पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री कृष्ण आरती
9 पाठ

श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण की आराधना और उनकी पावन आरती का विशेष महत्व माना गया है। 'आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधारी की' यह दिव्य आरती भक्त और भगवान के बीच के अनन्य प्रेम, समर्पण और भक्ति का प्रतीक है। कुंज बिहारी यानी वृंदावन की कुंज-गलियों में राधारानी के साथ विहार करने वाले हमारे आराध्य श्री कृष्ण की यह आरती सुनने मात्र से ही मन को असीम शांति और अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। Bhaktilok.in के इस विशेष पावन गाइड में हम इस महाआरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, धार्मिक महत्व, और पूजन की संपूर्ण विधि का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं, जिससे साधক अपने आराध्य को आसानी से प्रसन्न कर सकें।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की।
वृषभानुसुता की प्रीति रंग, रंग मुरारि की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की॥

चमकत चनत बजत मुरली, नटवर नागर बांका छैला।
गले में बज्‍जयंती माला, बजावै मुरली मधुर भाला॥
श्रवण कुण्डल झलक रहे, नन्द के नन्दन आनंद दायक॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की॥

गगन सम अंग रंग कान्ति, उज्ज्वल यमुना तट विहारि।
भक्तन के हितकारी, कृपासिंधु मदन मुरारि॥
दीनन के प्रतिपालक, गोवर्धन धरन सुखकारी॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की॥

कनकमय मोर मुकुट सिर राजै, माल बिराजै उर बैजन्ती।
साँवरो रूप मनोहर सुंदर, चित्त चुरावै राधिका मयंती॥
चरणों में नूपुर बाजै, रास रचे ब्रज में रसकंता॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की॥

जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलकल करती बहती धारा।
चरणारविन्द धोवत पग, पावन करत सकल संसारा॥
ऐसे श्री कृष्ण कन्हैया की, बलि-बलि जाऊँ मैं बारम्बाराम॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान श्री कृष्ण की इस अलौकिक आरती की हर एक पंक्ति में ब्रज की संस्कृति, श्री कृष्ण के सौंदर्य और भक्तों की करबद्ध भावना का अनूठा संगम देखने को मिलता है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझते हैं:

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की। वृषभानुसुता की प्रीति रंग, रंग मुरारि की॥
इस प्रारंभिक पंक्ति का अर्थ है कि हम कुंज-वनों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाने वाले (गिरिधारी) और वृषभानु की लाड़ली पुत्री (राधारानी) के प्रेम के रंगों में रंगे हुए भगवान मुरारी की आरती उतार रहे हैं। यहाँ राधारानी और श्री कृष्ण का प्रेम समरसता का प्रतीक है।

चमकत चनत बजत मुरली... गले में बज्‍जयंती माला...
भगवान के श्रृंगार का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि नटवर नागर श्री कृष्ण के रूप में अद्भुत चमक है, उनके हाथों में मुरली बज रही है, उनके गले में बैजयंती माला सुशोभित है और उनके कानों में कुण्डल झिलमिला रहे हैं। वे नन्द बाबा के आनंद को बढ़ाने वाले और समस्त संसार को सुख देने वाले हैं।

गगन सम अंग रंग कान्ति... भक्तन के हितकारी...
आकाश के समान विशाल और गंभीर उनके शरीर की कांति है। वे यमुना के तटों पर विहार करने वाले, अपने भक्तों का हमेशा हित चाहने वाले, कृपा के सागर और कामदेव को भी अपने सौंदर्य से लज्जित करने वाले मुरारि हैं। वे दीन-दुखियों के पालनहार और गोवर्धन को धारण करने वाले परम सुखकारी देवता हैं।

कनकमय मोर मुकुट सिर राजै...
उनके मस्तक पर सोने (कनक) और रत्नों से जड़ा हुआ मोर मुकुट सुशोभित है, हृदय पर बैजयंती माला लटक रही है। उनका यह साँवला और मनमोहक रूप देखने वालों के चित्त को चुरा लेता है, विशेषकर राधारानी के मन को। उनके चरणों में बजने वाले नूपुरों की छन-छन ध्वनि के साथ वे ब्रज में रास रचाते हैं।

