॥ श्री धन्वंतरि भगवान की आरती - ॐ जय धन्वंतरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं आरोग्य प्राप्ति विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन परंपरा में शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को जीवन का मूल आधार माना गया है। शास्त्रों का उद्घोष है—'पहला सुख निरोगी काया'। समस्त चराचर जगत को व्याधिमुक्त, आरोग्यवान और दीर्घायु बनाने के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने समुद्र मंथन के पावन काल में अपने द्वादश अवतार के रूप में श्री धन्वंतरि रूप धारण किया था। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (धनतेरस) के दिन अमृत कलश, शंख, चक्र और जड़ी-बूटियों के साथ प्रकट हुए आदि-वैद्य भगवान धन्वंतरि की नित्य अथवा विशेष उपासना समस्त रोगों का शमन करने वाली है। उनकी स्तुति में गाई जाने वाली आरती 'ॐ जय धन्वंतरि देवा' न केवल वातावरण को दिव्य औषधीय ऊर्जा से भर देती है, अपितु साधक के अंतर्मन में प्राण-शक्ति का संचार कर समस्त त्रिदोषों (वात, पित्त, कफ) का संतुलन स्थापित करती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-रोग-भय-हारी, सुर-नर-मुनि-सेवा॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
क्षीरसागर मंथन से, जब अमृत निकला।
आयुर्वेद विधाता, प्रभु जग में प्रगटा॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
चार भुजा अति सुंदर, पीताम्बर धारे।
अमृत-कलश कमंडल, शंख चक्र साजे॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
सर्व व्याधि नाशक तुम, त्रिभुवन उजियारा।
शल्य-क्रिया-शास्त्र के, तुम ही आधारा॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
दिव्य ओषधि कर में, कांति परम पावन।
रोग-शोक-संताप मिटे, दर्शन मनभावन॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
जो नर तुमको ध्यावे, आरोग्य-धन पावे।
दीर्घायु सुख-संपति, सब संकट मिट जावे॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
वैद्य-चिकित्सक जन पर, कृपा करो देवा।
मानवता के रक्षक, हम नित करें सेवा॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा...॥
श्री धन्वंतरि जी की आरती, जो कोई नर गावे।
रोग-दोष-भय छूटे, परम पद पावे॥
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा।
जरा-रोग-भय-हारी, सुर-नर-मुनि-सेवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
ॐ जय धन्वंतरि देवा, स्वामी जय धन्वंतरि देवा। जरा-रोग-भय-हारी, सुर-नर-मुनि-सेवा॥
हे सर्वेश्वर भगवान धन्वंतरि! आपकी सदा जय हो। आप समस्त जगत के स्वामी हैं। आप वृद्धावस्था की दुर्बलता (जरा), शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों (रोग) तथा मृत्यु के भय का समूल नाश करने वाले हैं। देवता, मनुष्य एवं परम तपस्वी ऋषि-मुनि निरंतर आपकी श्रद्धापूर्वक सेवा और आराधना करते हैं।
क्षीरसागर मंथन से, जब अमृत निकला। आयुर्वेद विधाता, प्रभु जग में प्रगटा॥
जब क्षीरसागर का महामंथन हुआ, तब देवताओं और दानवों के कल्याण हेतु आप अमृत कलश धारण कर प्रकट हुए। आप केवल औषधि के ज्ञाता नहीं, अपितु जीवन के सनातन विज्ञान 'आयुर्वेद' के मूल विधाता और प्रवर्तक हैं, जिन्होंने संसार को स्वास्थ्य और दीर्घायु की विद्या प्रदान की।
चार भुजा अति सुंदर, पीताम्बर धारे। अमृत-कलश कमंडल, शंख चक्र साजे॥
प्रभु का दिव्य चतुर्भुज स्वरूप अनुपम और मनोहारी है। उन्होंने दैवीय पीताम्बर वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके हाथों में जीवनदायिनी अमृत का कलश, पवित्र कमंडल, मंगलकारी शंख तथा समस्त विकारों को नष्ट करने वाला सुदर्शन चक्र सुशोभित है, जो उनकी रक्षात्मक शक्ति का परिचायक है।
सर्व व्याधि नाशक तुम, त्रिभुवन उजियारा। शल्य-क्रिया-शास्त्र के, तुम ही आधारा॥
हे प्रभु! आप तीनों लोकों में ज्ञान और स्वास्थ्य का प्रकाश फैलाने वाले हैं। आप समस्त असाध्य और साध्य रोगों का नाश करने में सक्षम हैं। संसार में शल्य-चिकित्सा (सर्जरी), सुश्रुत परंपरा और काय-चिकित्सा के मूल जनक व आधारस्तंभ आप ही हैं।
दिव्य ओषधि कर में, कांति परम पावन। रोग-शोक-संताप मिटे, दर्शन मनभावन॥
