॥ श्री संतोषी माता की पावन आरती - जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★हिन्दू सनातन धर्म में देवी संतोषी को साक्षात शांति, संतोष, संयम और वैभव की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। माँ संतोषी भगवान गणेश की पुत्री मानी जाती हैं और उनके दर्शन मात्र से जीवन के समस्त क्लेश, संताप और असंतोष का नाश हो जाता है। विशेष रूप से शुक्रवार के दिन माता संतोषी का व्रत और उनकी पावन आरती करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि, अखंड शांति और ऐश्वर्य का वास होता है। 'जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता' यह पावन आरती न केवल कर्णप्रिय है, बल्कि यह भक्त के अंतःकरण को दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। इस विस्तृत लेख में हम माता संतोषी की आरती के संपूर्ण बोल, उनके प्रत्येक पद का गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि, आवश्यक सामग्री और इसके जीवनोपयोगी आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण रसास्वादन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥
(जय संतोषी माता...)
सुंदर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्ही।
हीरा पन्ना जिटित, छवि सुंदर चीन्ही॥
(जय संतोषी माता...)
बांय भुजा कर जोजे, वरमुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥
(जय संतोषी माता...)
भुज चार चतुर्भुजा संतन सुखकारी।
रूप निरखत मन मोहे, त्रिभुवन बलिहारी॥
(जय संतोषी माता...)
धरयो सहस्र सिंहासन, बहुत राजै चंवर ढुरै प्यारे।
देखत रूप निरालो, सब जग बलिहारी॥
(जय संतोषी माता...)
घमकारत घुंघरू बाजत पैंजनिया।
सुर नर मुनि जन गावत, करत जय जयकार अनघनिया॥
(जय संतोषी माता...)
ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, तुम समन त्रिशूला।
चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत खुला॥
(जय संतोषी माता...)
छप्पन भोग धरे हैं, फल मेवा सजाई।
मधुर ध्वनित धुनि बाजत, मन अति हरषाई॥
(जय संतोषी माता...)
दासी जो जन ध्यावै, मनवांछित फल पावै।
पूजा विधि जो जाने, नित्यानंद पावै॥
(जय संतोषी माता...)
संतोषी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
रिद्धि सिद्धि सुख संपति, जी भर कर पावे॥
(जय संतोषी माता...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माता संतोषी की यह आरती केवल स्तुति नहीं है, अपितु यह भक्त और भगवान के बीच के अनन्य प्रेम का जीवंत दस्तावेज है। आइए इस पावन आरती के हर एक चरण के गूढ़ अर्थ को समझें:
प्रारंभिक चरण: 'जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥' - इस पंक्ति में भक्त माता की जयकार करते हुए उन्हें अपनी समस्त सुखों और संपत्तियों की प्रदायिनी के रूप में स्वीकार करता है। माँ अपने शरणागत भक्तों को कभी भी दुखी नहीं होने देतीं और उनकी झोली खुशियों से भर देती हैं।
स्वरूप वर्णन: 'सुंदर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्ही। हीरा पन्ना जिटित, छवि सुंदर चीन्ही॥' - इस भाग में माता के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन है। माँ ने सुनहरे रंग के अत्यंत सुंदर वस्त्र धारण किए हैं और उनके आभूषणों में हीरे-पन्ना जड़े हुए हैं, जिनकी चमक से उनका पूरा स्वरूप दिव्य प्रतीत होता है।
चतुर्भुज रूप और वरमुद्रा: 'बांय भुजा कर जोजे, वरमुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥' - माता के चार हाथ हैं, जो भक्तों को अभय और वरदान प्रदान करने की मुद्रा में रहते हैं। जो भी स्त्री-पुरुष सच्चे मन से माता की सेवा या व्रत करते हैं, वे अपनी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण पाते हैं।
ब्रह्मांडीय उपस्थिति: 'ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, तुम समन त्रिशूला। चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत खुला॥' - इस पंक्ति में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) और समस्त योगिनियों द्वारा माता की महिमा गाने का प्रसंग है। संपूर्ण ब्रह्मांड माँ संतोषी की आराधना में लीन रहता है।
