॥ श्री संतोषी माता की आरती - जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माँ संतोषी हिंदू धर्म में संतोष, शांति, धैर्य और समृद्धि की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। शुक्रवार का दिन माता संतोषी को समर्पित है और इस दिन उनके भक्त सोलह शुक्रवार का व्रत रखकर विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। माँ संतोषी की यह लोकप्रिय आरती उनके भक्तों के जीवन से दुखों, संतापों और असंतोष का नाश कर सुख-शांति प्रदान करती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ संतोषी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की विधि, आवश्यक सामग्री और इसके धार्मिक महत्व का संपूर्ण वर्णन प्रस्तुत कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥ जय...॥
सुंदर चीर सुनעה, राजी मन सोहे।
मूरत कोटि चन्द्रा, सत समाज मोहे॥ जय...॥
राह धरत चतुर्भुज, चार भुजा धारी।
रोचन तिलक विराजे, मंजन भये वारी॥ जय...॥
वीन और वादक बाजे, ढोल मृदंग बाजे।
सुता सुशोभित स्वरण, गहने अति साजे॥ जय...॥
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारा।
धूप दीप नैवेद्य, चरणन में धारा॥ जय...॥
गगन मंडल से उतरी, दर्शन तुम दीन्हा।
राज्य भ्रष्ट को राज, सुत ही को धन दीन्हा॥ जय...॥
सुखी करे नित जन को, माया तुम भारी।
जो जन सेवा करै, सो नर सुखारी॥ जय...॥
ध्यान धरू जो तेरा, मन वांछित फल पावै।
पूजा करे जो तेरी, निश्चय ही तर जावै॥ जय...॥
बिन मांगत वर पावै, सो जन अति प्यारा।
मैया शरणागत आए, भवसागर तारा॥ जय...॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥ जय संतोषी माता॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता॥
भावार्थ: हे माँ संतोषी! तुम्हारी जय हो, तुम्हारी जय हो। तुम अपने सभी भक्तों और सेवकों को सभी प्रकार के सुख, वैभव और संपत्ति प्रदान करने वाली हो। तुम्हारे चरणों में आने मात्र से ही जीवन की समस्त दरिद्रता समाप्त हो जाती है।
सुंदर चीर सुनעה, राजी मन सोहे।
मूरत कोटि चन्द्रा, सत समाज मोहे॥
भावार्थ: माता ने अत्यंत सुंदर वस्त्र धारण किए हुए हैं, जिन्हें देखकर मन अत्यंत प्रसन्न हो जाता है। आपकी रूप-छवि करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांतिवान और मन को मोहने वाली है, जिसे देखकर साधु-संतों और भक्तों का समाज मंत्रमुग्ध हो जाता है।
राह धरत चतुर्भुज, चार भुजा धारी।
रोचन तिलक विराजे, मंजन भये वारी॥
भावार्थ: माँ संतोषी चतुर्भुज रूप में विराजमान हैं, जिनके हाथों में विभिन्न प्रकार की मुद्राएं और अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। उनके मस्तक पर गोरोचन और कुमकुम का दिव्य तिलक सुशोभित है, जिस पर न्योछावर होने को मन करता है।
वीन और वादक बाजे, ढोल मृदंग बाजे।
सुता सुशोभित स्वरण, गहने अति साजे॥
भावार्थ: माता की पूजा के समय वीणा, वाद यंत्र, ढोल और मृदंग बज रहे हैं। माँ के अंगों पर सोने के अत्यंत सुंदर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं जो उनकी दिव्यता को और बढ़ा रहे हैं।
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारा।
धूप दीप नैवेद्य, चरणन में धारा॥
भावार्थ: माता स्वर्ण के सिंहासन पर विराजमान हैं और उनके ऊपर सुंदर चंवर डुलाया जा रहा है। भक्त उनके चरणों में धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) अर्पित कर रहे हैं।
गगन मंडल से उतरी, दर्शन तुम दीन्हा।
राज्य भ्रष्ट को राज, सुत ही को धन दीन्हा॥
भावार्थ: हे माता! आप भक्तों की पुकार सुनकर आकाश मंडल से उतरकर उन्हें अपने प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं। आपने ही राज्यभ्रष्ट राजाओं को उनका राज्य और पुत्रहीन को संतान व धन प्रदान किया है।
सुखी करे नित जन को, माया तुम भारी।
