॥ श्री धन्वंतरि भगवान की पावन आरती - ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक और साक्षात भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। समुद्र मंथन के समय जब वे अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो उन्होंने संसार को रोगमुक्त करने का संकल्प लिया। उनकी पावन आरती करना न केवल स्वास्थ्य के लिए वरदान है, बल्कि यह मन को शांति और आत्मा को दिव्यता प्रदान करता है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-विकार मिटाओ, जन-जन की सेवा॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
अमृत कलश लिए, कर में तुम आए।
सागर मंथन से, प्रभु तुम ही हो पाए॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
आयुर्वेद के ज्ञाता, तुम ही हो स्वामी।
दुख-दारिद्र्य मिटाओ, अंतर्यामी॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
रोग-शोक सब नाशो, प्रभु तुम ही हो दाता।
भक्तों के तुम रक्षक, तुम ही हो विधाता॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
दीपक ज्योति जलाकर, तुमको हम ध्याते।
आरती कर प्रभु तेरी, सुख-संपत्ति पाते॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-विकार मिटाओ, जन-जन की सेवा॥ ॐ जय धन्वंतरि देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
धन्वंतरि आरती की प्रत्येक पंक्ति में गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ छिपा है। 'ॐ जय धन्वंतरि देवा' का अर्थ है कि हम उस दिव्य शक्ति को नमन करते हैं जो स्वास्थ्य और जीवन का आधार है। 'जरा-विकार मिटाओ' का अर्थ है कि हे प्रभु, आप हमारे शरीर की वृद्धावस्था और रोगों को दूर करें। 'अमृत कलश लिए' पंक्ति हमें याद दिलाती है कि धन्वंतरि देव ही वह शक्ति हैं जो हमें अमरता और स्वास्थ्य का अमृत प्रदान करते हैं। यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि एक प्रार्थना है कि हमारे भीतर का अज्ञान और रोग रूपी अंधकार दूर हो।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था। वे भगवान विष्णु के अंश हैं। उनकी पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य की प्राप्ति होती है। आयुर्वेद के ग्रंथों में उन्हें 'देव चिकित्सक' कहा गया है। उनकी आरती करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने के लिए सबसे पहले भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र को शुद्ध जल से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं और पूरे भक्ति भाव से आरती करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती के बाद स्वयं को और उपस्थित भक्तों को जल का छींटा दें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध घी का दीपक
- कपूर (आरती के अंत में)
- ताजे फूल (विशेषकर पीले फूल)
- धूप और अगरबत्ती
- नैवेद्य (फल या मिष्ठान)
- शंख और घंटी
- गंगाजल
राग, ताल एवं गायन समय
धन्वंतरि आरती को राग कल्याण या राग यमन में गाना अत्यंत प्रभावी माना जाता है। इसकी लय धीमी और गंभीर होनी चाहिए। इसे प्रातःकाल या संध्याकाल में करना सबसे उत्तम है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से धन्वंतरि आरती करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। यह मानसिक तनाव को कम करता है और व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक आरती करते हैं, उनके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।