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श्री माँ गायत्री आरती
9 पाठ

श्री गायत्री माता की आरती - जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री गायत्री माता की आरती - जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में माँ गायत्री को वेदों की माता, आदि शक्ति और जगत जननी के रूप में पूजा जाता है। 'श्री गायत्री माता की आरती' - जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता, का गान करने से साधक के अंतःकरण में विद्यमान समस्त अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है और दिव्य ज्ञान, बुद्धि एवं आत्मबल का संचार होता है। इस विस्तृत एवं प्रामाणिक गाइड में हम माँ गायत्री की संपूर्ण आरती, उसके गहरे दार्शनिक भावार्थ, शास्त्रसम्मत पूजा विधि, आवश्यक सामग्री तथा इसके नित्य पाठ से मिलने वाले अद्भुत आध्यात्मिक लाभों की चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता। दिनचरी की ज्योति तेरी, महिमा विख्याता॥ जय गायत्री माता…॥

ब्रह्म रूपिणी तुम ही, प्राणों की दाता। भव बंधन भय हारिणी, संकट की त्राता॥ जय गायत्री माता…॥

मात श्वेतवर्णा तुम, हंस पर विराजे। कमल आसन शोभित, कर में माला साजे॥ जय गायत्री माता…॥

ध्रुव, प्रह्लाद जिन्होने, तुमको ध्याया। नारद मुनि ने गुणगान, ನಿशदिन गाया॥ जय गायत्री माता…॥

तुम ही ब्रह्मा, विष्णु, तुम ही महेशा। सृष्टि की रचियत्री, हरती सब क्लेशा॥ जय गायत्री माता…॥

माता सुधामयी तुम, भव-दुख हारिणी। पाप विमोचनि माता, भव भय वारिणी॥ जय गायत्री माता…॥

कामधेनु जननी तुम, कल्पतरु रूपा। सुख-संपत्ति दातानी, आदि परारूपा॥ जय गायत्री माता…॥

जो जन ध्यान लगावे, मनवांछित फल पावे। संकट सब मिट जावे, आनंद मंगल छावे॥ जय गायत्री माता…॥

पतिव्रता कुलपालिका, माता सुखकारी। शरण गहे जो तेरी, भव से उतरे तारी॥ जय गायत्री माता…॥

जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता। दिनचरी की ज्योति तेरी, महिमा विख्याता॥ जय गायत्री माता…॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री गायत्री माता की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का एक भजन नहीं है, बल्कि यह वेदमाता के दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा और साधक के प्रति उनके वात्सल्य का सजीव चित्रण है। प्रत्येक पंक्ति का गहन भावार्थ इस प्रकार है:

"जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता। दिनचरी की ज्योति तेरी, महिमा विख्याता॥"
हे जगत की माता गायत्री! आपकी जय हो। आपकी ज्योति इस चराचर जगत में सूर्य के समान नित्य प्रकाशित है और आपकी महिमा तीनों लोकों में विख्यात है।

"ब्रह्म रूपिणी तुम ही, प्राणों की दाता। भव बंधन भय हारिणी, संकट की त्राता॥"
आप ही साक्षात परब्रह्म का स्वरूप हैं और समस्त प्राणियों को प्राण ऊर्जा प्रदान करती हैं। आप ही इस संसार के जन्म-मरण के बंधनों और सभी भयों को हरने वाली तथा संकट के समय रक्षा करने वाली त्राता हैं।

"मात श्वेतवर्णा तुम, हंस पर विराजे। कमल आसन शोभित, कर में माला साजे॥"
हे माता! आपका वर्ण श्वेत है, जो पवित्रता का प्रतीक है। आप श्वेत हंस पर विराजमान हैं, कमल के आसन पर सुशोभित होती हैं और आपके हाथों में वेदों की माला तथा अमृत कलश सुशोभित है।

"ध्रुव, प्रह्लाद जिन्होने, तुमको ध्याया। नारद मुनि ने गुणगान, निशदिन गाया॥"
भक्त ध्रुव और प्रह्लाद जैसे महान भक्तों ने आपका ही स्मरण करके अमरता और परम पद प्राप्त किया। देवर्षि नारद जी ने भी दिन-रात आपके गुणों का गान किया है।

"तुम ही ब्रह्मा, विष्णु, तुम ही महेशा। सृष्टि की रचियत्री, हरती सब क्लेशा॥"
सृष्टि के संचालन के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियाँ आपी से उत्पन्न होती हैं। आप ही इस ब्रह्मांड की रचयिता हैं और भक्तों के सभी क्लेशों व दुखों का नाश करती हैं।

"माता सुधामयी तुम, भव-दुख हारिणी। पाप विमोचनि माता, भव भय वारिणी॥"
आप अमृत के समान निर्मल स्वभाव वाली, संसार के दुखों और जन्म-जन्मांतर के पापों का शमन करने वाली महाशक्ति हैं।

"कामधेनु जननी तुम, कल्पतरु रूपा। सुख-संपत्ति दातानी, आदि परारूपा॥"
आप समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष के समान हैं। आप ही सभी प्रकार के सुख-सौभाग्य और मोक्ष को प्रदान करने वाली आदिशक्ति पराूपा हैं।

"जो जन ध्यान लगावे, मनवांछित फल पावे। संकट सब मिट जावे, आनंद मंगल छावे॥"
जो भी साधक सच्चे मन से आपका ध्यान करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर लेता है। उसके जीवन के सभी संकट समाप्त हो जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि व मंगल का वास होता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में गायत्री मंत्र को 'महामंत्र' की संज्ञा दी गई है और गायत्री माता को संपूर्ण वेदों, शास्त्रों तथा ज्ञान की उद्गम स्थली माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बिना गायत्री उपासना के किसी भी प्रकार की साधना, अनुष्ठान या संध्यावंदन पूर्ण नहीं माना जाता है।