जो जन सेवा करै, सो नर सुखारी॥
भावार्थ: आपकी माया अपरंपार है और आप निरंतर अपने भक्तों को सुख प्रदान करती हैं। जो भी मनुष्य श्रद्धा और भाव के साथ आपकी सेवा करता है, वह इस संसार में सबसे अधिक सुखी होता है।
ध्यान धरू जो तेरा, मन वांछित फल पावै।
पूजा करे जो तेरी, निश्चय ही तर जावै॥
भावार्थ: जो भी भक्त एकाग्रचित्त होकर आपका ध्यान करता है, वह अपने मन की समस्त इच्छाओं को प्राप्त कर लेता है। जो सच्ची श्रद्धा से आपकी पूजा करता है, वह इस भवसागर से निश्चित रूप से तर जाता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
माँ संतोषी की आरती का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि भक्तों के आंतरिक संतोष और आध्यात्मिक शांति का मार्ग है। पुराणों और लोक कथाओं के अनुसार, माँ संतोषी की आराधना विशेष रूप से शुक्रवार के दिन की जाती है। संतोषी माता व्रत कथा में यह वर्णित है कि कैसे रानी मालवा और अन्य भक्तों ने माँ की कृपा प्राप्त की। जब कोई व्यक्ति जीवन में अत्यधिक मानसिक अशांति, पारिवारिक कलह, धन का अभाव या शत्रु भय से घिरा होता है, तब माँ संतोषी की आरती और व्रत उसके जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन लाते हैं। यह आरती साधक के मन में संतोष का भाव जगाती है, जो कि सच्ची सुख-शांति की कुंजी है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- शुद्धता एवं स्नान: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नाननुरूप स्वच्छ वस्त्र धारण करें, विशेषकर शुक्रवार के दिन लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। वहां माता संतोषी की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- अखंड दीप प्रज्वलन: माता के समक्ष घी या तैल का दीपक जलाएं। साथ ही धूप और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
- नैवेद्य अर्पण: माता को गुड़ और चने का भोग अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा फल और जल का अर्पण करें।
- आरती के दौरान घंटी और शंखनाद अवश्य करें तथा पूरे परिवार के साथ श्रद्धापूर्वक आरती गाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
| सामग्री का नाम | महत्व एवं उपयोग |
|---|---|
| पूजा की थाली | चांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ थाली जिसमें सभी पूजन सामग्री सजी हो। |
| शुद्ध घी का दीपक | माता की आरती उतारने के लिए कपास की बत्ती और शुद्ध घी से युक्त दीपक। |
| कपूर | आरती के अंत में वातावरण को पवित्र करने और माता की आरती को पूर्ण करने हेतु। |
| घंटी एवं शंख | नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करने के लिए। |
| गुड़ और चना | माता संतोषी का मुख्य प्रसाद जो विशेष रूप से अर्पित किया जाता है। |
| कुमकुम और अक्षत | तिलक लगाने और पूजा की थाली को सजाने के लिए। |
राग, ताल एवं गायन समय
माँ संतोषी की आरती को पारंपरिक रूप से 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जाता है, जो मन को शांति और दिव्यता प्रदान करती हैं। इसे ताल कहरा या दादरा में गाया जा सकता है। आरती का सबसे उत्तम समय संध्याकाल (प्रदोष काल) का होता है, जब सूर्यास्त हो रहा हो। इसके अलावा शुक्रवार के दिन सुबह और शाम दोनों समय इस आरती का गान विशेष फलदायी माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से माँ संतोषी की आरती करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: मन में व्याप्त चिंता, तनाव और अशांति का नाश होता है तथा संतोष की प्राप्ति होती है।
- पारिवारिक सौहार्द: घर-परिवार में प्रेम, एकता और सुख-समृद्धि का वास होता है।
- दरिद्रता का नाश: आर्थिक संकट दूर होते हैं और आय के नए स्रोत खुलते हैं।
- नकारात्मकता का अंत: घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।