ़ाएँ। ऐसा माना जाता है कि चील और सियारिन को तेल चढ़ाने से सन्तान को कभी त्वचा संबंधी या अन्य रोग नहीं होते।
- पूजा के दौरान फल, नोनी का साग, भीगा हुआ चना और बांस के पत्ते अर्पित करें।
- तत्पश्चात लाल या पीले रंग का रेशमी 'जिउतिया धागा' पूजा में रखें। इसमें सन्तान की संख्या के अनुसार गाँठें लगाई जाती हैं।
- जीवित्पुत्रिका व्रत की प्रामाणिक कथा (जीमूतवाहन तथा चील-सियारिन की कथा) एकाग्रचित्त होकर सुनें या पढ़ें।
- कथा समाप्ति के बाद आरती करें और जिउतिया धागे को माताएं अपने गले में धारण करें।
जीवित्पुत्रिका व्रत का आध्यात्मिक भावार्थ एवं गूढ़ उपदेश
जीवित्पुत्रिका कथा केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन को ऊँचे आदर्शों की शिक्षा देने वाला एक आध्यात्मिक दर्पण है। इसके मुख्य उपदेश निम्नलिखित हैं—
१. आत्मत्याग और परोपकार (राजा जीमूतवाहन से शिक्षा): राजा जीमूतवाहन का चरित्र सिखाता है कि निज स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के प्राणों की रक्षा करना ही सर्वोच्च धर्म है। जब मनुष्य निष्काम भाव से दूसरों के दुखों को दूर करता है, तो ईश्वर स्वयं उसकी और उसके वंश की रक्षा करते हैं।
२. संकल्प और निष्ठा (चील और सियारिन से शिक्षा): चील और सियारिन की कथा यह दर्शाती है कि भक्ति और व्रत में 'संकल्प की दृढ़ता' का कितना महत्त्व है। चील ने भूख-प्यास सहकर अपना संकल्प पूरा किया और महारानी बनकर दीर्घायु पुत्र प्राप्त किए। वहीं सियारिन ने क्षणिक शारीरिक सुख के लिए अपना व्रत तोड़ा, जिसके दुष्परिणाम उसे जन्मान्तर तक भोगने पड़े। यह गाथा सिखाती है कि संयम और अनुशासन ही जीवन की वास्तविक पूंजी हैं।
व्रत उद्यापन, पारण एवं फलश्रुति
आश्विन कृष्ण नवमी की प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात पुनः स्नान करके सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात् जीमूतवाहन देव का स्मरण करते हुए पारण किया जाता है। पारण में मड़ुआ की रोटी, नोनी का साग, कंदा और भीगे हुए चने का प्रसाद सर्वप्रथम ग्रहण किया जाता है। पारण के पश्चात अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों, कन्याओं एवं निर्धन व्यक्तियों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दान देने का विधान है।
फलश्रुति (व्रत का महाफल)
"जीवित्पुत्रिका व्रत करने से माताओं की सन्तान को दीर्घायु, उत्तम आरोग्यता, विद्या और अपार यश की प्राप्ति होती है। जो स्त्रियाँ इस कथा का श्रवण एवं पठन करती हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर अन्त में उत्तम गति को प्राप्त करती हैं।"
इस प्रकार जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत भारतीय परम्परा का वह स्वर्णिम स्तम्भ है, जो वात्सल्य, त्याग, निष्ठा और धर्म का अलौकिक संदेश देता है।
यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।
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