आपके श्रीकरकमलों में दिव्य वनौषधियां और जीवनरक्षक जड़ी-बूटियां हैं। आपके श्रीविग्रह की कांति अत्यंत पवित्र और रोगहारी है। आपके पावन दर्शन मात्र से प्राणियों के शारीरिक रोग, मानसिक शोक और सांसारिक संताप तत्काल शांत हो जाते हैं।
जो नर तुमको ध्यावे, आरोग्य-धन पावे। दीर्घायु सुख-संपति, सब संकट मिट जावे॥
जो भी मनुष्य निष्कपट भाव से आपका ध्यान, स्मरण और वंदन करता है, उसे संसार का सर्वोत्कृष्ट धन यानी 'आरोग्य रूपी महाधन' प्राप्त होता है। उसे दीर्घायु, आत्मिक शांति, सुख-समृद्धि सुलभ होती है और जीवन के समस्त शारीरिक व दैविक संकट दूर हो जाते हैं।
वैद्य-चिकित्सक जन पर, कृपा करो देवा। मानवता के रक्षक, हम नित करें सेवा॥
हे देवाधिदेव! संपूर्ण चिकित्सा जगत, वैद्यगण, शल्य-चिकित्सक एवं स्वास्थ्यकर्मियों पर अपनी करुणा दृष्टि बनाए रखें, जिससे वे आपके दिखाए मार्ग पर चलकर निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा कर सकें और रोगियों का कल्याण कर सकें।
श्री धन्वंतरि जी की आरती, जो कोई नर गावे। रोग-दोष-भय छूटे, परम पद पावे॥
जो पुण्यात्मा भगवान धन्वंतरि की इस पावन आरती का प्रतिदिन अथवा विशेष तिथियों पर भक्तिभाव से गायन करता है, वह समस्त शारीरिक रोगों, मानसिक विकारों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्त होकर अंततः मोक्ष रूपी परम पद को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण एवं चरक-संहिता के अनुसार, भगवान धन्वंतरि साक्षात भगवान श्रीहरि नारायण के अंशावतार हैं। जब देवों और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन हो रहा था, तब चौदह रत्नों के उपरांत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत से भरा स्वर्ण-कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसीलिए इस पावन तिथि को 'धन्वंतरि जयंती' अथवा लोकभाषा में 'धनतेरस' कहा जाता है।
शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि केवल भौतिक धन (स्वर्ण-रजत) का संचय पर्याप्त नहीं है; यदि व्यक्ति का शरीर रोगग्रस्त है, तो समस्त ऐश्वर्य व्यर्थ सिद्ध होते हैं। भगवान धन्वंतरि की उपासना का आध्यात्मिक मंतव्य यह है कि मनुष्य अपनी काया को देवालय समझे। धन्वंतरि जी ने मानव सभ्यता को आयुर्वेद के आठ अंगों (अष्टांग आयुर्वेद) का ज्ञान दिया, जिसमें शल्य तंत्र, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतंत्र, रसायन और वाजीकरण शामिल हैं। इस आरती के श्रवण और कीर्तन से मनुष्य के भीतर सकारात्मक प्राणिक तरंगों (Bio-energetic vibrations) का संचार होता है, जो रोगों से लड़ने की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता को जागृत करती हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान धन्वंतरि की आरती करते समय शास्त्रीय मर्यादा और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
- शुद्धिकरण एवं समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल प्रदोष काल में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, पीले अथवा श्वेत वस्त्र धारण करें।
- आसन एवं दिशा: पूजा हेतु पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर कुशा या ऊन के आसन पर बैठें। लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
- पंचोपचार पूजन: आरती से पूर्व भगवान को गंगाजल मिश्रित जल से प्रतीकात्मक आचमन कराएं। पीला चंदन, अक्षत, पीले पुष्प, तुलसी दल तथा मौसमी फल अर्पित करें।
- नैवेद्य समर्पण: भगवान धन्वंतरि को पंचामृत, तुलसी मिश्रित खीर अथवा औषधि रूपी गिलोय, आंवला या मौसमी फलों का भोग लगाएं।
- दीप प्रज्वलन व परिभ्रमण: शुद्ध गाय के घी का पंचमुखी दीपक अथवा कपूर प्रज्वलित करें। आरती करते समय दीपक को भगवान के चरणों में चार बार, नाभि कमल पर दो बार, मुखमंडल पर तीन बार और अंत में संपूर्ण श्रीविग्रह के सम्मुख सात बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।
- शंख व घंटी नाद: आरती के समय घंटी, शंख अथवा मंजीरे की ध्वनि निरंतर बजनी चाहिए, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो और वातावरण में दैवीय स्पंदन उत्पन्न हो।
- आरती ग्रहण एवं परिक्रमा: आरती पूर्ण होने के उपरांत आरती पर जल का छींटा देकर स्वयं आरती लें और परिजनों में वितरित करें। संभव हो तो अपने स्थान पर खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
