पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री चित्रगुप्त भगवान आरती
31 पाठ

श्री चित्रगुप्त भगवान की पावन संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री चित्रगुप्त भगवान की पावन संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म और पौराणिक परंपराओं में भगवान श्री चित्रगुप्त जी को ब्रह्मांड का सर्वोच्च न्यायधीश, प्राणियों के कर्मों के लेखा-जोखा रखने वाले और धर्मराज यमराज के प्रधान सहायक के रूप में पूजा जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज या चित्रगुप्त जयंती के अवसर पर कलम-दवात और वही-खाते का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। संध्या के समय भगवान चित्रगुप्त की पावन आरती गाने से साधक के समस्त पापों का शमन होता है, बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है और परलोक में उत्तम गति मिलती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आरती गाइड में हम श्री चित्रगुप्त जी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की विधि, आवश्यक सामग्री और आध्यात्मिक लाभ पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा।
लेखक भाग्य विधाता, कर्मों के ज्ञाता॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

धवल शरीर विराजित, मस्तक पर टीका।
सुंदर रूप तुम्हारा, जग से है नीका॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

हाथ में ले मसि-भांडा, कलम और पाती।
लिखत कर्म की लेखा, दिन और राती॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

यमराज के तुम साझी, न्याय करो भारी।
पापी थर-थर कांपें, सुनकर धुन सारी॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

चित्रगुप्त मम स्वामी, संकट हर लेना।
भक्ति अपनी देकर, सतपथ तुम देना॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

जो जन आरती गावे, नितप्रति मन लाई।
सुख-संपत्ति घर आवे, मिटे कष्ट भाई॥
ॐ जय चित्रगुप्त देवा...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री चित्रगुप्त भगवान की यह पावन आरती अत्यंत सरल किंतु गूढ़ दार्शनिक अर्थों से परिपूर्ण है। प्रथम पंक्ति 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' में भक्त भगवान के जयकारे लगाते हुए उनके दिव्य स्वरूप को नमन करता है। उन्हें 'लेखक भाग्य विधाता' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे प्रत्येक जीव के कर्मों को लिपिबद्ध करते हैं और उसी आधार पर उनके भाग्य का निर्धारण होता है।

आरती के अगले चरण में भगवान के भौतिक और दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। 'धवल शरीर विराजित, मस्तक पर टीका' पंक्ति बताती है कि भगवान चित्रगुप्त का शरीर श्वेत (धवल) और पवित्र है, जो निष्पक्षता और सात्विकता का प्रतीक है। उनके हाथ में 'मसि-भांडा' (स्याही का पात्र), कलम और पाती (पत्र) इस बात का प्रतीक है कि वे संसार के प्रत्येक प्राणी के अच्छे और बुरे कर्मों का प्रतिदिन का हिसाब रखते हैं।

भगवान चित्रगुप्त यमराज के मुख्य सहायक और धर्म के महान संरक्षक हैं। 'यमराज के तुम साझी, न्याय करो भारी' पंक्ति दर्शाती है कि मृत्यु के पश्चात जीवों के कर्मों का सत्य निष्पादन इन्ही के द्वारा होता है। अंत में भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे उनके जीवन के समस्त संकटों को दूर करें और उन्हें सन्मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिंदू पुराणों के अनुसार, भगवान श्री चित्रगुप्त की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से हुई थी। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो जीवों के कर्मों के न्याय के लिए एक ऐसे देवता की आवश्यकता महसूस हुई जो निष्पक्ष रूप से पाप और पुण्य का लेखा-जोखा रख सके। ब्रह्मा जी की काया से उत्पन्न होने के कारण इस कुल के वंशज 'कायस्थ' कहलाए।

कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन चित्रगुप्त जयंती मनाई जाती है। इस दिन व्यापारी, लेखक, विद्यार्थी और प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े लोग अपने बही-खातों, लैपटॉप, कलम और पुस्तकों की पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान चित्रगुप्त की संध्या आरती करता है, उसके जीवन में कभी भी अदालती मुकदमों, कर्म बंधनों या अज्ञानता का अंधकार नहीं रहता।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. संध्या काल के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थान या अपने कार्यस्थल पर एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
  3. भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या चित्र स्थापित करें।
  4. लकड़ी की चौकी पर या कागज पर रोली से 'श्रीं' लिखकर कलम और दवात (मसि-पात्र) रखें।
  5. भगवान को धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।
  6. घी का दीपक प्रज्वलित करें और दोनों हाथों में पुष्प लेकर ध्यान करें।
  7. पूरी श्रद्धा और लय के साथ 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' आरती का गान करें।
  8. आरती के पश्चात भगवान को प्रणाम कर अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

  • चांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ आरती की थाली
  • शुद्ध घी का दीपक (या कपूर की टिकिया)
  • रोली, मौली, अक्षत और ताजे पुष्प
  • नैवेद्य के लिए मिष्ठान या फल
  • घंटी और शंख (वाद्य यंत्र जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाते हैं)
  • कलम, दवात और सफेद कोरा कागज (पूजन हेतु)

राग, ताल एवं गायन समय

यह आरती संध्या के गोधूलि बेला में (सायंकालीन पूजा के समय) गाने के लिए अत्यंत उत्तम है। इसे पारंपरिक रूप से 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जाता है, जिससे मन शांत और एकाग्र होता है। ताल कहरवा या तीनताल के माध्यम से इस आरती को सस्वर समूह में या अकेले भी मधुर स्वर में गाया जा सकता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

श्री चित्रगुप्त भगवान की आरती का नियमित पाठ करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • कर्म शुद्धि: व्यक्ति के मन में अच्छे कर्म करने की प्रेरणा जागृत होती है।
  • बुद्धि का विकास: छात्रों और लेखकों के लिए यह आरती स्मरण शक्ति और बौद्धिक क्षमता बढ़ाती है।
  • भय मुक्ति: अकाल मृत्यु, कानूनी अड़चनों और यमराज के भय से मुक्ति मिलती है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में बरकत आती है और धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री चित्रगुप्त भगवान की पावन संध्या आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री चित्रगुप्त भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री चित्रगुप्त भगवान जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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