पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माता कामधेनु आरती
18 पाठ

श्री कामधेनु माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय कामधेनु माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री कामधेनु माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय कामधेनु माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन संस्कृति में 'गौ' को केवल एक पशु नहीं, बल्कि 'माता' का दर्जा दिया गया है। माता कामधेनु, जिन्हें 'सुरभि' के नाम से भी जाना जाता है, वे समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य धेनु हैं। समुद्र मंथन से प्रकट हुई कामधेनु माता की सेवा और उनकी आरती करने से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस लेख में हम कामधेनु माता की पावन आरती, उसके भावार्थ और पूजा की शास्त्रीय विधि का विस्तार से वर्णन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय सुरभि माता, मैया जय कामधेनु माता।
तुम हो सुख की दाता, सब की भाग्य विधाता॥ ॐ जय सुरभि माता...

क्षीर सागर से निकली, तुम हो दिव्य स्वरूपा।
देवों की तुम जननी, तुम हो परम अनूपा॥ ॐ जय सुरभि माता...

तुम्हारे रोम-रोम में, बसते हैं सब देवा।
जो भी श्रद्धा से करता, तेरी पावन सेवा॥ ॐ जय सुरभि माता...

दुख-दारिद्रय मिटाती, सुख-संपत्ति तुम लाती।
भक्तों की मनोकामना, पल में पूर्ण कराती॥ ॐ जय सुरभि माता...

गौ-सेवा जो करता, भव सागर तर जाता।
तेरी कृपा से मैया, सब कुछ वह पाता॥ ॐ जय सुरभि माता...

कामधेनु तुम माता, सुरभि नाम तुम्हारा।
भक्तों की रक्षा करना, कर दो बेड़ा पार हमारा॥ ॐ जय सुरभि माता...

ॐ जय सुरभि माता, मैया जय कामधेनु माता।
तुम हो सुख की दाता, सब की भाग्य विधाता॥ ॐ जय सुरभि माता...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

आरती की प्रथम पंक्ति में भक्त माता सुरभि को प्रणाम करते हुए उन्हें 'सुख की दाता' और 'भाग्य विधाता' कहता है। इसका अर्थ है कि संसार में जो भी भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, वह माता कामधेनु की कृपा का ही फल है।

द्वितीय पद में 'क्षीर सागर' का उल्लेख है, जो पौराणिक कथाओं के अनुसार कामधेनु के जन्म का स्थान है। वे दिव्य स्वरूपा हैं और देवताओं की भी जननी मानी गई हैं। तृतीय पद में यह स्पष्ट किया गया है कि गौ माता के शरीर के प्रत्येक रोम में समस्त देवी-देवताओं का वास है, इसीलिए गौ सेवा साक्षात ईश्वर की सेवा के समान है।

अंतिम पंक्तियों में भक्त माता से प्रार्थना करता है कि वह उसके दुखों और दरिद्रता का नाश करें। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि माता के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, कामधेनु माता की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। वे 'सर्वकामदुघा' हैं, अर्थात जो भी भक्त उनसे मांगता है, वे उसे पूर्ण करती हैं। वे ऋषियों की तपस्या में सहायक रही हैं और वशिष्ठ मुनि के आश्रम में उनकी उपस्थिति ने धर्म की रक्षा की थी। गौ माता की पूजा करने से कुंडली के दोष, विशेषकर राहु-केतु और शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सबसे पहले गौ माता की प्रतिमा या चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाएं। आरती के समय मन में पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए। आरती के बाद परिक्रमा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना चाहिए, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध गाय का घी
  • कपूर की टिकिया
  • पीतल या तांबे की थाली
  • गंगाजल
  • धूप-बत्ती
  • शंख और घंटी

राग, ताल एवं गायन समय

कामधेनु माता की आरती को राग कल्याण या यमन में गाना अत्यंत कर्णप्रिय होता है। इसे संध्या काल (गोधूलि बेला) में गाना सबसे उत्तम माना जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से कामधेनु माता की आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इससे पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।

१. श्री कामधेनु माता की पावन आरती - ॐ जय सुरभि माता, मैया जय कामधेनु माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माता कामधेनु के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री माता कामधेनु जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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