॥ श्री चित्रगुप्त जी की संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त भगवान, स्वामी जय चित्रगुप्त भगवान: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★धर्म, न्याय, कर्म और लेखा-जोखा के अधिष्ठाता भगवान श्री चित्रगुप्त जी महाराज हिंदू सनातन संस्कृति में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। यमराज के प्रधान सहायक और ब्रह्मांड के समस्त जीवों के कर्मों के निष्पक्ष इतिहासकार के रूप में उनकी आराधना विशेष रूप से यम द्वितीया (भाई दूज), चित्रगुप्त जयंती और दीपावली के पावन पर्व पर की जाती है। श्री चित्रगुप्त जी की संध्या आरती करना भक्तों के लिए अपने दैनिक कर्मों का मूल्यांकन करने और भगवान से क्षमा व मार्गदर्शन प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है। 'ॐ जय चित्रगुप्त भगवान' आरती का प्रत्येक शब्द साधਕ के अंतःकरण को शुद्ध करता है और उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय चित्रगुप्त भगवान, स्वामी जय चित्रगुप्त भगवान।
कलम दवात धरैया, मसि-पात्र सुभान॥ ॐ जय...
नीलकमल सम सुंदर, जामा और जंजीर।
हाथ में लेखनी सोहे, चित्रगुप्त वीर॥ ॐ जय...
ब्रह्मा के तू मानस, अंश जगत के भाई।
धर्मराज के संग में, तू महिमा अधिकाई॥ ॐ जय...
पाप पुन्य का लेखा, तू ही तो रखता है।
न्याय तुम्हारा सच्चा, सब जग यह कहता है॥ ॐ जय...
जो कोई तेरी सेवा, विधि-वत करे निशदिन।
उसके सारे संकट, कट जावें छिन छिन॥ ॐ जय...
मसि-पात्र में मैया, लेखनी की शोभा।
देख रूप सुंदर, मन सब का मोहा॥ ॐ जय...
कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जो व्रत करे नर।
वैकुण्ठ धाम पावे, अंत समय पर॥ ॐ जय...
आरती जो कोई गावे, प्रेम सहित मन में।
पाप कटे सब उसके, भवसागर तरने॥ ॐ जय...
ॐ जय चित्रगुप्त भगवान, स्वामी जय चित्रगुप्त भगवान।
कलम दवात धरैया, मसि-पात्र सुभान॥ ॐ जय...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री चित्रगुप्त जी की इस पावन आरती का प्रत्येक चरण आध्यात्मिक गहराई से ओत-प्रोत है। इसके भावार्थ को समझकर आरती गाने से भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा उत्पन्न होती है:
आरती के आरंभिक चरण में भक्त भगवान चित्रगुप्त की वंदना करते हुए उनके स्वरूप का बखान करता है। हे प्रभु, आपकी जय हो! आप अपने हाथों में कलम, दवात (मसि-पात्र) और बही-खाता धारण करने वाले हैं, जो सृष्टि के समस्त जीवों के कर्मों का निष्पक्ष लेखा-जोखा रखते हैं। आपका यह स्वरूप अत्यंत दिव्य और कल्याणकारी है।
भगवान चित्रगुप्त के शारीरिक सौंदर्य और वस्त्रों का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि हे प्रभु! आपका वर्ण नीलकमल के समान अति सुंदर और कांतिमान है। आपके वस्त्र और आभूषण शोभायमान हैं। आपके एक हाथ में ज्ञान और न्याय की प्रतीक लेखनी (कलम) सुशोभित है, जो आपको अत्यंत वीर और न्यायप्रिय दर्शाती है।
पौराणिक उत्पत्ति का स्मरण कराते हुए आरती में कहा गया है कि हे भगवान चित्रगुप्त! आप ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं और संपूर्ण संसार के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। आप मृत्यु के देवता धर्मराज (यमराज) के साथ मिलकर संपूर्ण ब्रह्मांड में न्याय व्यवस्था का संचालन करते हैं, जिससे आपकी महिमा तीनों लोकों में अपरंपार हो जाती है.
कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए आरती में कहा गया है कि इस संसार में मनुष्य जो कुछ भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसका पूरा लेखा-जोखा केवल आप ही रखते हैं। आपका न्याय पूर्णतः निष्पक्ष, सत्य और अटल है, जिसे पूरा संसार स्वीकार करता है। आपके दरबार में किसी के साथ अन्याय नहीं होता।
आरती के अंत में फलश्रुति का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो भी मनुष्य विधि-विधान और सच्चे मन से आपकी सेवा और संध्या आरती करता है, उसके जीवन के सभी कष्ट और बाधाएं क्षण भर में समाप्त हो जाती हैं। कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भाई दूज) के दिन कलम-दवात की पूजा कर जो इस व्रत को करता है, वह अंत समय में वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन धर्म में श्री चित्रगुप्त जी को कर्मों का महानिरीक्षक माना गया है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और यम संहिता में भगवान चित्रगुप्त की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब सृष्टि की रचना हुई, तब ब्रह्मा जी ने जीवों के पाप और पुण्य के न्याय के लिए भगवान चित्रगुप्त को अपनी काया (शरीर) से प्रकट किया था।
चित्रगुप्त जी यमराज के मुख्य दरबारी हैं और हर मनुष्य के 'चित्रगुप्त' यानी गुप्त कर्मों का रिकॉर्ड 'अग्रसंधान' नामक बही में दर्ज रखते हैं। मनुष्य के जीवन का अंत होने पर इसी बही के आधार पर उसके आत्मा की गति निर्धारित होती है। इसलिए, जीवनकाल में ही अपने कर्मों को सुधारने और चित्रगुप्त भगवान की कृपा पाने के लिए उनकी संध्या आरती का विशेष विधान है। जो व्यक्ति नियमित रूप से इनकी आरती करता है, उसके मन में बुरे कर्मों के प्रति भय और अच्छे कर्मों के प्रति निष्ठा उत्पन्न होती है.
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
संध्या के समय भगवान चित्रगुप्त की आरती करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। इसकी विधिवत प्रक्रिया निम्नलिखित है:
- स्थान की शुद्धि: संध्याकाल में स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा घर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- प्रतिमा स्थापना: चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। साथ ही तांबे या चांदी की कलम और दवात रखें।
- दीप प्रज्ज्वलन: घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं।
- रोली-अक्षत अर्पण: भगवान को रोली, अक्षत, पुष्प और मिठाई का भोग (विशेषकर खीर या पूरी) अर्पित करें। कलम और दवात की भी रोली-चंदन से पूजा करें।
- आरती गान: ताली बजाते हुए और शंख-घंटी की ध्वनि के साथ 'ॐ जय चित्रगुप्त भगवान' आरती का सस्वर गान करें।
- परिक्रमा और प्रणाम: आरती के पश्चात धूप-दीप भगवान को घुमाएं, स्वयं की तीन परिक्रमा करें और क्षमा प्रार्थना के साथ प्रणाम करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
पूजन और आरती को पूर्ण रूप से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- शुद्ध तांबे या पीतल की थाली
- गाय के शुद्ध घी का दीपक (या कपूर की टिकिया)
- रोली, कुमकुम, और अक्षत (बिना टूटे चावल)
- ताज़ा पुष्प और पुष्पमाला
- नैवेद्य (मिठाई, फल या प्रसाद)
- घंटी और शंख (सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए)
- पूजा के लिए एक नई कलम और दवात (विशेषकर चित्रगुप्त जयंती या भाई दूज पर)
राग, ताल एवं गायन समय
श्री चित्रगुप्त जी की यह आरती शांत, गंभीर और भक्ति रस से परिपूर्ण है।
- गाय का समय: संध्याकाल (प्रदोष काल) या गोधूलि बेला में, जब दिन और रात का मिलन होता है। विशेषकर चित्रगुप्त पूजा और भाई दूज के दिन संध्या के समय।
- राग: इसे राग कल्याण, राग यमन या साधारण भक्ति धुनों में गाया जा सकता है।
- ताल: कहवा (८ बीट) या दादरा (६ बीट) ताल पर इसकालयबद्ध गायन अत्यंत मनमोहक होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
भगवान चित्रगुप्त की संध्या आरती करने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- कर्म शुद्धि: व्यक्ति के मन में अच्छे कर्म करने की प्रेरणा जागृत होती है और वह पाप कर्मों से दूर रहता है।
- मानसिक शांति: नियमित आरती करने से अज्ञात भय और तनाव समाप्त होता है।
- विद्या और बुद्धि की प्राप्ति: चूंकि चित्रगुप्त जी कलम और दवात के स्वामी हैं, अतः विद्यार्थियों और लेखकों को इनकी पूजा से बुद्धि, ज्ञान और करियर में सफलता मिलती है।
- यम भय से मुक्ति: जो प्राणी चित्रगुप्त जी की शरण में जाता है, उसे मृत्यु के पश्चात यमराज की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता।