॥ श्री विष्णु भगवान की आरती - ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में भगवान विष्णु को जगत का पालनहार और संपूर्ण ब्रह्मांड का संरक्षक माना जाता है। त्रिदेवों में भगवान विष्णु की स्तुति और उनकी दैनिक पूजा-आराधना से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। संध्याकाल या प्रातःकाल के समय जब भक्त श्रद्धा भाव से 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती का गान करते हैं, तो वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम भगवान विष्णु की इस दिव्य आरती के संपूर्ण बोल, गहन भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि और इसके अनन्त आध्यात्मिक लाभों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का, स्वामी दुःख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी, स्वामी शरण गहूँ किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी, स्वामी तुम अंतरयामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तुम हो एक अगोचर, सबा प्राणपति, स्वामी सबा प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे, स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
विषय विकार मिटাও, पाप హरो देवा, स्वामी पाप హरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
तन मन धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान विष्णु की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह जीव और ब्रह्म के मिलन का एक आध्यात्मिक संवाद है। आइए इस आरती के गूढ़ अर्थ और भावार्थ को विस्तार से समझें:
प्रथम पद का भाव: 'ॐ जय जगदीश हरे' अर्थात हे संसार के पालनहार, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों के सभी प्रकार के संकटों को पल भर में दूर करने वाले हैं। जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, उसके मन के सभी दुख नष्ट हो जाते हैं। उसके घर में सुख-संपत्ति का आगमन होता है और शरीर के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
द्वितीय पद का भाव: भक्त भगवान को अपने माता-पिता के रूप में स्वीकार करते हुए कहता है कि हे प्रभु! आप ही मेरे माता और पिता हैं। अब मैं किसकी शरण में जाऊं? इस संसार में आपके सिवा मेरा अन्य कोई ऐसा सहारा नहीं है जिसकी मैं आशा कर सकूं। आप ही सर्वव्यापक पूर्ण परमात्मा हैं जो सबके मन की बात जानते हैं।
तृतीय पद का भाव: भगवान करुणा और दया के असीम सागर हैं और इस संपूर्ण सृष्टि के पालनहार हैं। भक्त अपनी कमियों का स्वीकार करते हुए कहता है कि हे प्रभु! मैं बुद्धिहीन, दुर्गुणों से युक्त और कामी जीव हूँ, आप मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखें। आप अगोचर और सबके प्राणों के स्वामी हैं, मैं अपनी इस अल्प बुद्धि के साथ आपको किस प्रकार प्राप्त करूँ?
अंतिम पद का भाव: भक्त अपने अहंकार का त्याग करते हुए भगवान को सब कुछ समर्पित कर देता है। वह कहता है कि हे प्रभु! मेरा तन, मन, धन और यह संपूर्ण संपत्ति आपकी ही दी हुई है। 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा' — अर्थात यह सब कुछ आपका ही है और मैं इसे आपके चरणों में ही समर्पित करता हूँ।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में आरती का विशेष स्थान है। पद्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु की आरती करने से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती की रचना पंडित श्रद्धानन्द फिल्लौरी जी द्वारा की गई थी, और आज यह आरती भारत के लगभग हर घर और मंदिर में गाई जाती है। इस आरती में वेदों और उपनिषदों का सार निहित है। एकादशी व्रत, सत्यनारायण कथा, और भगवान विष्णु के किसी भी पावन पर्व पर इस आरती का गान करने से घर में मां लक्ष्मी का स्थाई निवास होता है। यह आरती मनुष्य को भौतिक बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान विष्णु की पूजा और आरती को विधि-विधान के साथ करना अत्यंत फलदायी होता है:
- स्थान की शुद्धता: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और वहां एक साफ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- आचमन और संकल्प: पूजा का आरंभ करने से पहले आचमन करें और अपने गोत्र व नाम का उच्चारण करते हुए विष्णु भगवान की पूजा का संकल्प लें।
- षोडशोपचार पूजा: भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, रो अक्षत, चंदन, पीले वस्त्र, फल और मिठाई अर्पित करें। ध्यान रखें कि भगवान विष्णु को तुलसी दल अति प्रिय है, अतः भोग में तुलसी अवश्य रखें।
- आरती का क्रम: घी या कपूर का दीपक जलाएं। शंख और घंटी बजाते हुए 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती का उच्च स्वर में गान करें। आरती की थाल को भगवान के चरणों से शुरू करते हुए चार बार, नाभि क्षेत्र में दो बार, और मुखमंडल व संपूर्ण शरीर पर सात बार घुमाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
श्री विष्णु आरती को संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री का होना अनिवार्य है:
- शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी दीपक अति उत्तम)
- कपूर और प्रज्वलन की सामग्री
- पूजा की थाल (तांबे, पीतल या चांदी की)
- घंटी और शंख (सकारात्मक ऊर्जा और वायु शुद्धि के लिए)
- ताजे पीले फूल और तुलसी के पत्ते
- रोली, चंदन और अक्षत (चावल)
- चरणामृत और नैवेद्य (भोग के लिए फल या मिष्ठान)
राग, ताल एवं गायन समय
श्री विष्णु भगवान की यह आरती आमतौर पर 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाई जाती है, जो मन में शांति और भक्ति का भाव जागृत करती है। इसे कहरवा या दादरा ताल में गाया जा सकता है। गायन का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय) और संध्याकाल (प्रदोष काल) का होता है। संध्या के समय आरती करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सुख-शांति बनी रहती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से भगवान विष्णु की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: मन का भटकाव दूर होता है और ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ती है।
- आर्थिक समृद्धि: भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे कर्ज और आर्थिक तंगी से मुक्ति मिलती है।
- पापों का शमन: जाने-अनजाने में हुए पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
- पारिवारिक सौहार्द: घर के सदस्यों के बीच प्रेम, एकता और सद्भाव बना रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री विष्णु भगवान की आरती का पाठ कब करना चाहिए?
विष्णु भगवान की आरती का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल और संध्याकाल के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अलावा एकादशी, गुरुवार और सत्यनारायण व्रत के दिन विशेष रूप से यह आरती करनी चाहिए।
क्या आरती के समय तुलसी के पत्तों का होना अनिवार्य है?
हाँ, भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। उनकी पूजा और भोग में तुलसी दल का होना आवश्यक माना जाता है, हालांकि आरती करते समय भी भगवान के चरणों में तुलसी अर्पित की जाती है।
ॐ जय जगदीश हरे आरती के रचयिता कौन हैं?
इस प्रसिद्ध आरती की रचना पंजाब के प्रख्यात लेखक और ब्रह्म समाज के अनुयायी पंडित श्रद्धानन्द फिल्लौरी जी ने की थी।
क्या महिलाएं भगवान विष्णु की आरती कर सकती हैं?
बिल्कुल, सनातन धर्म में भगवान की पूजा, अर्चना और आरती करने का अधिकार स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से प्राप्त है। सच्ची श्रद्धा और पवित्र भाव से की गई आरती भगवान को अवश्य स्वीकार होती है।