॥ श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती, जिसे 'आरती कुंज बिहारी की' के नाम से जाना जाता है, सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति का सबसे मधुर माध्यम है। यह आरती न केवल प्रभु के सौंदर्य का वर्णन करती है, बल्कि भक्त के अंतर्मन को दिव्य शांति और आनंद से भर देती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला, श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नन्दलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली, लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक ललित छवि श्यामा प्यारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं, गगन सों सुमन रासि बरसैं, बजे मुरचंग मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग अतुल रति गोप कुमारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा, स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस जटा के बीच, हरै अघ कीच चरन छवि बनवारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू, चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद चांदनी चंद, कटत भव फंद टेर सुन दीन भिखारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
इस आरती में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के उस रूप का ध्यान करता है जो कुंजों में विहार करते हैं। 'कुंज बिहारी' का अर्थ है वह जो लताओं के कुंजों में विचरण करते हैं। प्रथम पंक्ति में भक्त प्रभु को गिरिधर (गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले) और कृष्ण मुरारी कहकर संबोधित करता है। आरती की प्रत्येक पंक्ति प्रभु के श्रृंगार, उनके आभूषणों और उनकी लीलाओं का वर्णन करती है। 'गले में बैजंती माला' प्रभु के वनवासी स्वरूप को दर्शाती है, जबकि 'नंद के आनंद नन्दलाला' उनके वात्सल्य भाव को उजागर करता है। भावार्थ यह है कि प्रभु का सौंदर्य इतना दिव्य है कि देवता भी उनके दर्शन के लिए लालायित रहते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
कुंज बिहारी आरती का महत्व ब्रज भूमि से जुड़ा है। यह आरती भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के युगल स्वरूप की स्तुति है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक इस आरती का गायन करता है, उसके जीवन से अज्ञानता का अंधकार दूर होता है। यह आरती मन को एकाग्र करने और भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने में सहायक है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध होकर आसन पर बैठें। भगवान के विग्रह या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं। आरती करते समय घंटी और शंख का नाद करें। आरती को प्रभु के चरणों से शुरू करके मुखमंडल तक घुमाएं। आरती के बाद जल का आचमन करें और स्वयं प्रसाद ग्रहण करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
आरती के लिए एक पीतल या चांदी की थाली, शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूपबत्ती, ताजे पुष्प, चंदन, अक्षत (चावल), और घंटी-शंख अनिवार्य हैं।
राग, ताल एवं गायन समय
यह आरती मुख्य रूप से राग कल्याण या यमन में गाई जाती है, जो मन को शांति प्रदान करती है। इसे संध्या काल में सूर्यास्त के पश्चात करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित आरती करने से मानसिक तनाव कम होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और भक्त को प्रभु की कृपा का अनुभव होता है। यह आरती मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग है।