॥ श्री महालक्ष्मी माता की पावन आरती - जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★हिन्दू सनातन धर्म में धन, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य और आध्यात्मिक समृद्धि की अधिष्ठाता देवी जगतजननी माँ महालक्ष्मी हैं। भगवान विष्णु की अर्द्धांगिनी और क्षीरसागर से प्रादुर्भूत होने वाली माँ महालक्ष्मी चराचर जगत का पालन-पोषण करती हैं। जिस घर में माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है, वहाँ दरिद्रता, क्लेश और अभाव का सर्वनाश हो जाता है तथा सुख-शांति का स्थायी वास होता है। माँ महालक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए संध्याकाल में श्रद्धा और भक्ति भाव से 'जय महालक्ष्मी माता' की आरती गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम आपके लिए महालक्ष्मी माता की आरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और जीवन पर पड़ने वाले इसके सकारात्मक प्रभावों का विस्तृत विवरण लेकर आए हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन ध्यावत, हरि विष्णु विधाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य चन्दमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
दुर्गा रूप निरंजन, सुख संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भव निधि की त्राता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जावे॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माता महालक्ष्मी की यह आरती अत्यंत महिमामयी और भावपूर्ण है। इसके प्रत्येक शब्द में ब्रह्मांड की ऊर्जा और देवी की महिमा का गुणगान किया गया है। आइए इस आरती के गूढ़ भावार्थ को विस्तार से समझें:
आरती के आरंभिक चरणों में भक्तगण माता को नमन करते हुए कहते हैं - हे मैया महालक्ष्मी! तुम्हारी जय हो, तुम्हारी जय हो। त्रिभुवन के पालनहार भगवान विष्णु, जगत के रचयिता ब्रह्मा जी और संहारकर्ता शिवजी सहित समस्त देवी-देवता प्रतिदिन तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ही इस समस्त चराचर जगत की मूल जननी हो। सनातन धर्म की तीनों प्रमुख देवियाँ - महाकाली (उमा), महालक्ष्मी (रमा) और महासरस्वती (ब्रह्माणी) का मूल स्वरूप तुम ही हो।
आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्रमा तुम्हारा ही स्मरण करते हैं तथा देवर्षि नारद वीणा बजाकर तुम्हारे यश का गान करते हैं। तुम ही आदिशक्ति दुर्गा का पावन और विमल (निरंजन) रूप हो, जो साधकों को भौतिक सुख और अपार संपत्ति प्रदान करती हो। जो भी मनुष्य सच्चे मन से तुम्हारा ध्यान करता है, उसे जीवन में अष्ट-सिद्धियाँ, नवनिधियाँ और अकूत धन-धान्य की प्राप्ति होती है.
तुम पाताल लोक से लेकर स्वर्ग लोक तक सर्वव्यापिनी हो और भक्तों को शुभ फल प्रदान करने वाली हो। कर्मों के प्रभाव को प्रकाशित करने वाली और इस भवसागर (संसार रूपी सागर) से जीवों को पार लगाने वाली तारणहार तुम्हीं हो। जिस घर में माता लक्ष्मी का वास होता है, वहाँ स्वतः ही सदाचार, परोपकार, सत्य, करुणा और सभी सद्गुणों का आगमन हो जाता है। उस घर के भक्तों के सभी कठिन कार्य सहज रूप से संभव हो जाते हैं और उनका मन कभी भी भयभीत या विचलित नहीं होता.
हे माता! इस संसार में तुम्हारे आशीर्वाद के बिना कोई भी यज्ञ, अनुष्ठान या हवन संपन्न नहीं हो सकता। तुम्हारे बिना मनुष्य को तन ढकने के लिए वस्त्र और जीवन जीने के लिए अन्न-जल प्राप्त नहीं हो सकता। इस सृष्टि में खान-पान, वैभव, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं का जितना भी विस्तार है, वह सब तुम्हारी ही कृपा का परिणाम है.
तुम सभी शुभ गुणों और सुंदरताओं का पावन मंदिर हो। क्षीरसागर (दूध के समुद्र) से प्रकट होने के कारण तुम्हें 'क्षीरोदधि-जाता' कहा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त होने वाले चौदह रत्न और उनमें निहित समस्त संपदा तुम्हारी ही अनुकंपा से ब्रह्मांड को प्राप्त हुई है। अंत में आरती का गान करते हुए भक्त कहते हैं कि जो भी मनुष्य इस महालक्ष्मी माता की आरती का नियमपूर्वक गान करता है, उसके हृदय में असीम आनंद समा जाता है और उसके जन्म-जन्मरांतरे के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं.