आरती का फल: 'संतोषी जी की आरती, जो कोई नर गावे। रिद्धि सिद्धि सुख संपति, जी भर कर पावे॥' - अंत में माँ की आरती करने वाले के जीवन की समस्त दरिद्रता दूर हो जाती है और उसे रिद्धि-सिद्धि के साथ-साथ अपार सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू संस्कृति में संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। 'संतोषं परमं सुखम्'। आधुनिक युग में जहाँ मनुष्य लगातार दौड़-भाग और असंतोष के चक्रव्यूह में फंसा है, वहाँ संतोषी माता की पूजा और उनकी आरती मानसिक शांति का सबसे बड़ा उपचार है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ संतोषी भगवान गणेश की मानस पुत्री हैं। उनकी उत्पत्ति का उद्देश्य भक्तों के जीवन से असंतोष, ईर्ष्या, द्वेष और आर्थिक तंगी को दूर करना था। शुक्रवार के व्रत और इस आरती के माध्यम से महिलाओं, बालिकाओं और गृहस्थों में संयम, सहनशीलता और पारिवारिक सौहार्द की भावना का विकास होता है। इस आरती को गाने से राहु, केतु और शनि के कुप्रभाव भी शांत होते हैं क्योंकि यह देवी सीधे तौर पर मन को स्थिर करने वाली हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता जब उसे विधि-विधान से संपन्न किया जाए। संतोषी माता की आरती के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
- शुक्रवार के दिन प्रातः काल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, विशेषकर गुलाबी या लाल रंग के वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को अच्छी तरह से साफ करके गंगाजल छिड़काव करें।
- माता संतोषी की प्रतिमा या तस्वीर को एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
- माता के सामने शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती दिखाएं।
- नैवेद्य के रूप में गुड़ और चने का प्रसाद विशेष रूप से अर्पित करें, क्योंकि संतोषी माता को यह अत्यंत प्रिय है।
- आरती शुरू करने से पहले तीन बार घंटी बजाएं ताकि नकारात्मक ऊर्जा दूर हो और सकारात्मकता का संचार हो।
- आरती करते समय थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम चार बार ऊपर-नीचे घुमाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
संतोषी माता की पूजा और आरती को निष्पादित करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:
- तांबे या पीतल की थाल: जिसपर कुमकुम और अक्षत से स्वास्तिक बनाया गया हो।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का मिट्टी या पीतल का दीपक।
- कपूर: आरती के अंत में कपूर प्रज्वलित करने के लिए।
- घंटी और शंख: ध्वनि के माध्यम से वातावरण को पवित्र करने हेतु।
- पुष्प और माला: माता को अर्पित करने के लिए लाल गुलाब या सुगंधित फूल।
- प्रसाद: गुड़ और भुने हुए चने (यह संतोषी माता के व्रत और आरती का मुख्य प्रसाद है)।
- अक्षत (सासाबित चावल): आरती के अंत में भक्तों पर छिड़कने और माता को अर्पित करने के लिए।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से 'जय संतोषी माता' की यह आरती अत्यंत मधुर और सरल ताल में गाई जाने वाली रचना है। इसे सामान्यतः राग कल्याण या राग यमन के सुरों में गाया जाता है, जो मन को असीम शांति प्रदान करता है।
- गायन समय: इस आरती को करने का सबसे उत्तम समय शुक्रवार की संध्या बेला (गोधूलि बेला) या प्रातः कालीन पूजा के तुरंत बाद है।
- ताल: इसे कहहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल में आसानी से गाया जा सकता है, जिससे महिलाएं और बच्चे भी समूह में इसे सुर में सुर मिलाकर गा सकें।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से संतोषी माता की आरती करने और उनके व्रत का पालन करने से मनुष्य के जीवन में अद्भुत बदलाव आते हैं:
- मानसिक शांति: अत्यधिक तनाव और चिंता से घिरे व्यक्तियों को इस आरती से मानसिक संबल मिलता है।
- पारिवारिक कलह का नाश: घर के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम बढ़ता है और मनमुटाव समाप्त होते हैं।
- आर्थिक संपन्नता: अटके हुए धन की प्राप्ति होती है और व्यवसाय या नौकरी में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
- संतान सुख: विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य और सुयोग्य संतान की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।