पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान धन्वंतरि आरती
8 पाठ

श्री धन्वंतरि भगवान की पावन आरती - ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री धन्वंतरि भगवान की पावन आरती - ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक और साक्षात भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब वे अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो उन्होंने संसार को रोगमुक्त करने का संकल्प लिया। उनकी पावन आरती करना न केवल स्वास्थ्य के लिए वरदान है, बल्कि यह मन को शांति और आत्मा को दिव्यता प्रदान करता है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-विकार मिटाओ, जन-जन की सेवा॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

अमृत कलश लिए, कर में तुम आए।
सागर मंथन से, प्रभु तुम ही हो पाए॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

आयुर्वेद के ज्ञाता, तुम ही हो स्वामी।
दुख-दारिद्र्य मिटाओ, अंतर्यामी॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

रोग-शोक सब नाशो, प्रभु तुम ही हो दाता।
भक्तों के तुम रक्षक, तुम ही हो विधाता॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

दीपक ज्योति जलाकर, तुमको हम ध्याते।
आरती कर प्रभु तेरी, सुख-संपत्ति पाते॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-विकार मिटाओ, जन-जन की सेवा॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

धन्वंतरि आरती की प्रत्येक पंक्ति में गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ छिपा है। 'ॐ जय धन्वंतरि देवा' का अर्थ है कि हम उस दिव्य शक्ति को नमन करते हैं जो स्वास्थ्य और जीवन का आधार है। 'जरा-विकार मिटाओ' का अर्थ है कि हे प्रभु, आप हमारे शरीर की वृद्धावस्था और रोगों को दूर करें। 'अमृत कलश लिए' पंक्ति हमें याद दिलाती है कि धन्वंतरि देव ही वह शक्ति हैं जो हमें अमरता और स्वास्थ्य का अमृत प्रदान करते हैं। यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक प्रार्थना है कि हमारे भीतर का अज्ञान और रोग रूपी अंधकार दूर हो।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था। वे भगवान विष्णु के अंश हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद के ग्रंथों में उन्हें 'देव चिकित्सक' कहा गया है। उनकी आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सबसे पहले भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र को शुद्ध जल से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं और पूरे भक्ति भाव से आरती करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती के बाद स्वयं को और उपस्थित भक्तों को जल का छींटा दें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध घी का दीपक
  • कपूर (आरती के अंत में)
  • ताजे फूल (विशेषकर पीले फूल)
  • धूप और अगरबत्ती
  • नैवेद्य (फल या मिष्ठान)
  • शंख और घंटी
  • गंगाजल

राग, ताल एवं गायन समय

धन्वंतरि आरती को राग कल्याण या राग यमन में गाना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसकी लय धीमी और गंभीर होनी चाहिए। इसे प्रातःकाल या संध्याकाल में करना सबसे उत्तम है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से धन्वंतरि आरती करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। यह मानसिक तनाव को कम करता है और व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक आरती करते हैं, उनके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

१. श्री धन्वंतरि भगवान की पावन आरती - ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान धन्वंतरि के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान धन्वंतरि जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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