॥ श्री गायत्री माता की पावन आरती - जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★हिन्दू सनातन धर्म में माँ गायत्री को 'वेदमाता', 'विश्वमाता' और 'देवमाता' के रूप में पूजा जाता है। वह त्रिमूर्ति—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—की संयुक्त शक्ति और संपूर्ण ब्रह्मांड के प्राणतत्व का प्रतीक हैं। माँ गायत्री की आराधना से न केवल बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है, बल्कि मनुष्य के जीवन के सभी अंधकार दूर होकर ज्ञान का प्रकाश फैलता है। श्री गायत्री माता की प्रसिद्ध आरती 'जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता' का गान करने से साधक को असीम शांति, मानसिक एकाग्रता और मोक्ष की प्राप्ति होती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम आपके लिए लेकर आए हैं माँ गायत्री की आरती का संपूर्ण विहंगम विवरण, जिसके माध्यम से आप उनकी महिमा को भली-भांति समझकर अपनी साधना को और अधिक फलदायी बना सकते हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता। दिन-ध्यावत दिन बावत, हरत दुसह पातक॥ (जय...) ब्रह्मा रूपणि विष्णुकर्णजा, शिवस्वरूपा रानी। तीनों लोक की पालनकर्ता, सकल भाग्य की दानी॥ (जय...) कमल आसन पर राजित, हंस वाहिनी माता। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज, रूप धरति त्राता॥ (जय...) पुस्तक श्वेत कमल बर ठाढ़े, माला कर जपतें। ज्ञान-विज्ञान प्रदात्री, सुर मुनि जन जपते॥ (जय...) कामधेनु सुरतरु की छाया, वेद पुराणन गाई। तुम्हरी महिमा अपरम्पार, त्रिभुवन में छाई॥ (जय...) कालचक्र की तुम हो स्वामिनी, भव भय हारिणि देवा। जो जन शरण तुम्हारी आए, पावत पद सेवा॥ (जय...) पतिता पावन करुणामयी, भक्तन हितकारी। ज्ञान चक्षु प्रगटावहु, भव बाधा टारी॥ (जय...) काम क्रोध मद लोभ नशावहु, मन मंदिर सजावहु। शुद्ध विचार बढ़ावहु, अमृत रस पाबौहु॥ (जय...) धूप दीप नैवेद्य अक्षत, पुष्पहार साजे। जय गायत्री माता की आरती, घर घर में विराजे॥ (जय...) जो यह आरती गावे, नितप्रति ध्यान धरे। ब्रह्मलोक पद पावे, भव से पार तरे॥ (जय...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माँ गायत्री की यह आरती केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उनके दिव्य स्वरूप, अनंत शक्तियों और परम कृपालु स्वभाव का जीवंत वर्णन है। भावार्थ को समझने से आरती का प्रभाव और अधिक गहरा हो जाता है:
प्रथम चरण - 'जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता। दिन-ध्यावत दिन बावत, हरत दुसह पातक।' - हे माँ गायत्री, आपकी जय हो! दिन-रात आपका ध्यान करने से मनुष्य के सभी कठिन पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं और उसका जीवन आलोकित हो जाता है।
द्वितीय चरण - 'ब्रह्मा रूपणि विष्णुकर्णजा, शिवस्वरूपा रानी। तीनों लोक की पालनकर्ता, सकल भाग्य की दानी।' - आप ही ब्रह्माजी का स्वरूप हैं, भगवान विष्णु के कानों से उत्पन्न (या उनकी शक्ति) और भगवान शिव की अर्धांगिनी या स्वरूपा रानी हैं। आप तीनों लोकों का पालन करने वाली और सबको सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं।
तृतीय चरण - 'कमल आसन पर राजित, हंस वाहिनी माता। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज, रूप धरति त्राता।' - आप कमल आसन पर विराजमान हैं और हंस आपकी सवारी है। भक्तों की रक्षा के लिए आप दो, चार या दस भुजाओं वाले विभिन्न रूप धारण करती हैं।
चतुर्थ चरण - 'पुस्तक श्वेत कमल बर ठाढ़े, माला कर जपतें। ज्ञान-विज्ञान प्रदात्री, सुर मुनि जन जपते।' - आपके एक हाथ में श्वेत पुस्तक और दूसरे में जपमाला सुशोभित होती है। आप संपूर्ण ज्ञान और विज्ञान की दात्री हैं, जिनका देवता और मुनिजन भी निरंतर स्मरण करते हैं।
