पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माँ लक्ष्मी आरती
7 पाठ

श्री महालक्ष्मी माता की आरती - जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री महालक्ष्मी माता की आरती - जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन हिंदू धर्म में धन, वैभव, ऐश्वर्य, सौभाग्य और आध्यात्मिक समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी जगतजननी माँ महालक्ष्मी को माना गया है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली के पावन पर्व पर महालक्ष्मी की विशेष आराधना की जाती है, किंतु माता की कृपा प्राप्त करने के लिए दैनिक जीवन में और विशेषकर शुक्रवार के दिन श्री महालक्ष्मी माता की आरती गाना सर्वोच्च फलदायी माना गया है। 'जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता' यह आरती माँ लक्ष्मी के चरणों में समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण और सिद्ध स्तुति है। इस विस्तृत आरती गाइड में हम महालक्ष्मी आरती के मूल बोल, गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अनंत आध्यात्मिक व भौतिक लाभों की चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन ध्यावत, हरि विष्णु विधाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।<>सूर्य चन्दमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

दुर्ग रूप निरंजन, सुख संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, रिद्धि-सिद्धि धन पाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

तुम बिन यज्ञ न होवे, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरनिधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गावे।
उर आनंद समाता, पाप उतर जावे॥
(ॐ जय महालक्ष्मी माता...)

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री महालक्ष्मी माता की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की उस आदिशक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है जो संपूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण करती हैं। आइए इस दिव्य आरती के एक-एक पद के भावार्थ को विस्तार से समझें:

आरती के आरंभिक चरणों में भक्त कहते हैं - हे मैया महालक्ष्मी! आपकी जय हो, बार-बार जय हो। ब्रह्मांड के तीनों प्रमुख देवता - सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी, पालनकर्ता विष्णु जी और संहारक शिव जी (हरि) भी निरंतर आपका ध्यान करते हैं। इसका अर्थ यह है कि साक्षात परमेश्वर भी अपनी शक्ति के रूप में माँ लक्ष्मी का स्मरण करते हैं.

आगे की पंक्तियों में माता की तुलना अन्य सर्वोच्च देवियों से करते हुए कहा गया है कि हे माता! आप ही पार्वती (उमा), आप ही लक्ष्मी (रमा) और आप ही सरस्वती (ब्रह्माणी) के रूप में संपूर्ण जगत की माता हैं। आकाश में चमकने वाले सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं तथा देवर्षि नारद वीणा बजाकर आपकी कीर्ति का गान करते हैं.

माता का स्वरूप संकटों का नाश करने वाला और दुखों को हरने वाला है। आप माँ दुर्गा के समान अजेय और निरंजन (माया से परे) हैं। आप ही भक्तों को समस्त सुख और संपत्ति प्रदान करती हैं। जो भी सच्चा भक्त आपका ध्यान करता है, उसे रिद्धि, सिद्धि और अपार धन-वैभव की प्राप्ति होती है।

भक्त आगे कहते हैं कि हे माता! आप समस्त लोकों में निवास करती हैं। पाताल लोक से लेकर वैकुंठ तक आपकी ही सत्ता है। आप कर्मों के प्रभाव को प्रकाशित करने वाली और इस भवसागर (संसार सागर) से अपने भक्तों की रक्षा करने वाली त्राता हैं। जिस घर में आपका वास होता है, वहाँ स्वतः ही सारे सद्गुण, नैतिकता और आचरण आ जाते हैं। उस घर का प्रत्येक कार्य सुगम हो जाता है और मनुष्य का मन कभी भयभीत या निराश नहीं होता।

आरती के अंत में माता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि आपके बिना संसार में कोई भी यज्ञ-अनुष्ठान पूर्ण नहीं हो सकता और न ही मनुष्य को तन ढंकने के लिए वस्त्र मिल सकते हैं। अन्न और धन का समस्त वैभव आप ही की कृपा से संभव है। क्षीरसागर (क्षीरनिधि) से उत्पन्न होने वाली हे महालक्ष्मी! समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्न और उनका सुख आपके आशीर्वाद के बिना किसी को प्राप्त नहीं हो सकता। जो भी मनुष्य श्रद्धा पूर्वक महालक्ष्मी जी की इस आरती का गान करता है, उसके हृदय में असीम आनंद समा जाता है और उसके जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं.

