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श्री श्री राधा कृष्ण आरती
53 पाठ

श्री राधेश्याम जी की आरती - ॐ जय राधेश्याम देवा, स्वामी जय राधेश्याम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री राधेश्याम जी की आरती - ॐ जय राधेश्याम देवा, स्वामी जय राधेश्याम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में श्री राधा और कृष्ण की संयुक्त उपासना का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। जब हम परम ब्रह्म परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण उनकी आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी के साथ करते हैं, तो उसे 'राधेश्याम' का पावन रूप कहा जाता है। श्री राधेश्याम जी की आरती (ॐ जय राधेश्याम देवा, स्वामी जय राधेश्याम देवा) का गान करने मात्र से मनुष्य के जीवन के समस्त संताप दूर हो जाते हैं और हृदय में भक्ति रस की त्रिवेणी प्रवाहित होने लगती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत devotional guide में हम श्री राधेश्याम जी की आरती के संपूर्ण बोल, भावार्थ, पूजा विधि, और इसके अलौकिक आध्यात्मिक लाभों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय राधेश्याम देवा, स्वामी जय राधेश्याम देवा।
दीनन हितकारी, भक्तन सुखकारी, प्रतिपालक देवा॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

नीलांबर पीतांबर फहरे छवि भारी, स्वामी छवि भारी।
कोटी रूप धरि आए, लीला विस्तारि॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

वृंदावन के बासी, गोकुल के राजा, स्वामी गोकुल के राजा।
अघ बघा सुर मारे, राखे ब्रज साजा॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

राधा संग विराजे, छबि अति मनमानी, स्वामी छबि अति मनमानी।
मोर मुकुट सिर राजत, बंसी सुर तानी॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

गल वैजयंती माला, मुक्तामणि हारा, स्वामी मुक्तामणि हारा।
दर्श करत पावन भये, छूटे भव सारा॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

कंस अघासुर मारे, उद्धार्यो गजराजा, स्वामी उद्धार्यो गजराजा।
शरणागत प्रतिपालक, रखियो मेरी लाजा॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

जो जन आरती गावै, मनवांछित फल पावै, स्वामी मनवांछित फल पावै।
सुख संपत्ति घर आवै, दुःख सब मिट जावै॥ ॐ जय राधेश्याम देवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री राधेश्याम जी की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह जीव और ब्रह्म के मिलन और उनकी असीम कृपा का जीवंत दस्तावेज है। आइए इस पावन आरती के प्रत्येक चरण के भावार्थ को गहराई से समझें:

प्रथम चरण: 'ॐ जय राधेश्याम देवा...' इस पंक्ति में भक्त भगवान का जयकारा लगाते हुए उन्हें दीन-दुखियों का कल्याण करने वाला और भक्तों को परम सुख प्रदान करने वाला प्रतिपालक मानता है।

द्वितीय चरण: 'नीलांबर पीतांबर फहरे छवि भारी...' भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधा रानी के वस्त्रों और उनकी अलौकिक शोभा का वर्णन है। नीला और पीला वस्त्र धारी भगवान अपने भक्तों के कल्याण हेतु समय-समय पर अनेक लीलाएं करते हैं।

तृतीय चरण: 'वृंदावन के बासी, गोकुल के राजा...' भगवान श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और उनकी क्रीड़ा स्थली वृंदावन और गोकुल का स्मरण कराता है। उन्होंने ब्रजवासियों की रक्षा के लिए अनेक असुरों का संहार किया।

चतुर्थ चरण: 'राधा संग विराजे, छबि अति मनमानी...' यह इस आरती का सबसे केंद्रीय भाग है जहाँ राधा जी के साथ श्याम सुंदर विराजमान हैं। उनके सिर पर मोर मुकुट और अधरों पर बांसुरी की मधुर तान त्रैलोक्य को मोहने वाली है।

पंचम चरण: 'गल वैजयंती माला, मुक्तामणि हारा...' भगवान के श्रृंगार का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि इनके दर्शन मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्म के भव-बंधन कट जाते हैं और वह पवित्र हो जाता है।