पंचम चरण - 'कामधेनु सुरतरु की छाया, वेद पुराणन गाई। तुम्हरी महिमा अपरम्पार, त्रिभुवन में छाई।' - वेद और पुराणों ने आपकी महिमा गाई है। आपकी कृपा कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष की छाया के समान सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है। तीनों लोकों में आपकी महिमा व्याप्त है।
षष्ठम चरण - 'कालचक्र की तुम हो स्वामिनी, भव भय हारिणि देवा। जो जन शरण तुम्हारी आए, पावत पद सेवा।' - आप इस कालचक्र की स्वामिनी और संसार के सभी भयों को हरने वाली देवी हैं। जो भी मनुष्य आपकी शरण में आता है, वह आपकी चरण सेवा और परम पद को प्राप्त करता है।
सप्तम चरण - 'पतिता पावन करुणामयी, भक्तन हितकारी। ज्ञान चक्षु प्रगटावहु, भव बाधा टारी।' - आप पतितों को पावन करने वाली, करुणामयी और भक्तों का हित करने वाली हैं। हे माता, हमारे ज्ञान चक्षु को प्रकट करें और संसार की सभी बाधाओं को दूर करें।
अष्टम चरण - 'काम क्रोध मद लोभ नशावहु, मन मंदिर सजावहु। शुद्ध विचार बढ़ावहु, अमृत रस पाबौहु।' - हमारे भीतर से काम, क्रोध, मोह और लोभ का नाश करें तथा हमारे मन के मंदिर को स्वच्छ व सजा हुआ बनाएं। हमारे भीतर पवित्र विचारों का संचार करें जिससे हमें अध्यात्म का अमृत रस प्राप्त हो सके।
नवम चरण - 'धूप दीप नैवेद्य अक्षत, पुष्पहार साजे। जय गायत्री माता की आरती, घर घर में विराजे।' - धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत और पुष्पों की माला के साथ आपकी पूजा संपन्न होती है। आपकी यह पावन आरती प्रत्येक घर में प्रकाश और सुख-शांति फैलाए।
दशम चरण - 'जो यह आरती गावे, नितप्रति ध्यान धरे। ब्रह्मलोक पद पावे, भव से पार तरे।' - जो भी साधक नित्य नियम से इस आरती का गान और ध्यान करता है, वह अंत में ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है और इस भवसागर से पूरी तरह तर जाता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में गायत्री महामंत्र और गायत्री माता की आरती का स्थान सर्वोच्च माना गया है। स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण और भगवद्गीता में गायत्री विद्या की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि गायत्री माता की उत्पत्ति सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी के मुख से हुई थी। वेदों की उत्पत्ति का आधार भी गायत्री मंत्र ही है।
माँ गायत्री की आरती करने से साधक के शरीर में चक्रों का जागरण होता है, विशेषकर आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र सक्रिय होते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह आरती मानसिक विकारों को शांत करने, एकाग्रता बढ़ाने और नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने में अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है। जो परिवार नियमित रूप से संध्याकाल में गायत्री आरती करता है, वहाँ कभी भी अकाल मृत्यु, दरिद्रता और क्लेश का वास नहीं होता।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- शुद्धता एवं समय: प्रातःकाल ब्रह्म बेला में (सूर्य उदय से पूर्व या सूर्योदय के समय) तथा संध्याकाल में प्रदोष काल के समय गायत्री आरती करना अत्यंत उत्तम माना गया है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। माँ गायत्री की मूर्ति, फ्रेम या चित्र स्थापित करें।
- दीपक प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक और कपूर जलाकर पूजा की शुरुआत करें।