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, माता महालक्ष्मी धन की देवी ही नहीं, अपितु मोक्ष और जीव के आध्यात्मिक उत्थान की भी प्रदात्री हैं। समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में से देवी लक्ष्मी का प्राकट्य कार्तिक मास की अमावस्या (दीपावली) के दिन हुआ था। इसलिए दीपावली और प्रत्येक शुक्रवार को माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष विधान है।
धार्मिक दृष्टि से नियमित रूप से महालक्ष्मी आरती का गायन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जहाँ लक्ष्मी की आरती होती है, वहाँ दरिद्रता, आलस्य, कलह और अशांति का वास नहीं हो सकता। यह आरती व्यक्ति के भौतिक दुखों को दूर करने के साथ-साथ उसे आंतरिक संतोष और आत्मिक शांति प्रदान करती है। पुराणों में यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति संध्याकाल में स्नान करके पूर्ण विधि-विधान से महालक्ष्मी की आरती करता है, उसके पूर्वजों को भी मुक्ति मिलती है और उसकी सात पीढ़ियाँ धन-धान्य से परिपूर्ण रहती हैं.
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- शुद्धता एवं स्नान: संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ, चमकीले (लाल, गुलाबी या पीले रंग के) वस्त्र धारण करें।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता महालक्ष्मी और श्रीगणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजन: माता को रोली, अक्षत, लाल पुष्प, सिंदूर, कमलगट्टा, धूप, दीप और नैवेद्य (मखाने, खीर या मिठाई) अर्पित करें।
- श्रीसूक्त का पाठ: आरती से पूर्व 'श्रीसूक्त' या 'कनकधारा स्तोत्र' का पाठ करना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।
- आरती का प्रज्ज्वलन: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। कपूर भी जलाएं। घंटी और शंखनाद के साथ लयबद्ध तरीके से आरती गाएं।
- परिक्रमा एवं क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम तीन बार घुमाएं। अंत में सभी को आरती लें और भूलचूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माता महालक्ष्मी की आरती को पूर्ण फलदायी बनाने के लिए निम्नलिखित सामग्री का होना अनिवार्य है:
- पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- घी का दीपक: गाय के शुद्ध घी का मिट्टी या पीतल का दीपक (जिसमें रुई की बत्ती हो)।
- कपूर: आरती को अंतिम रूप से प्रज्वलित करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
- धूपबत्ती और अगरबत्ती: सुगंधित प्राकृतिक धूप।
- घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को भगाने और सकारात्मक स्पंदन के लिए पावन घंटी एवं दक्षिणावर्ती शंख।
- पुष्प और अक्षत: माता को अर्पित करने के लिए ताजे लाल गुलाब या कमल के फूल तथा साबुत अक्षत।
- भोग सामग्री: मखाने की खीर, बताशा, पान, सुपारी और सफेद या पीली मिठाई।
राग, ताल एवं गायन समय
माता महालक्ष्मी की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो मन को असीम शांति और भक्ति रस से सराबोर कर देता है। इसकी लय मध्य गति (मध्य लय) में होती है ताकि प्रत्येक शब्द स्पष्ट रूप से उच्चारित हो सके।
गाय का उपयुक्त समय: प्रदोष काल (संध्याकाल) या विशेष अवसरों जैसे शुक्रवार, दीपावली, शरद पूर्णिमा और धनतेरस के दिन माता की आरती का समय अत्यधिक शुभ माना जाता है। सुबह की पूजा के बाद भी इसे गाया जा सकता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
प्रतिदिन नियमपूर्वक श्री महालक्ष्मी माता की आरती करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- आर्थिक स्थिरता: घर में चल रहे कर्ज, तंगी और धन के अभाव से मुक्ति मिलती है।
- मानसिक शांति: तनाव, अवसाद और अनजाने भय से मुक्ति मिलती है और मन में संतोष की भावना जागृत होती है।
- पारिवारिक सौहार्द: पति-पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच प्रेम बढ़ता है तथा आपसी मनमुटाव समाप्त होते हैं।
- व्यापार में वृद्धि: नौकरी और व्यवसाय में उन्नति के मार्ग प्रश스트 होते हैं, ग्राहकों का आकर्षण बढ़ता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भौतिक सुखों के साथ-साथ परलोक और मोक्ष के द्वार भी खुलते हैं, जिससे अहंकार का नाश होता है।