पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री कृष्ण आरती
8 पाठ

श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती, जिसे 'आरती कुंज बिहारी की' के नाम से जाना जाता है, सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति का सबसे मधुर माध्यम है। यह आरती न केवल प्रभु के सौंदर्य का वर्णन करती है, बल्कि भक्त के अंतर्मन को दिव्य शांति और आनंद से भर देती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला, श्रवण में कुंडल झलकाला, नंद के आनंद नन्दलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली, लतन में ठाढ़े बनमाली, भ्रमर सी अलक कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक ललित छवि श्यामा प्यारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं, गगन सों सुमन रासि बरसैं, बजे मुरचंग मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग अतुल रति गोप कुमारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
जहाँ ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा, स्मरन ते होत मोह भंगा, बसी शिव सीस जटा के बीच, हरै अघ कीच चरन छवि बनवारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू, चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू, हंसत मृदु मंद चांदनी चंद, कटत भव फंद टेर सुन दीन भिखारी की।
आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

इस आरती में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के उस रूप का ध्यान करता है जो कुंजों में विहार करते हैं। 'कुंज बिहारी' का अर्थ है वह जो लताओं के कुंजों में विचरण करते हैं। प्रथम पंक्ति में भक्त प्रभु को गिरिधर (गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले) और कृष्ण मुरारी कहकर संबोधित करता है। आरती की प्रत्येक पंक्ति प्रभु के श्रृंगार, उनके आभूषणों और उनकी लीलाओं का वर्णन करती है। 'गले में बैजंती माला' प्रभु के वनवासी स्वरूप को दर्शाती है, जबकि 'नंद के आनंद नन्दलाला' उनके वात्सल्य भाव को उजागर करता है। भावार्थ यह है कि प्रभु का सौंदर्य इतना दिव्य है कि देवता भी उनके दर्शन के लिए लालायित रहते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

कुंज बिहारी आरती का महत्व ब्रज भूमि से जुड़ा है। यह आरती भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के युगल स्वरूप की स्तुति है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो भक्त प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक इस आरती का गायन करता है, उसके जीवन से अज्ञानता का अंधकार दूर होता है। यह आरती मन को एकाग्र करने और भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने में सहायक है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सर्वप्रथम शुद्ध होकर आसन पर बैठें। भगवान के विग्रह या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं। आरती करते समय घंटी और शंख का नाद करें। आरती को प्रभु के चरणों से शुरू करके मुखमंडल तक घुमाएं। आरती के बाद जल का आचमन करें और स्वयं प्रसाद ग्रहण करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

आरती के लिए एक पीतल या चांदी की थाली, शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूपबत्ती, ताजे पुष्प, चंदन, अक्षत (चावल), और घंटी-शंख अनिवार्य हैं।

राग, ताल एवं गायन समय

यह आरती मुख्य रूप से राग कल्याण या यमन में गाई जाती है, जो मन को शांति प्रदान करती है। इसे संध्या काल में सूर्यास्त के पश्चात करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित आरती करने से मानसिक तनाव कम होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और भक्त को प्रभु की कृपा का अनुभव होता है। यह आरती मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग है।

१. श्री कुंज बिहारी जी की पावन आरती - आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री कृष्ण जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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