- संकल्प एवं ध्यान: मन में माता का स्मरण करते हुए 'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं...' मंत्र का कम से कम एक माला या 108 बार जाप करें।
- आरती गान: हाथ में थाल लेकर श्रद्धा, भाव और उच्च स्वर में 'जय गायत्री माता' आरती गाएं। आरती के अंत में माता को प्रणाम कर क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माँ गायत्री की आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:
- थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक (रुई की बत्ती के साथ)।
- कपूर: आरती के अंत में प्रज्वलित करने के लिए शुद्ध भीमसेनी कपूर।
- अक्षत: बिना टूटे हुए साफ चावल (रोली या कुमकुम से रंगे हुए)।
- पुष्प एवं माला: ताजे सुगंधित फूल (कमल का फूल मिल सके तो अति उत्तम) और फूलों की माला।
- धूप और अगरबत्ती: वातावरण को सुगंधित और पवित्र बनाने के लिए प्राकृतिक धूप।
- घंटी और शंख: सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मकता को दूर भगाने के लिए शंख और घंटी।
राग, ताल एवं गायन समय
माँ गायत्री की आरती का गायन प्रायः 'राग कल्याण', 'राग यमन' या 'राग भैरवी' में किया जाता है। ये राग मन को शांत करने और भक्ति भाव जगाने के लिए सर्वोत्कृष्ट माने जाते हैं। इसे কাহারवा या तीनताल की लय में गाया जा सकता है। सर्वोत्तम गायन समय प्रातः 4 बजे से 8 बजे के बीच और सायं 6 बजे से 8 बजे के बीच का माना जाता है, जब वातावरण शांत और शुद्ध होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
- बुद्धि और विद्या की प्राप्ति: विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए गायत्री आरती का नित्य गान स्मरण शक्ति और बुद्धि को तीव्र करता है।
- मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: दैनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक अशांति से जूझ रहे लोगों के लिए यह आरती मानसिक सुकून प्रदान करती है।
- तेज और ओज में वृद्धि: माता गायत्री के प्रकाश स्वरूप की आरती करने से साधक के चेहरे पर तेज और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- पाप नाश और मोक्ष: जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का क्षय होता है और अंत में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
क्या महिलाएँ गायत्री माता की आरती और मंत्र जाप कर सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल। शास्त्रानुसार माँ गायत्री स्वयं स्त्री स्वरूप (वेदमाता) हैं, अतः महिलाओं को गायत्री माता की पूजा, आरती और मंत्र जाप करने का पूर्ण अधिकार है। प्राचीन काल में गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं ने गायत्री साधना से ही ब्रह्मज्ञानी पद प्राप्त किया था।
गायत्री आरती किस समय करना सबसे उत्तम माना जाता है?
गायत्री आरती के लिए त्रिकाल संध्या (प्रातःकाल, मध्याह्न काल और सायं काल) का समय सर्वोत्तम माना जाता है। यदि त्रिकाल संभव न हो, तो प्रातः सूर्योदय के समय और संध्याकाल में सूर्यास्त के समय आरती अवश्य करनी चाहिए।
क्या बिना दीक्षा के गायत्री मंत्र और आरती कर सकते हैं?
हाँ, लोककल्याण और सात्विक भाव से कोई भी व्यक्ति बिना किसी कठिन दीक्षा के सामान्य विधि से माँ गायत्री की आरती और मंत्र का जप कर सकता है। माता की कृपा प्राप्त करने के लिए केवल श्रद्धा, पवित्रता और समर्पण भाव की आवश्यकता होती है।
आरती के अंत में शंख और घंटी क्यों बजाई जाती है?
शंखनाद और घंटी की ध्वनि से उत्पन्न होने वाली तरंगें वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा, सूक्ष्म कीटाणुओं और दुष्ट शक्तियों को दूर भगाती हैं। यह हमारे मन को केंद्रित करती है और भगवान तक हमारी पुकार शीघ्र पहुँचाती है।