आरती की थाली को वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से ऊर्जा का केंद्र माना गया है। पूजन हेतु निम्नलिखित सामग्री पूर्व में ही सुसज्जित कर लेनी चाहिए:
| सामग्री | प्रकार / विशेषता | धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व |
|---|---|---|
| आरती थाल | पीतल, तांबा अथवा कांसा | धातु की शुद्धता से सकारात्मक चुंबकीय तरंगों का प्रेषण होता है। |
| दीपक | पंचमुखी पीतल अथवा मिट्टी का दीया | पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का संतुलन स्थापित करता है। |
| घी / कपूर | देसी गाय का शुद्ध घृत / भीमसेनी कपूर | हवा को जीवाणुमुक्त करता है और पर्यावरण में औषधीय प्राणवायु घोलता है। |
| घंटी | गरुड़ अंकित पीतल की घंटी | नाद ब्रह्म का जागरण और तामसिक शक्तियों का निष्कासन। |
| शंख | दक्षिणावर्ती अथवा वामावर्ती शंख | शंखध्वनि से असाध्य विषाणुओं का नाश और फेफड़ों का बलवर्धन। |
| पुष्प एवं अक्षत | पीले गेंदे के पुष्प, अपराजिता व अक्षत | समर्पण, सात्त्विकता और दीर्घायु की प्रार्थना का प्रतीक। |
राग, ताल एवं गायन समय
श्री धन्वंतरि भगवान की आरती को पारंपरिक रूप से राग बिलावल अथवा राग कल्याण के शांत एवं भक्तिपूर्ण सुरों में गाया जाता है। यह आरती कहरवा ताल (8 मात्रा) अथवा दादरा ताल के सुगम प्रवाह में सहजता से गाई जाती है।
गायन का सर्वश्रेष्ठ समय सायंकाल 'प्रदोष काल' (सूर्यास्त के आसपास का समय) माना गया है, विशेषकर धनतेरस और कार्तिक मास की त्रयोदशियों पर। दैनिक साधना में इसे प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय गाना परम फलदायी होता है, क्योंकि इस समय वातावरण में प्राणवायु (ऑक्सीजन) का घनत्व सर्वाधिक होता है और आरती के शब्दों का नाद फेफड़ों तथा हृदय चक्र (अनाहत चक्र) को स्वाभाविक रूप से बल प्रदान करता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
- व्याधि मुक्ति एवं आरोग्य: भगवान धन्वंतरि की नियमित आरती से असाध्य शारीरिक रोगों, दीर्घकालीन व्याधियों और मौसमी संक्रमणों से मुक्ति मिलती है।
- त्रिदोष का संतुलन: इस स्तुति के भावपूर्ण गायन से शरीर में वात, पित्त और कफ का प्राकृतिक संतुलन बना रहता है, जिससे जीवनी-शक्ति (Ojas) बढ़ती है।
- चिकित्सकों हेतु सिद्धि: आयुर्वेद चिकित्सकों, एलोपैथी डॉक्टरों, वैद्यों एवं औषधि निर्माण से जुड़े जातकों को इस आरती के प्रभाव से निदान (Diagnosis) और चिकित्सा में दिव्य सफलता प्राप्त होती है।
- भय व तनाव का शमन: मानसिक अवसाद, अनिद्रा, भय और अकाल मृत्यु की आशंका का नाश होकर परम मानसिक शांति प्राप्त होती है।
- गृह में सकारात्मकता: कपूर और गाय के घी से आरती करने से गृह-परिसर के सूक्ष्म रोगाणु नष्ट होते हैं और घर में सुख, शांति तथा लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
भगवान धन्वंतरि की आरती किस दिन विशेष रूप से की जाती है?
भगवान धन्वंतरि की आरती विशेष रूप से कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (धनतेरस / धन्वंतरि जयंती) को की जाती है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक मंगलवार, गुरुवार अथवा प्रतिदिन प्रातः और सायं इस आरती का गान आरोग्य लाभ के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
आरती के समय भगवान धन्वंतरि को किस चीज का भोग लगाना चाहिए?
भगवान धन्वंतरि को पंचामृत, तुलसी दल, पीले फल (जैसे केला, पपीता), खीर, तथा पारंपरिक रूप से औषधीय द्रव्यों जैसे गिलोय, हरड़, आंवला या सूखे मेवे का नैवेद्य अर्पित करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
क्या अस्वस्थ व्यक्ति स्वयं यह आरती कर सकता है?
हां, यदि कोई व्यक्ति अस्वस्थ है और खड़े होकर आरती करने में असमर्थ है, तो वह बिस्तर अथवा आसन पर बैठकर श्रद्धापूर्वक मानसिक आरती कर सकता है अथवा केवल इस आरती का श्रवण कर सकता है। इससे भी समान रूप से हीलिंग ऊर्जा प्राप्त होती है।
भगवान धन्वंतरि के हाथों में कौन-कौन से दिव्य प्रतीक होते हैं?
भगवान धन्वंतरि चतुर्भुज रूप में सुशोभित हैं। उनके ऊपरी दो हाथों में शंख और सुदर्शन चक्र होते हैं, जबकि निचले दो हाथों में अमृत कलश और जोंक (जलौका/औषधि प्रतीक) अथवा कमंडल विद्यमान रहता है, जो रोग निवारण और जीवन रक्षा का प्रतीक है।