॥ श्री विष्णुकान्त भगवान की पावन आरती - ॐ जय विष्णुकान्त देवा, स्वामी जय विष्णुकान्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में श्री हरि विष्णु को संपूर्ण ब्रह्मांड का पालनहार, रक्षक और जगत का संचालक माना गया है। भगवान विष्णु के अनेक स्वरूपों में 'विष्णुकान्त' (अर्थात लक्ष्मी जी के प्रिय स्वामी अथवा संपूर्ण कांतियों के आधार) की उपासना अत्यंत फलदायी मानी जाती है। जब भक्त अपनी संपूर्ण श्रद्धा और समर्पण भाव से 'श्री विष्णुकान्त भगवान की पावन आरती' का गान करते हैं, तो उनके जीवन के समस्त कष्ट, ताप और पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। 'ॐ जय विष्णुकान्त देवा, स्वामी जय विष्णुकान्त देवा' की यह अद्भुत आरती साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर उसे परम शांति और मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय विष्णुकान्त देवा, स्वामी जय विष्णुकान्त देवा। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...॥
शेष नाग पर सोए, क्षीर सिंधु वासी, स्वामी क्षीर सिंधु वासी। नारायण जगजीवन, सबके सुखरासी॥ ॐ जय...॥
चतुर्भुज रूप विराजे, शंख चक्र धारी, स्वामी शंख चक्र धारी। गदा पद्म सुशोभित, बलिहारी बलिहारी॥ ॐ जय...॥
पीतांबर मन भावे, मुकुट सिर सोहे, स्वामी मुकुट सिर सोहे। देख रूप तुम्हारा, त्रैलोक्य मन मोहे॥ ॐ जय...॥
माता सहिता लक्ष्मी, चरणों में डोलें, स्वामी चरणों में डोलें। भक्त पुकारें जब ही, करुणा रस बोलें॥ ॐ जय...॥
पाप मिटाओ प्रभु के, भव भय की डोरी, स्वामी भव भय की डोरी। शरण गहे हम आए, छोड़ी ना मोरी॥ ॐ जय...॥
जो कोई आरती गावे, मनवांछित पावे, स्वामी मनवांछित पावे। दुख दरिद्र सब भागे, सुख संपति आवे॥ ॐ जय...॥
ॐ जय विष्णुकान्त देवा, स्वामी जय विष्णुकान्त देवा। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय विष्णुकान्त देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान विष्णु के इस दिव्य स्तवन यानी आरती का एक-एक शब्द गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। आइए इसके भावार्थ को विस्तार से समझें:
प्रथम पद का भाव: "ॐ जय विष्णुकान्त देवा, स्वामी जय विष्णुकान्त देवा। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥"
इस पंक्ति में भक्त भगवान विष्णु को प्रणाम करते हुए कहते हैं कि हे विष्णुकान्त देवा! आपकी जय हो। आप अपने शरण में आए हुए सच्चे भक्तों के बड़े से बड़े संकटों को एक क्षण में हर लेते हैं।
द्वितीय पद का भाव: "शेष नाग पर सोए, क्षीर सिंधु वासी..."
यहाँ भगवान के धाम का वर्णन है। क्षीर सागर (दूध के समुद्र) में शेषनाग की शैया पर विश्राम करने वाले नारायण ही संपूर्ण जगत के जीवन का आधार और सुखों के भंडार हैं।
तृतीय पद का भाव: "चतुर्भुज रूप विराजे, शंख चक्र धारी..."
भगवान विष्णु के चार दिव्य हाथों का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि आपके चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं। आपके इस दिव्य चतुर्भुज स्वरूप पर हम बार-बार बलिहारी जाते हैं।
चतुर्थ पद का भाव: "पीतांबर मन भावे, मुकुट सिर सोहे..."
प्रभु के श्रृंगार का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनके शरीर पर पीतांबर (पीले वस्त्र) अत्यंत मनभावन लगते हैं और सिर पर सुशोभित मुकुट त्रैलोक्य (तीनों लोकों) के जीव मात्र का मन मोह लेता है।
पंचम पद का भाव: "माता सहिता लक्ष्मी, चरणों में डोलें..."
माता महालक्ष्मी जिनके चरणों की सेवा में सदैव तत्पर रहती हैं और जो भक्त के एक बार पुकारने पर ही करुणा से भर जाते हैं, ऐसे दयालु भगवान हमारे आराध्य हैं।
षष्ठ पद का भाव: "पाप मिटाओ प्रभु के, भव भय की डोरी..."
भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! हमारे जन्म-जन्मांतर के पापों को नष्ट कर दीजिए तथा संसार के बंधनों और भय रूपी डोरी को काट दीजिए। हम आपकी शरण में आए हैं, हमारा हाथ कभी मत छोड़ना।
सप्तम पद का भाव: "जो कोई आरती गावे, मनवांछित पावे..."
यह आरती का फलश्रुति भाग है। जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस आरती का गान करता है, वह अपनी सभी मनवांछित इच्छाओं को प्राप्त करता है। उसके घर से दुख और दरिद्र दूर भाग जाते हैं और अपार सुख-संपत्ति का आगमन होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में आरती केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि भगवान के प्रति अगाध प्रेम और कृतज्ञता प्रकट करने का सर्वोच्च माध्यम है। 'श्री विष्णुकान्त आरती' का गान करने से साधक के चक्र जाग्रत होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं। उनकी नियमित आराधना से घर में वास्तु दोष शांत होते हैं, पितृ प्रसन्न होते हैं और माता लक्ष्मी की कृपा स्थायी रूप से बनी रहती है। एकादशी, सत्यनारायण कथा, गुरुवार व्रत और विशेष पर्वों पर इस आरती का पाठ करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
- भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन, अक्षत, और पंचामृत का भोग अर्पित करें।
- शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती दिखाएं।
- इसके बाद पूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता और उच्च स्वर में 'श्री विष्णुकान्त भगवान की आरती' गाएं।
- आरती के पश्चात शंख और घंटी बजाएं तथा दोनों हाथों से आरती की ज्योति लेकर अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक (इसमें रुई की बत्ती या कलावे की बत्ती का प्रयोग करें)।
- कपूर: आरती को अंतिम रूप से प्रज्वलित करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मकता के आह्वान के लिए घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।
- पुष्प और तुलसी दल: भगवान विष्णु को अर्पित करने के लिए ताजे पीले फूल और पवित्र तुलसी के पत्ते।
राग, ताल एवं गायन समय
इस आरती को भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जा सकता है। इसका गायन काल प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या पूजा के समय) अथवा संध्या बेला में अत्यंत फलदायी माना जाता है। ताल के रूप में कहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) का प्रयोग करने से यह आरती बेहद लेययुक्त और कर्णप्रिय बन जाती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो भक्त प्रतिदिन नियम से भगवान विष्णु की इस पावन आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक परिवर्तन आते हैं:
- मानसिक तनाव, चिंता और भय से मुक्ति मिलती है।
- घर-परिवार में सुख-शांति, प्रेम और ऐश्वर्य का वास होता है।
- व्यापार, नौकरी और आजीविका के क्षेत्रों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
- अंतिम समय में मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।