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में महालक्ष्मी जी की आरती का अनन्य धार्मिक महत्व है। पुराणों के अनुसार, माँ लक्ष्मी चंचला मानी जाती हैं यानी वह एक स्थान पर स्थिर नहीं रहतीं। किंतु जहाँ सच्ची भक्ति, सात्विकता, पवित्रता और महालक्ष्मी की आरती का नियमित गान होता है, वहाँ माता स्थायी रूप सेि निवास करती हैं। समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक अमावस्या के दिन माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसलिए दीपावली और हर शुक्रवार को इस आरती का गायन करने से घर की दरिद्रता, क्लेश और आर्थिक संकट दूर होते हैं। यह आरती साधक को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक शांति और संतोष भी प्रदान करती है.

आरती करने की सही विधि एवं नियम

महासूक्ष्म ऊर्जा और धन की देवी लक्ष्मी की आरती करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:

  • स्नान एवं शुद्धि: आरती से पूर्व प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ, विशेषकर लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
  • स्थान की पवित्रता: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। लकड़ी के पाटे पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो तो अखंड ज्योति जलाएं या कम से कम पाँच बत्तियों वाला दीपक आरती के लिए रखें।
  • आरती का क्रम: सबसे पहले भगवान गणेश को धूप-दीप दिखाएं, फिर विष्णु जी और अंत में माँ महालक्ष्मी की आरती भावपूर्ण ढंग से घंटी बजाते हुए करें।
  • प्रदक्षिणा: आरती की थाल को क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) कम से कम तीन बार घुमाएं। आरती के पश्चात दोनों हाथों को दीपक की लौ के ऊपर से फेरकर आँखों और मस्तक पर लगाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

माँ महालक्ष्मी की आरती को पूर्ण विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:

  • शुद्ध गाय का घी और पीतल या मिट्टी का दीपक
  • कपूर और कपूरदानी
  • रोली, अक्षत (अखंड चावल), कुमकुम और चंदन
  • लाल रंग के ताजे फूल या कमल का पुष्प (यदि उपलब्ध हो)
  • धूपबत्ती और अगरबत्ती
  • नैवेद्य के रूप में खीर, मखाने, बताशा या स्वेतान्न् (सफेद मिठाई)
  • आरती उतारने के लिए पीतल या तांबे की थाली
  • पीतल की घंटी और शंख

राग, ताल एवं गायन समय

श्री महालक्ष्मी माता की आरती को संगीत शास्त्र के अनुसार **राग कल्याण** या **राग यमन** में गाना अत्यंत मधुर और प्रभावी माना जाता है। इसकी ताल त्रिताल (16 मात्रा) या কাহারवा (8 मात्रा) में आसानी से गाई जा सकती है। इस आरती का सर्वोत्तम गायन समय **संध्याकाल (प्रदोष काल)** या **प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त** में है। विशेषकर शुक्रवार की संध्या को सूर्यास्त के पश्चात इस आरती का सस्वर गान महालक्ष्मी की कृपा को तुरंत आकर्षित करता है.

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री महालक्ष्मी माता की आरती करने से जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. आर्थिक स्थिरता: कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलती है और आय के नए स्रोत खुलते हैं।
  2. नकारात्मकता का नाश: घर की नकारात्मक ऊर्जा, वास्तु दोष और दरिद्रता दूर होती है।
  3. पारिवारिक सुख-शांति: घर के सदस्यों के बीच प्रेम, सौहार्द और परस्पर सहयोग बढ़ता है।
  4. मानसिक शांति: अत्यधिक धन-लोभ या तनाव से मुक्ति मिलती है और मन में संतोष व दिव्यता का वास होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री महालक्ष्मी माता की आरती - जय महालक्ष्मी माता, मैया जय महालक्ष्मी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ लक्ष्मी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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