जहाँ ते प्रकट भई गंगा... चरणारविन्द धोवत पग...
जिस प्रकार भगवान के चरण कमलों से पावन गंगा की धारा प्रकट हुई है और उनके चरण धोकर संपूर्ण संसार को पवित्र करती है, ऐसे सर्वशक्तिमान श्री कृष्ण कन्हैया पर मैं बार-बार अपने प्राण न्यौछावर करता हूँ (बलि-बलि जाता हूँ)।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, श्री कुंज बिहारी जी की आरती का पाठ करने मात्र से व्यक्ति के जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति गाढ़ प्रेम प्रकट करने का माध्यम है।

  • राधा-कृष्ण की संयुक्त कृपा: चूँकि इस आरती में 'वृषभानुसुता' (राधा जी) और 'गिरिधारी' (कृष्ण जी) दोनों का स्मरण होता है, इसलिए इसका पाठ करने से युगल जोड़ी की असीम कृपा प्राप्त होती है।
  • मानसिक शांति और सकारात्मकता: संध्या के समय इस आरती का गान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।
  • भक्ति भाव की वृद्धि: यह आरती साधक के हृदय में भक्ति, प्रेम, करुणा और सेवा भाव को जागृत करती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

किसी भी देवी-देवता की आरती विधि-विधान से करने पर उसका फल कई गुना बढ़ जाता है। श्री कृष्ण आरती के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करें:

  1. सबसे पहले प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें या संध्या वंदना के समय पुनः शुद्ध हो जाएं।
  2. मंदिर के सिंहासन या चौकी पर श्री कृष्ण और राधारानी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  3. भगवान को गंगाजल से स्नान कराएं, सुंदर वस्त्र, चंदन, और पुष्प माला अर्पित करें।
  4. धूप, दीप प्रज्वलित करें और नैवेद्य (माखन-मिश्री, फल या मिठाई) का भोग लगाएं।
  5. आरती की थाली को हाथ में लेकर दाहिने हाथ से क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) कम से कम चार बार ऊपर-नीचे घुमाते हुए श्रद्धापूर्वक गाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:

सामग्री का नाम धार्मिक एवं व्यावहारिक महत्व
आरती की थाल चांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ थाली जिसमें सभी पूजन सामग्रियां रखी जाती हैं।
दीपक (घी का) शुद्ध गाय के घी का दीपक, जो अंधकार और अज्ञानता को दूर करता है।
कपूर आरती के अंत में प्रज्वलित किया जाने वाला कपूर, जो आत्मा के परमात्मा में विलीन होने का प्रतीक है।
घंटी और शंख नकारात्मक ऊर्जा भगाने और देवताओं का आह्वान करने के लिए ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
पुष्प और अक्षत आरती के उपरांत भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिए।

राग, ताल एवं गायन समय

यह आरती संगीत की दृष्टि से भी बहुत समृद्ध है। इसे आमतौर पर राग कल्याण या राग यमन में गाया जाता है, जो संध्या कालीन बेला के लिए अत्यंत उपयुक्त राग है। इसके गायन की ताल कहरवा या दादरा होती है, जो इसे लयबद्ध और आनंददायक बनाती है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय संध्या काल (संध्या वंदना के समय, लगभग 6 से 7 बजे) या जन्माष्टमी जैसे विशेष उत्सवों पर होता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

जो भक्त नियमित रूप से नियमपूर्वक श्री कुंज बिहारी जी की आरती गाते और सुनते हैं, उनके जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक परिवर्तन आते हैं:

  • पारिवारिक कलह और मानसिक संताप दूर होते हैं।
  • घर में सुख, शांति, समृद्धि और लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
  • भक्त को मृत्यु के पश्चात भगवान के धाम (गोलोक) में स्थान प्राप्त होता है।
  • शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

संबंधित पावन आरतियाँ

समस्त आरतियाँ देखें →

भक्त विचार एवं टिप्पणियां (0)

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सर्वप्रथम अपने भक्ति विचार साझा करें!

भगवान श्री श्री कृष्ण जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

श्री श्री कृष्ण की समस्त आरतियाँ
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!