जब साधक नियमपूर्वक श्री गायत्री माता की आरती करता है, तो उसके आसपास एक सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का घेरा (Aura) बन जाता है। यह आरती मानसिक तनाव, अवसाद और नकारात्मक विचारों को दूर करने में अत्यंत प्रभावी है। स्कंद पुराण और विश्वामित्र कल्प में स्पष्ट उल्लेख है कि माता गायत्री की आरती और मंत्र जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उसे शास्त्रोक्त विधि से करना अत्यंत आवश्यक है। गायत्री माता की आरती के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • समय: गायत्री माता की आरती मुख्यतः प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय) और संध्या काल (प्रदोष काल) में करनी चाहिए। प्रातः काल की आरती से ऊर्जा मिलती है और संध्या की आरती से दिनभर की थकान व नकारात्मकता दूर होती है।
  • स्थान: पूजा घर को स्वच्छ करें। माँ गायत्री की पंचमुखी श्वेत या स्वर्ण प्रतिमा अथवा चित्र को चौकी पर स्थापित करें।
  • आसन: कुश या ऊनी आसन पर बैठकर शांत चित्त से आरती प्रारंभ करें।
  • प्रक्रिया: सबसे पहले भगवान गणेश और अपने गुरु का स्मरण करें। इसके बाद माँ गायत्री का षोडशोपचार या पंचोपचार पूजन करें। धूप-दीप जलाकर, घंटी बजाते हुए प्रेम और भक्ति भाव से 'जय गायत्री माता' की आरती गाएं। आरती के पश्चात दोनों हाथों से दीप को प्रणाम कर उसकी ज्योति को अपनी आँखों से लगाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

माता गायत्री की आरती को पूर्णता प्रदान करने के लिए थाल में निम्नलिखित सामग्रियां अवश्य होनी चाहिए:

  • पूजा की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (यदि संभव हो तो मिट्टी या पीतल का दीपक)।
  • कपूर: शुद्ध कपूर, जो आरती के समय प्रज्वलित किया जाता है।
  • धूप और अगरबत्ती: सुगंधित प्राकृतिक धूप या लोबान।
  • पुष्प: ताजे सफेद या पीले रंग के सुगंधित फूल (कमल या गेंदे के फूल सर्वोत्तम माने जाते हैं)।
  • घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और देवताओं का आह्वान करने के लिए घंटी और शंख।
  • अक्षत (चावल) और रोली: तिलक और पूजन अर्पण के लिए।
  • नैवेद्य: मिष्ठान, फल या मखाने का प्रसाद।

राग, ताल एवं गायन समय

संगीत और सुरों के माध्यम से की गई आरती माँ को अतिप्रिय होती है। श्री गायत्री माता की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो मन को शांत और एकाग्र करता है। इसकी ताल কাহারवा (8 बीट) या दादरा (6 बीट) होती है, जिसे आसानी से तालियों या मंजीरे के साथ गाया जा सकता है। आरती के गायन की अवधि लगभग 5 से 7 मिनट होनी चाहिए, जिसमें उच्चारण स्पष्ट और भाव पूर्ण होने चाहिए।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य प्रति नियम से श्री गायत्री माता की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • बुद्धि एवं ज्ञान की प्राप्ति: विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए गायत्री आरती बुद्धि, एकाग्रता और तीव्र स्मरण शक्ति प्रदान करती है।
  • तेज और ओज में वृद्धि: सूर्य सदृश गायत्री माता की कृपा से चेहरे पर तेज और ओज की वृद्धि होती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर की कलह, वास्तु दोष और बुरी दृष्टियों से परिवार की रक्षा होती है।
  • आरोग्य लाभ: शारीरिक और मानसिक बीमारियां दूर होती हैं तथा दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • मोक्ष प्राप्ति: जीवन के अंतिम समय में भगवद्धाम की प्राप्ति और भवसागर से तरने का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • आत्मविश्वास: मन का भय और अज्ञात चिंताएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: गायत्री माता की आरती दिन में कितनी बार करनी चाहिए?

उत्तर: गायत्री माता की आरती मुख्य रूप से दिन में दो बार - प्रातः काल सूर्योदय के समय और संध्या काल में करनी सर्वोत्तम मानी जाती है।

प्रश्न: क्या गायत्री माता की आरती कोई भी कर सकता है?

उत्तर: हाँ, माता गायत्री जगत जननी हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने का अधिकार हर मनुष्य को है। जाति, लिंग या उम्र के बंधन के बिना कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति यह आरती कर सकता है।

प्रश्न: गायत्री आरती के समय कौन सा दीपक जलाना चाहिए?

उत्तर: गायत्री आरती के लिए शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाना सबसे उत्तम और श्रेष्ठ फलदायी माना जाता है।

प्रश्न: क्या बिना मंत्रों के केवल आरती गाने से भी पुण्य मिलता है?

उत्तर: निश्चित रूप से। भक्ति और भाव सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि आप केवल प्रेमपूर्वक 'जय गायत्री माता' की आरती भी गाते हैं, तो माता अपने भक्तों के सभी संकट हर लेती हैं।

१. श्री गायत्री माता की आरती - जय गायत्री माता, मैया जय गायत्री माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माँ गायत्री के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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