षष्ठम चरण: 'कंस अघासुर मारे, उद्धार्यो गजराजा...' भगवान की महान शक्तियों और उनके उद्धारक स्वभाव को दर्शाता है। भक्त अपनी लाज बचाने और शरण में आने की गुहार लगाता है।

अंतिम चरण: 'जो जन आरती गावै, मनवांछित फल पावै...' इस आरती के फलश्रुति को बताता है कि जो भी श्रद्धा भाव से इस आरती का गान करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और सारे दुःख दूर हो जाते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन संस्कृति में 'राधा-कृष्ण' द्वैत नहीं अद्वैत हैं। शास्त्रों के अनुसार, राधा जी के बिना कृष्ण अधूरे हैं और कृष्ण के बिना राधा का कोई स्वरूप नहीं है। राधेश्याम नाम का उच्चारण ही महामंत्र के समान है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा-कृष्ण की उपासना को कलयुग में भवसागर से पार उतरने का सबसे सुगम मार्ग बताया गया है।

जब संध्या काल में या प्रातः काल में श्री राधेश्याम जी की आरती की जाती है, तो वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार होता है। आरती की अग्नि और घंटी-शंख की ध्वनि से आसपास की नकारात्मक शक्तियां और मानसिक विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह आरती साधक को अहंकार से मुक्ति दिलाकर समर्पण भाव सिखाती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

भगवान श्री राधेश्याम की आरती विधि-विधान से करने पर ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है:

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
  2. श्री राधा-कृष्ण की मूर्ति या चित्र को चौकी पर स्थापित करें और उन्हें पीले वस्त्र, पुष्प अर्पित करें।
  3. धूप, दीप, गंध, अक्षत और नैवेद्य (मक्खन-मिश्री या फल) का भोग लगाएं।
  4. आरती की थाली में घी का दीपक जलाएं और उसमें कपूर भी प्रज्वलित कर सकते हैं।
  5. आरती गाते समय पूरी श्रद्धा और तल्लीनता के साथ थाली को घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) कम से कम सात बार घुमाएं।
  6. आरती के अंत में शंखनाद और घंटी बजाएं, फिर अपने हाथों को दीपक की लौ के ऊपर से फेरकर अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

श्री राधेश्याम जी की आरती को सुचारू रूप से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:

  • पीतल या चांदी की साफ आरती की थाल
  • शुद्ध घी का दीपक (मिट्टी का दीया या धातु का दीपक)
  • कपूर और कपूरदानी
  • धूपबत्ती या अगरबत्ती
  • पुष्प (विशेषकर पीले गेंदे के फूल या तुलसी दल)
  • रोली, चंदन और अक्षत (चावल)
  • नैवेद्य हेतु मक्खन, मिश्री या मौसमी फल
  • घंटी और शंख (आरती के समय ध्वनि उत्पन्न करने के लिए)

राग, ताल एवं गायन समय

श्री राधेश्याम जी की आरती को गाने के लिए राग कल्याण या राग यमन का प्रयोग करना अत्यंत आनंददायक और मन को शांति देने वाला माना जाता है। इसे কাহারवा ताल (8 बीट) या तीन ताल में मधुर स्वर में गाया जा सकता है।

गायन समय: इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल मंगला आरती के समय (सुबह 5 बजे से 7 बजे के बीच) और संध्या काल में गोधूलि बेला (शाम 6 बजे से 8 बजे के बीच) का होता है। संध्या आरती करने से पूरे दिन की थकान और तनाव दूर हो जाते हैं।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री राधेश्याम जी की आरती करने के अनगिनत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ हैं:

  • मानसिक शांति: आरती के समय की गूंज और संगीत मन के विकारों और अवसाद को दूर करता है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में राधा-कृष्ण की कृपा से प्रेम, सद्भाव और समृद्धि बनी रहती है।
  • भक्ति भाव में वृद्धि: हृदय में भगवान के प्रति अनन्य प्रेम (प्रेम लक्षणा भक्ति) जाग्रत होती है।
  • पापों का नाश: सच्चे मन से गाई गई आरती पूर्वजन्म के संचित कर्मों और पापों का शमन करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

१. श्री राधेश्याम जी की आरती - ॐ जय राधेश्याम देवा, स्वामी जय राधेश्याम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री राधा कृष्ण के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री राधा कृष्ण जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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