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श्री श्री चित्रगुप्त भगवान आरती
29 पाठ

श्री चित्रगुप्त भगवान की विशेष संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन एवं कल्याण शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री चित्रगुप्त भगवान की विशेष संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान श्री चित्रगुप्त इस ब्रह्मांड के सर्वोच्च न्यायधीश भगवान यमराज के प्रधान सहायक और समस्त जीव-जगत के कर्मों का सूक्ष्म लेखा-जोखा (मार्कण्डेय पुराण एवं यमस्मृति के अनुसार) रखने वाले दिव्य अधिष्ठाता हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि यानी भैया दूज के दिन चित्रगुप्त जयंती और कलम-दवाफ पूजन का महापर्व अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। संध्या काल में श्री चित्रगुप्त भगवान की आरती करने से साधक के जीवन के समस्त कर्म-दोष शांत होते हैं, बुद्धि में विवेक और न्यायप्रियता का संचार होता है। इस विस्तृत आरती गाइड में हम जानेंगे चित्रगुप्त आरती के सम्पूर्ण बोल, उनका गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि, आवश्यक सामग्री और जीवन पर पड़ने वाले इसके आध्यात्मिक प्रभावों का सम्पूर्ण विमोचन।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा।
लेखक भाग्य विधाता, कर्मों के ज्ञाता॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

कलम दवाफ धारी, मस्तक पर चन्दन।
तीन लोक के प्राणी, करते हैं वन्दन॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

चित्रगुप्त नाम तुम्हारा, पाप-पुण्य लेखा।
धर्मराज की सेवा में, न्याय सदा देखा॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

मसि पात्र और लेखनी, हाथों में सोहे।
देख रूप तुम्हारा, सुर-मुनि मन मोहे॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

जो जन ध्यान लगावे, मनवांछित फल पावे।
संकट सब मिट जावे, भवसागर तर् जावे॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

अमृत दृष्टि तुम्हारी, भक्तों पर बरसे।
दर्शन पाने को हरि, नित प्रति मन तरसे॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

जय चित्रगुप्त कृपालु, ज्ञान के भंडारी।
भव-भय दूर करो जी, रक्षा करो हमारी॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

आरती जो कोई गावे, प्रेम सहित भारी।
घर में सुख-संपत्ति आवे, मिटे कष्ट सारी॥ ॐ जय चित्रगुप्त देवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री चित्रगुप्त भगवान की यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि मनुष्य के कर्मों की शुद्धता और भगवत न्याय के प्रति समर्पण का महान प्रतीक है। आइए इसके प्रत्येक पद के गूढ़ार्थ को समझें:

प्रथम पद: 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा। लेखक भाग्य विधाता, कर्मों के ज्ञाता॥' - इस प्रथम चरण में भगवान चित्रगुप्त के परमेश्वर स्वरूप को नमन किया गया है। वे समस्त चराचर जगत के प्राणियों के कर्मों के ज्ञाता और उनके भाग्य के प्रत्यक्ष लेखक हैं। उनके होने मात्र से ब्रह्मांड में न्याय व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होती है।

द्वितीय पद: 'कलम दवाफ धारी, मस्तक पर चन्दन। तीन लोक के प्राणी, करते हैं वन्दन॥' - भगवान चित्रगुप्त के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में मसि-पात्र (दवात) धारण करते हैं। उनके मस्तक पर अलौकिक चंदन सुशोभित है, जिनकी वंदना स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल यानी तीनों लोकों के जीव करते हैं।

तृतीय पद: 'चित्रगुप्त नाम तुम्हारा, पाप-पुण्य लेखा। धर्मराज की सेवा में, न्याय सदा देखा॥' - 'चित्र' का अर्थ है गुप्त और 'गुप्त' का अर्थ है जो अदृश्य रूप से सब जानता हो। आपका नाम ही आपके कार्य का परिचय है। आप भगवान धर्मराज के साथ मिलकर जीवों के प्रत्येक शुभ और अशुभ कर्म का निष्पक्ष लेखा-जोखा तैयार करते हैं।

चतुर्थ पद: 'मसि पात्र और लेखनी, हाथों में सोहे। देख रूप तुम्हारा, सुर-मुनि मन मोहे॥' - भगवान के हाथों में सुशोभित लेखनी और दवात भक्तों के हृदय में विस्मय जगाती है। उनके इस शांत, गंभीर और ज्ञानवान स्वरूप को देखकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि और देवता भी मुग्ध हो जाते हैं।

