पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माँ संतोषी आरती
49 पाठ

श्री संतोषी माता की आरती - जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री संतोषी माता की आरती - जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

माँ संतोषी हिंदू धर्म में संतोष, शांति, धैर्य और समृद्धि की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। शुक्रवार का दिन माता संतोषी को समर्पित है और इस दिन उनके भक्त सोलह शुक्रवार का व्रत रखकर विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। माँ संतोषी की यह लोकप्रिय आरती उनके भक्तों के जीवन से दुखों, संतापों और असंतोष का नाश कर सुख-शांति प्रदान करती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ संतोषी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की विधि, आवश्यक सामग्री और इसके धार्मिक महत्व का संपूर्ण वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥ जय...॥

सुंदर चीर सुनעה, राजी मन सोहे।
मूरत कोटि चन्द्रा, सत समाज मोहे॥ जय...॥

राह धरत चतुर्भुज, चार भुजा धारी।
रोचन तिलक विराजे, मंजन भये वारी॥ जय...॥

वीन और वादक बाजे, ढोल मृदंग बाजे।
सुता सुशोभित स्वरण, गहने अति साजे॥ जय...॥

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारा।
धूप दीप नैवेद्य, चरणन में धारा॥ जय...॥

गगन मंडल से उतरी, दर्शन तुम दीन्हा।
राज्य भ्रष्ट को राज, सुत ही को धन दीन्हा॥ जय...॥

सुखी करे नित जन को, माया तुम भारी।
जो जन सेवा करै, सो नर सुखारी॥ जय...॥

ध्यान धरू जो तेरा, मन वांछित फल पावै।
पूजा करे जो तेरी, निश्चय ही तर जावै॥ जय...॥

बिन मांगत वर पावै, सो जन अति प्यारा।
मैया शरणागत आए, भवसागर तारा॥ जय...॥

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥ जय संतोषी माता॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥
भावार्थ: हे माँ संतोषी! तुम्हारी जय हो, तुम्हारी जय हो। तुम अपने सभी भक्तों और सेवकों को सभी प्रकार के सुख, वैभव और संपत्ति प्रदान करने वाली हो। तुम्हारे चरणों में आने मात्र से ही जीवन की समस्त दरिद्रता समाप्त हो जाती है।

सुंदर चीर सुनעה, राजी मन सोहे।
मूरत कोटि चन्द्रा, सत समाज मोहे॥
भावार्थ: माता ने अत्यंत सुंदर वस्त्र धारण किए हुए हैं, जिन्हें देखकर मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है। आपकी रूप-छवि करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतिवान और मन को मोहने वाली है, जिसे देखकर साधु-संतों और भक्तों का समाज मंत्रमुग्ध हो जाता है।

राह धरत चतुर्भुज, चार भुजा धारी।
रोचन तिलक विराजे, मंजन भये वारी॥
भावार्थ: माँ संतोषी चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं, जिनके हाथों में विभिन्न प्रकार की मुद्राएं और अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। उनके मस्तक पर गोरोचन और कुमकुम का दिव्य तिलक सुशोभित है, जिस पर न्योछावर होने को मन करता है।

वीन और वादक बाजे, ढोल मृदंग बाजे।
सुता सुशोभित स्वरण, गहने अति साजे॥
भावार्थ: माता की पूजा के समय वीणा, वाद यंत्र, ढोल और मृदंग बज रहे हैं। माँ के अंगों पर सोने के अत्यंत सुंदर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं जो उनकी दिव्यता को और बढ़ा रहे हैं।

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारा।
धूप दीप नैवेद्य, चरणन में धारा॥
भावार्थ: माता स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान हैं और उनके ऊपर सुंदर चंवर डुलाया जा रहा है। भक्त उनके चरणों में धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित कर रहे हैं।

गगन मंडल से उतरी, दर्शन तुम दीन्हा।
राज्य भ्रष्ट को राज, सुत ही को धन दीन्हा॥
भावार्थ: हे माता! आप भक्तों की पुकार सुनकर आकाश मंडल से उतरकर उन्हें अपने प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं। आपने ही राज्यभ्रष्ट राजाओं को उनका राज्य और पुत्रहीन को संतान व धन प्रदान किया है।

