॥ श्री राधा कृष्ण जी की आरती - आरती युगल किशोर की कीजै, मनवांछित फल पावे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन सनातन संस्कृति और भक्ति मार्ग में श्री राधा-कृष्ण का युगल रूप प्रेम, समर्पण और परमानंद की पराकाष्ठा है। भगवान श्री कृष्ण और उनकी ह्लादिनी शक्ति स्वरूपा श्री राधा रानी की आराधना करने मात्र से मनुष्य के जीवन के समस्त ताप और कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। 'आरती युगल किशोर की कीजै, मनवांछित फल पावे' - यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह जीव और ब्रह्म के मिलन, अनन्य भक्ति और ब्रज रस का साक्षात अनुभव कराने वाली दिव्य कुंजी है। जब भक्त पूरी श्रद्धा के साथ इस आरती का गान करता है, तो त्रिभुवन के स्वामी और महारानी राधिका प्रसन्न होकर उसके जीवन को सुख, शांति और अष्टसिद्धियों से भर देते हैं। भक्तलोक.इन (Bhaktilok.in) के इस पावन अंक में हम श्री राधा कृष्ण जी की इस महाआरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि, आवश्यक सामग्री तथा इसके अलौकिक फलों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
आरती युगल किशोर की कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै।
गौर श्याम मुख आयत नैनी, हरि की प्यारे सुंदर बैनी॥
आरती युगल किशोर की कीजै...॥
कंचन थार कपूर की बत्ती, हरि आए निर्मल भई छत्ती।
श्रीचन्द गावत कीरति गाथा, बरसत कृपा अपार सदाथा॥
आरती युगल किशोर की कीजै...॥
फूलन की सेज फूलन की माला, रथन चढ़ि आए नंदगोला।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, नैनन बीच मदन छवि सुंदर॥
आरती युगल किशोर की कीजै...॥
बिनय करें संत और जन सारे, दर्शन पावत तरे किनारे।
जुगल चरण मति सदा हमारी, कृपा करहु हे गिरधारी॥
आरती युगल किशोर की कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री राधा-कृष्ण की यह आरती अत्यंत गुणकारी और भावपूर्ण है। इसके प्रत्येक शब्द में ब्रज रस और अगाध भक्ति का सागर छिपा हुआ है:
आरती युगल किशोर की कीजै, तन मन धन न्योछावर कीजै: भक्त भगवान से कहता है कि हे साधक! तू श्री राधा और कृष्ण (युगल किशोर) की इस पावन आरती को संपन्न कर और इस दौरान अपने तन, मन और संपूर्ण धन को उनके चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित (न्योछावर) कर दे। जब तक अहंकार का त्याग नहीं होता, सच्ची भक्ति का उदय नहीं हो सकता।
गौर श्याम मुख आयत नैनी, हरि की प्यारे सुंदर बैनी: इस पंक्ति में युगल स्वरूप के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन है। श्री राधा रानी का वर्ण गौर (स्वर्ण के समान चमकीला) है और श्री कृष्ण का वर्ण नीलवर्ण श्याम है। दोनों के सुंदर मुख और बड़े-बड़े (आयत) नेत्र अत्यंत मनमोहक हैं। भगवान श्री कृष्ण के सुंदर बाल (बैनी/केश) और उनकी अलौकिक शोभा भक्त के मन को मोह लेती है।
कंचन थार कपूर की बत्ती, हरि आए निर्मल भई छत्ती: आरती की थाली स्वर्ण (कंचन) की है और उसमें कपूर की पावन ज्योति जल रही है। जैसे ही भगवान की आरती उतारी जाती है, भक्तों के हृदय के भीतर के सारे कलुष, विकार और पाप नष्ट हो जाते हैं और अंतःकरण पूरी तरह निर्मल व पवित्र हो जाता है।
श्रीचन्द गावत कीरति गाथा, बरसत कृपा अपार सदाथा: संत श्रीचंद जी महाराज इस युगल सरकार की कीर्ति और यश का गान करते हैं। इनके दरबार से भक्तों पर कृपा की वर्षा सदा निरंतर और अपार रूप से होती रहती है, जिसका कोई अंत नहीं है।
फूलन की सेज फूलन की माला, रथन चढ़ि आए नंदगोला: भगवान श्री कृष्ण (नंदलाल/नंदगोला) फूलों की सुंदर सेज और मालाओं से सुसज्जित होकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए पधारे हैं। उनके रूप की महिमा अपरंपार है।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, नैनन बीच मदन छवि सुंदर: श्री कृष्ण के मस्तक पर मोर का मुकुट सुशोभित है, कानों में मकर (मछली) के आकार के कुंडल झिलमिला रहे हैं, और उनके नेत्रों में कामदेव को भी लज्जित करने वाली ऐसी सुंदर छटा है जिसे देखकर कोई भी सुधि-बुध खो बैठे।
बिनय करें संत और जन सारे, दर्शन पावत तरे किनारे: सभी संत-महात्मा और सामान्य जन युगल चरणों में यही विनय करते हैं कि आपके दर्शन मात्र से भवसागर के अटके हुए किनारे मिल जाते हैं और जीवन नैया तर जाती है।
जुगल चरण मति सदा हमारी, कृपा करहु हे गिरधारी: हे गोवर्धन धारी (गिरधारी)! हमारी बुद्धि हमेशा आपके इन पावन युगल चरणों में ही लगी रहे, विषयों में न भटके। हम पर ऐसी अकृपामय कृपा बनाए रखिए।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में युगल उपासना का विशेष स्थान है। केवल श्री कृष्ण या केवल श्री राधा की पूजा से अधिक फलदायी श्री राधा-कृष्ण युगल सरकार की उपासना मानी जाती है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि श्री राधा कृष्ण एक ही प्राण के दो शरीर हैं। ह्लादिनी शक्ति श्री राधा के बिना श्री कृष्ण अधूरे हैं और श्री कृष्ण के बिना राधा जी का अस्तित्व इस लोक में प्रकट नहीं होता।
जब संध्या काल में भक्त 'आरती युगल किशोर की' का गान करते हैं, तो ब्रह्मांड की समस्त सकारात्मक ऊर्जा उस स्थान पर केंद्रित हो जाती है। यह आरती केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह आत्मा का परमात्मा से मिलन कराने का सहज मार्ग है। ब्रजमंडल में आज भी इस आरती का विशेष महत्व है। बांके बिहारी मंदिर, इस्कॉन मंदिरों और घर-घर में इस आरती के गान से वातावरण सुगंधित और भक्तिमय हो जाता है। पुराणों के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन नियमपूर्वक युगल आरती गाता है, उसके जन्म-जन्म के पाप कट जाते हैं और अंत समय में उसे गोलोक धाम की प्राप्ति होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे शास्त्रीय नियमों और पूरी पवित्रता के साथ संपन्न किया जाए। श्री राधा-कृष्ण की आरती के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- समय: आरती का उत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के पश्चात) और प्रदोष काल (संध्या के समय) माना जाता है। संध्या आरती का विशेष महात्म्य है।
- शुचिता: स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें। माथे पर चंदन या गोमती चक्र का तिलक लगाएं।
- स्थान: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। श्री राधा-कृष्ण की प्रतिमा या चित्र को पुष्पों से सजाएं।
- प्रक्रिया: सर्वप्रथम गणेश जी और अपने गुरु का स्मरण करें। इसके बाद धूप, दीप, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें। तत्पश्चात कपूर जलाकर दोनों हाथों से थाल को संभालते हुए लयबद्ध तरीके से आरती गाएं।
- आरती की दिशा: आरती की थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए। भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार और मुख मंडल की ओर 7 बार (कुल 14 बार या पूर्ण चक्र) थाल घुमाने का विधान है।
- आचमन और पुष्पानंजलि: आरती संपन्न होने के बाद शंखनाद करें, घंटी बजाएं और अंत में आचमन कर अपने हाथों को आंखों से लगाएं। उपस्थित भक्तों में आरती का प्रसार करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
श्री राधा-कृष्ण की आरती को भव्य और दिव्य बनाने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का थाल में होना अनिवार्य है:
| सामग्री का नाम | विशेषता एवं उपयोग |
|---|---|
| कपूर (Camphor) | कपूर की शुद्ध ज्योति भगवान के समक्ष जलाई जाती है, जो बिना धुएं के जलकर परमात्मा में आत्मा के विलीन होने का प्रतीक है। |
| पंचमुखी दीपक | मिट्टी या पीतल का दीपक जिसमें घी और रुकी बत्ती जलाई जाती है। |
| कंचन या पीतल का थाल | आरती सजाने के लिए स्वच्छ धातु का थाल। |
| घंटी और शंख | नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक स्पंदन उत्पन्न करने के लिए। |
| पुष्प और माला | ताजे सुगंधित पुष्प (विशेषकर गेंदा, गुलाब या तुलसी दल सहित पुष्प)। |
| रोटी या मिश्री-माखन भोग | श्री कृष्ण को प्रिय माखन-मिश्री या तुलसी युक्त भोग सामग्री। |
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से 'आरती युगल किशोर की' अत्यंत मधुर और गेय रचना है। इसे शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण, राग यमन या राग भैरवी की धुनों में बहुत ही सुंदर ढंग से गाया जा सकता है। इसकी ताल दादरा (6 मात्रा) या कहहरवा (8 मात्रा) के साथ बैठती है। संध्या के समय इस आरती को मृदंग, मंजीरा, हारमोनियम और ढोलक की थाप के साथ गाने से ब्रज जैसी आनंदित अनुभूति होती है। गायन का सही समय संध्याकाल (शाम 6 बजे से 8 बजे के मध्य) का होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री राधा-कृष्ण की आरती करने वाले साधक के जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक परिवर्तन और आध्यात्मिक लाभ देखने को मिलते हैं:
- मानसिक शांति: सांसारिक भागदौड़, तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है और मन में अगाध शांति का संचार होता है।
- पारिवारिक सौहार्द: घर में प्रेम, सद्भाव और आपसी तालमेल बढ़ता है। पति-पत्नी के संबंध मधुर होते हैं।
- भक्ति भाव की प्राप्ति: विषयों से मन हटकर भगवान के चरणों में अनन्य अनुराग उत्पन्न होता है।
- अकाल मृत्यु व भय का नाश: भगवान युगल किशोर अपने भक्तों के योगक्षेम का भार स्वयं उठाते हैं और हर संकट से रक्षा करते हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति: जीवन के अंतिम समय में भगवान के चरणों में स्थान यानी गोलोक धाम की प्राप्ति होती है।
- आर्थिक संपन्नता: माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के स्वरूप श्री कृष्ण की कृपा से घर में अन्न-धन के भंडार सदैव भरे रहते हैं।