पंचम पद: 'जो जन ध्यान लगावे, मनवांछित फल पावे। संकट सब मिट जावे, भवसागर तर् जावे॥' - जो भी साधक सच्ची श्रद्धा और निष्काम भाव से चित्रगुप्त भगवान का स्मरण व उनकी आरती करता है, उसके सभी भौतिक संकट समाप्त हो जाते हैं और वह अंततः इस भवसागर को पार कर मोक्ष को प्राप्त होता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू सनातन संस्कृति में भगवान श्री चित्रगुप्त को ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से उत्पन्न माना गया है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तब यमराज को जीवों के पाप और पुण्य का हिसाब रखने का कार्य सौंपा गया। यमराज ने निवेदन किया कि इतनी विशाल सृष्टि के करोड़ों-अरबों जीवों के कर्मों का हिसाब रखना अकेले उनके लिए असंभव है। तब भगवान ब्रह्मा जी ने ध्यान लगाया और अपनी काया से एक दिव्य पुरुष को प्रकट किया, जिनके हाथ में स्वर्ण कलम और दवात थी।

उनका प्रकटोत्सव 'कायस्थ कुल' के उत्पत्ति दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। चित्रगुप्त जी महाराज के चित्रगुप्त, चित्रानन, चित्रंगद आदि कई नाम हैं। उनकी आरती करने से मनुष्य के अवचेतन मन में यह भाव जागृत होता है कि उसके प्रत्येक कर्म पर ईश्वर की पैनी नजर है, जिससे वह सदाचार, नैतिकता और परोपकार के मार्ग पर अग्रसर होता है। व्यापारिक संस्थानों, बही-खातों के पूजन (दीपावली के पश्चात) और भैया दूज के दिन इस आरती का विशेष महात्म्य है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

भगवान चित्रगुप्त की संध्या आरती करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना अनिवार्य माना गया है:

  1. समय का चयन: संध्याकाल (प्रदोष काल) या गोधूलि बेला में आरती करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल या अध्ययन कक्ष (जहाँ बही-खाते रखे जाते हैं) को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  3. प्रतिमा या चित्र स्थापना: एक साफ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। साथ ही एक कोरे कागज पर रोदी से 'श्री' या 'चित्रगुप्ताय नमः' लिखकर कलम-दवात रखें।
  4. षोडशोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत, पीले फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  5. आरती का गायन: घी का दीपक प्रज्वलित कर दोनों हाथों से थाल उठाकर श्रद्धापूर्वक 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' आरती का गायन करें। आरती के पश्चात् शंख और घंटी बजाएं।
  6. परिक्रमा एवं पुष्पांजलि: अपनी ही जगह पर खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें और आरती संपूर्ण होने के बाद सभी उपस्थित जनों में प्रसाद वितरित करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

सफलतापूर्वक आरती संपन्न करने के लिए नीचे दी गई सामग्रियों की व्यवस्था पहले ही कर लेनी चाहिए:

  • आरती की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (कम से कम 5 बत्तियों वाला या अखंड दीपक)।
  • कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर (आरती में सकारात्मक ऊर्जा और सुगंध के लिए)।
  • घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और देवताओं के आह्वान के लिए।
  • पुष्प एवं अक्षत: ताजे पीले फूल और साबुत अक्षत (चावल)।
  • लेखन सामग्री: एक नया पेन या कलम, सफेद कोरा कागज और दवात (विशेष रूप से भैया दूज या दीपावली पूजन पर)।
  • नैवेद्य: गुड़, मखाने, फल या घर की बनी शुद्ध मिठाई का भोग।

राग, ताल एवं गायन समय

संगीत शास्त्र के दृष्टिकोण से श्री चित्रगुप्त भगवान की आरती को गंभीर और शांत भाव वाले रागों में गाना फलदायी होता है:

  • राग: राग यमन, राग कल्याण या राग भैरवी के सुरों में इसे आसानी से गाया जा सकता है।
  • ताल: कहरवा ताल (8 मात्राओं की ताल) या तीन ताल (16 मात्राओं की ताल) इस आरती की लय के साथ सटीक बैठती है।
  • गायनांश समय: संध्याकाल का समय (शाम 6:00 बजे से 8:00 बजे के बीच) इस आरती के गायन के लिए सर्वोत्कृष्ट है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से भगवान चित्रगुप्त की संध्या आरती करने से निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • कर्म शुद्धि: व्यक्ति के मन में बुरे कर्मों के प्रति भय और अच्छे कर्मों के प्रति प्रेरणा जागृत होती है।
  • बुद्धि और एकाग्रता: छात्रों, लेखकों, सीए (CA), वकीलों और लेखा-जोखा (Accountants) से जुड़े लोगों की बुद्धि तीव्र होती है और कार्यों में शुद्धता आती है।
  • ऋण मुक्ति और आर्थिक समृद्धि: भगवान चित्रगुप्त की कृपा से घर में बरकत बनी रहती है और आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है।
  • अकाल मृत्यु का भय नाश: यमराज के सहयोगी होने के कारण चित्रगुप्त की आराधना करने वाले भक्तों को अकाल मृत्यु या नरक यातनाओं का भय नहीं रहता।

१. श्री चित्रगुप्त भगवान की विशेष संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री चित्रगुप्त भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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