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श्री माँ सरस्वती आरती
12 पाठ

श्री सरस्वती माता की आरती - जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन / कल्याण शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री सरस्वती माता की आरती - जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

माँ सरस्वती ज्ञान, विद्या, बुद्धि, कला, संगीत और वाक्‌शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं। सनातन संस्कृति में वसंत पंचमी के पावन पर्व पर विशेष रूप से पूजी जाने वाली माता सरस्वती की वंदना और आरती से साधक को अगाध बुद्धि और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। 'जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता' यह आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक महामंत्र है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ सरस्वती की आरती के संपूर्ण बोल, इसका गहन भावार्थ, पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ टेक॥

चन्द्रवदनी पद्माद्युति, द्युति मंगलकारी।
वाहन राजित हंस पै, सती कुलगृहहारी॥ जय सरस्वती माता...॥

बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहत, गल मोतियन माला॥ जय सरस्वती माता...॥

देव मुनि जन सेजित, पूजा फलदायी।
ज्ञान प्रकाश कर पापे, भव भय हरहारी॥ जय सरस्वती माता...॥

लग्म पुहुप शोभित कर, मुनिजन मन राते।
शिल्प कला दृष्टि दीजै, विद्या दान दाते॥ जय सरस्वती माता...॥

पौराणिक यश गावत, तीनों लोक भवानी।
अमरसुत करैं सेवा, सब गुण की खानी॥ जय सरस्वती माता...॥

माता तुही जगदम्बे, तू ही भण्डार भरती।
नित प्रति पद सेवित, अघ हरनी कर्ति॥ जय सरस्वती माता...॥

आरती सरस्वती मैया की, जो कोई जन गावै।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान सिंधु पावै॥ जय सरस्वती माता...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

माँ सरस्वती की इस दिव्य आरती का एक-एक शब्द गंभीर आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है। आइए इसके भावार्थ को विस्तार से समझते हैं:

'जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता। सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥'
हे माता सरस्वती! आपकी जय हो। आप सभी प्रकार के श्रेष्ठ गुणों, सद्गुणों और ऐश्वर्य से संपन्न हैं। आपकी कीर्ति और यश तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्च और पाताल) में विख्यात है। आप समस्त ब्रह्मांड में ज्ञान की ज्योति फैलाने वाली हैं।

'चन्द्रवदनी पद्माद्युति, द्युति मंगलकारी। वाहन राजित हंस पै, सती कुलगृहहारी॥'
आपका मुखमंडल चंद्रमा के समान शीतल और कांतिवान है। आपके शरीर की प्रभा कमल के समान पवित्र और मंगलकारी है। श्वेत हंस आपका वाहन है, जो विवेक (नीर-क्षीर विवेक) का प्रतीक है। आप सती कुल को पवित्र करने वाली और भक्तों के दुखों का नाश करने वाली हैं।

'बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला। शीश मुकुट मणि सोहत, गल मोतियन माला॥'
माता के बाएं हाथ में संगीत और ब्रह्मांडीय नाद का प्रतीक 'वीणा' सुशोभित है और दाएं हाथ में जप माला (विद्या और एकाग्रता का प्रतीक) है। उनके मस्तक पर मणियों से जटित मुकुट और गले में मोतियों की सुंदर माला शोभायमान है।

'देव मुनि जन सेजित, पूजा फलदायी। ज्ञान प्रकाश कर पापे, भव भय हरहारी॥'
देवता और मुनिगण सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं। आपकी पूजा सभी मनोवांछित फल प्रदान करती है। आप हमारे अंतःकरण में ज्ञान का प्रकाश फैलाकर समस्त पापों और भव-बाधाओं (संसार के भय) को हर लेती हैं।

'लग्म पुहुप शोभित कर, मुनिजन मन राते। शिल्प कला दृष्टि दीजै, विद्या दान दाते॥'
आपके हाथों में शोभित पुष्प और माला मुनियों के मन को मुग्ध करते हैं। हे विद्या की दात्री! हमें उत्तम शिल्प कला, सृजनात्मकता और प्रचुर विद्या का दान प्रदान करें, जिससे हमारा जीवन सार्थक हो सके।

'पौराणिक यश गावत, तीनों लोक भवानी। अमरसुत करैं सेवा, सब गुण की खानी॥'
आपके पौराणिक यश का गान तीनों लोकों में किया जाता है। देवता और ऋषिगण आपकी सेवा करते हैं, क्योंकि आप समस्त गुणों और कलाओं की खान (खजाना) हैं।

'माता तुही जगदम्बे, तू ही भण्डार भरती। नित प्रति पद सेवित, अघ हरनी कर्ति॥ जय सरस्वती माता...'
हे माता! आप ही जगदंबा हैं और आप ही भक्तों के ज्ञान तथा समृद्धि के भंडार भरती हैं। प्रतिदिन आपके चरण कमलों की सेवा करने से हमारे सभी पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं।

'आरती सरस्वती मैया की, जो कोई जन गावै। हितकारी सुखकारी, ज्ञान सिंधु पावै॥'
जो भी मनुष्य सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ माता सरस्वती की इस आरती का गायन करता है, उसे माता अपार सुख, कल्याण प्रदान करती हैं और वह साधक ज्ञान के असीम समुद्र (ज्ञान सिंधु) को प्राप्त कर लेता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, माँ सरस्वती ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और उनकी शक्ति हैं। वे शुक्लवर्णा, श्वेत पद्मासना और वीणापाणि हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि सृष्टि के आरंभ में जब संपूर्ण ब्रह्मांड मूक और शांत था, तब ब्रह्मा जी ने माँ सरस्वती के अनुरोध पर अपनी कमंडल से जल छिड़ककर उनके हाथों की वीणा से 'नाद' उत्पन्न किया था। इसी नाद से संसार को वाणी, स्वर और भाषा की प्राप्ति हुई।