सुखी करे नित जन को, माया तुम भारी।
जो जन सेवा करै, सो नर सुखारी॥
भावार्थ: आपकी माया अपरंपार है और आप निरंतर अपने भक्तों को सुख प्रदान करती हैं। जो भी मनुष्य श्रद्धा और भाव के साथ आपकी सेवा करता है, वह इस संसार में सबसे अधिक सुखी होता है।

ध्यान धरू जो तेरा, मन वांछित फल पावै।
पूजा करे जो तेरी, निश्चय ही तर जावै॥
भावार्थ: जो भी भक्त एकाग्रचित्त होकर आपका ध्यान करता है, वह अपने मन की समस्त इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है। जो सच्ची श्रद्धा से आपकी पूजा करता है, वह इस भवसागर से निश्चित रूप से तर जाता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

माँ संतोषी की आरती का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि भक्तों के आंतरिक संतोष और आध्यात्मिक शांति का मार्ग है। पुराणों और लोक कथाओं के अनुसार, माँ संतोषी की आराधना विशेष रूप से शुक्रवार के दिन की जाती है। संतोषी माता व्रत कथा में यह वर्णित है कि कैसे रानी मालवा और अन्य भक्तों ने माँ की कृपा प्राप्त की। जब कोई व्यक्ति जीवन में अत्यधिक मानसिक अशांति, पारिवारिक कलह, धन का अभाव या शत्रु भय से घिरा होता है, तब माँ संतोषी की आरती और व्रत उसके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लाते हैं। यह आरती साधक के मन में संतोष का भाव जगाती है, जो कि सच्ची सुख-शांति की कुंजी है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  • शुद्धता एवं स्नान: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नाननुरूप स्वच्छ वस्त्र धारण करें, विशेषकर शुक्रवार के दिन लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। वहां माता संतोषी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
  • अखंड दीप प्रज्वलन: माता के समक्ष घी या तैल का दीपक जलाएं। साथ ही धूप और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
  • नैवेद्य अर्पण: माता को गुड़ और चने का भोग अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा फल और जल का अर्पण करें।
  • आरती के दौरान घंटी और शंखनाद अवश्य करें तथा पूरे परिवार के साथ श्रद्धापूर्वक आरती गाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

सामग्री का नाममहत्व एवं उपयोग
पूजा की थालीचांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ थाली जिसमें सभी पूजन सामग्री सजी हो।
शुद्ध घी का दीपकमाता की आरती उतारने के लिए कपास की बत्ती और शुद्ध घी से युक्त दीपक।
कपूरआरती के अंत में वातावरण को पवित्र करने और माता की आरती को पूर्ण करने हेतु।
घंटी एवं शंखनकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करने के लिए।
गुड़ और चनामाता संतोषी का मुख्य प्रसाद जो विशेष रूप से अर्पित किया जाता है।
कुमकुम और अक्षततिलक लगाने और पूजा की थाली को सजाने के लिए।

राग, ताल एवं गायन समय

माँ संतोषी की आरती को पारंपरिक रूप से 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जाता है, जो मन को शांति और दिव्यता प्रदान करती हैं। इसे ताल कहरा या दादरा में गाया जा सकता है। आरती का सबसे उत्तम समय संध्याकाल (प्रदोष काल) का होता है, जब सूर्यास्त हो रहा हो। इसके अलावा शुक्रवार के दिन सुबह और शाम दोनों समय इस आरती का गान विशेष फलदायी माना गया है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से माँ संतोषी की आरती करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति: मन में व्याप्त चिंता, तनाव और अशांति का नाश होता है तथा संतोष की प्राप्ति होती है।
  • पारिवारिक सौहार्द: घर-परिवार में प्रेम, एकता और सुख-समृद्धि का वास होता है।
  • दरिद्रता का नाश: आर्थिक संकट दूर होते हैं और आय के नए स्रोत खुलते हैं।
  • नकारात्मकता का अंत: घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री संतोषी माता की आरती - जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ संतोषी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

संबंधित पावन आरतियाँ

समस्त आरतियाँ देखें →

भक्त विचार एवं टिप्पणियां (0)

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सर्वप्रथम अपने भक्ति विचार साझा करें!

भगवान श्री माँ संतोषी जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

श्री माँ संतोषी की समस्त आरतियाँ
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!