विद्यारंभ संस्कार, वसंत पंचमी, महानिशा पूजा और विद्यालयों-universities में माँ सरस्वती की आरती का विशेष स्थान है। यह आरती छात्रों, कलाकारों, संगीतकारों, शोधकर्ताओं और लेखकों के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है। मान्यता है कि नियमित रूप से इस आरती का गान करने से बुद्धि की जड़ता समाप्त होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है और वाणी में मधुरता तथा सत्यता का वास होता है.

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. शुचिता एवं स्नान: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर श्वेत या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। माँ सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर को चौकी पर श्वेत या पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
  3. संकल्प एवं आवाहन: अक्षत, रोली, पुष्प और श्वेत चंदन अर्पित कर माता का मानसिक आवाहन करें।
  4. दीप प्रज्वलन: गाय के घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
  5. पुष्प एवं भोग: माता को श्वेत पुष्प (विशेषकर मोगरा, चमेली या श्वेत कमल) और पीले चावल (केसर युक्त खीर या बेसन के लड्डू) का भोग लगाएं।
  6. आरती गान: तांबे या पीतल की थाल में दीपक, कपूर और फूल रखकर पूरी श्रद्धा और लयबद्धता के साथ 'जय सरस्वती माता' आरती का गान करें।
  7. प्रदक्षिणा एवं क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात थाल को घुमाकर स्वयं की तीन परिक्रमा करें, कपूर की आरती लें और अंत में अनजाने में हुई भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

माँ सरस्वती की आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री का होना आवश्यक है:

  • पूजा थाल: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीप: शुद्ध गाय के घी का दीपक (रुई की बाती के साथ)।
  • कपूर: आरती को प्रज्वलित करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
  • घंटी (Ghanti): आरती के दौरान सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मकता को दूर भगाने के लिए।
  • शंख (Shankh): आरती के प्रारंभ और अंत में शंखनाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • पुष्प और अक्षत: थाली में ताजे श्वेत फूल और बिना टूटे हुए चावल (अक्षत)।
  • धूप और अगरबत्ती: सुगंधित धूप जो मन को एकाग्र करती है।
  • नैवेद्य/भोग: माता को अर्पित करने के लिए मखाने, खीर, या फल।
  • राग, ताल एवं गायन समय

    संगीत की देवी सरस्वती की आरती का गायन यदि शास्त्रीय संगीत के नियमों के अनुसार किया जाए, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:

    • उचित राग: इस आरती को 'राग कल्याण', 'राग यमन' या 'राग भैरवी' में बहुत ही मधुरता से गाया जा सकता है। ये राग मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करते हैं।
    • ताल: इसे कहवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) की सरगम के साथ आसानी से गाया जा सकता है।
    • गायन समय: सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योत्सव के समय) या संध्याकाल (प्रदोष काल) का है। वसंत पंचमी के दिन इसका विशेष सामूहिक गायन छात्रों द्वारा किया जाता है।

    दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

    नियमित रूप से माँ सरस्वती की आरती करने के अनगिनत आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ हैं:

    • मानसिक एकाग्रता: विद्यार्थियों की बुद्धि कुशाग्र होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
    • वाक् सिद्धि: वक्ताओं, कवियों और गायकों की वाणी में ओज और माधुर्य उत्पन्न होता है।
    • अज्ञान का नाश: मन के अंधकार, अज्ञान और भ्रम दूर होकर विवेक की प्राप्ति होती है।
    • नकारात्मकता से मुक्ति: घर में सकारात्मक ऊर्जा, शांति और वैचारिक समृद्धि का वास होता है।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

    माँ सरस्वती की आरती किस दिन विशेष रूप से करनी चाहिए?

    माँ सरस्वती की आरती प्रतिदिन प्रातः और संध्या के समय की जा सकती है। हालांकि, वसंत पंचमी, बुधवार, गुरुवार और शारदीय नवरात्र के पंचमी (स्कंदमाता/सरस्वती पूजा) के दिन इसका विशेष अनुष्ठान और आरती अत्यंत फलदायी होती है।

    क्या सरस्वती आरती के समय श्वेत वस्त्र पहनना अनिवार्य है?

    अनिवार्य तो नहीं है, परंतु श्वेत या पीले वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि श्वेत रंग शांति, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है, जो माता सरस्वती को अत्यंत प्रिय है।

    छात्रों को एकाग्रता के लिए कौन सा मंत्र जपना चाहिए?

    आरती के पश्चात छात्रों को 'ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः' मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) का जाप करना चाहिए। इससे बौद्धिक विकास तीव्र गति से होता है।

    क्या घर पर माँ सरस्वती की मूर्ति रखना उचित है?

    हाँ, घर के अध्ययन कक्ष (Study Room) या पूजा घर में माँ सरस्वती की शांत मुद्रा वाली, वीणा और पुस्तक धारण की हुई श्वेत प्रतिमा या तस्वीर रखना अत्यंत शुभ होता है।

१. श्री सरस्वती माता की आरती - जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ सरस्वती के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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