पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान शिव आरती
8 पाठ

श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / शिवरंजनी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान शिव संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिपति, आदियोगी और त्रैलोक्य के स्वामी हैं। जब उन्हें तीनों लोकों (स्वर्ग, भूलोक, पाताल) के नियंता के रूप में पूजा जाता है, तब उनका अत्यंत दिव्य स्वरूप 'श्री भुवनेश्वर महादेव' के रूप में प्रकट होता है। 'भुवनेश्वर' शब्द का शाब्दिक अर्थ है- 'भुवनों के ईश्वर'। जो इस समस्त सृष्टि, चराचर जगत और ब्रह्मांड की हर एक इकाई के मूल आधार हैं, वे ही भगवान भुवनेश्वर हैं। उनकी आराधना से मनुष्य को न केवल इस लोक के समस्त भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है, बल्कि अंत में मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त होता है। इस विस्तृत पावन मार्गदर्शिका में हम भगवान श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि, आवश्यक सामग्री और इसके अलौकिक आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...॥

डमरू त्रिशूल विराजे, नंदी सवारी साजे।
गले रुद्राक्ष माला, भस्मी अंग विराजे॥ ॐ जय...॥

त्रिभुवन के तुम स्वामी, घट-घट के अंतर्यामी।
दुखियों के दुःख हरता, कृपासिंधु स्वामी॥ ॐ जय...॥

चन्द्रमौली शशि शोभा, ललाट बीच विराजे।
दर्शन कर भक्तजन, भव से तर जावें॥ ॐ जय...॥

गंगा धरत जटा में, पावन जल धारा।
पाप हरण भव भय बिनसनहारा॥ ॐ जय...॥

भोग लगै धतूरे का, भांग और बेलपत्रा।
प्रेम सहित जो ध्यावे, पावे पद नित्यत्रा॥ ॐ जय...॥

जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित ध्यावे।
कहें 'दास' शिवजी का, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री भुवनेश्वर महादेव जी की यह आरती अत्यंत महिमामंडित और गूढ़ अर्थों से परिपूर्ण है। इसके भावार्थ को समझने से भगवान शिव के प्रति हमारी भक्ति और अधिक गाढ़ हो जाती है:

प्रथम पद: 'ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥'
भावार्थ: हे समस्त भुवनों (लोकों) के स्वामी भगवान शिव! आपकी जय हो, आपकी जय हो। आप अपने शरणागत और सच्चे भक्तजनों के जीवन के सभी संकटों और बाधाओं को एक पल में दूर करने वाले हैं। आपकी कृपा से भक्त का समस्त कष्ट समाप्त हो जाता है।

द्वितीय पद: 'डमरू त्रिशूल विराजे, नंदी सवारी साजे। गले रुद्राक्ष माला, भस्मी अंग विराजे॥'
भावार्थ: आपके एक हाथ में ब्रह्मांड की नाद को उत्पन्न करने वाला डमरू और दूसरे हाथ में अधर्म का नाश करने वाला त्रिशूल सुशोभित है। आपके वाहन के रूप में धर्म के प्रतीक नंदी महाराज विराजमान हैं। आपके गले में पवित्र रुद्राक्ष की माला और आपके दिव्य अंगों पर भस्म (विभूति) रमी हुई है, जो इस नश्वर संसार की वास्तविकता का बोध कराती है।

तृतीय पद: 'त्रिभुवन के तुम स्वामी, घट-घट के अंतर्यामी। दुखियों के दुःख हरता, कृपासिंधु स्वामी॥'
भावार्थ: आप तीनों लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। आप हर प्राणी के हृदय में निवास करने वाले और उनके मन की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं। आप दुखियों के सभी दुखों को हरने वाले और करुणा के असीम सागर (कृपासिंधु) हैं।

चतुर्थ पद: 'चन्द्रमौली शशि शोभा, ललाट बीच विराजे। दर्शन कर भक्तजन, भव से तर जावें॥'
भावार्थ: आपके मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है, जिससे आपकी शोभा अलौकिक हो जाती है। आपके ललाट (माथे) पर तीसरी आँख सुशोभित है। आपके इस दिव्य स्वरूप के दर्शन मात्र से ही भक्तजन इस भवसागर (जन्म-मृत्यु के चक्र) से तर जाते हैं।

पंचम पद: 'गंगा धरत जटा में, पावन जल धारा। पाप हरण भव भय बिनसनहारा॥'
भावार्थ: आपने अपनी जटाओं में मोक्षदायिनी मां गंगा के पावन जल को धारण कर रखा है। आप भक्तों के सभी पापों का हरण करने वाले और संसार के समस्त भयों का नाश करने वाले महाबली हैं।

षष्ठ पद: 'भोग लगै धतूरे का, भांग और बेलपत्रा। प्रेम सहित जो ध्यावे, पावे पद नित्यत्रा॥'
भावार्थ: आपको सोने-चांदी के महंगे पकवानों की आवश्यकता नहीं है, आप तो मात्र धतूरे, भांग और पवित्र बेलपत्र के नैवेद्य से ही प्रसन्न हो जाते हैं। जो भक्त आपको पूरी श्रद्धा और प्रेम के साथ याद करता है, वह परम पद और मोक्ष को प्राप्त करता है।

सप्तम पद: 'जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित ध्यावे। कहें 'दास' शिवजी का, मनवांछित फल पावे॥'
भावार्थ: जो भी मनुष्य इस पावन आरती को प्रेम, भाव और एकाग्रता के साथ गाता और सुनता है, भगवान शिव के दास के अनुसार उसे अपने जीवन में सभी मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन संस्कृति में भगवान शिव की पूजा और आरती का अनन्य महत्व है। 'श्री भुवनेश्वर महादेव' का क्षेत्र विशेष रूप से पावन तीर्थस्थलों (जैसे प्राचीन भुवनेश्वर क्षेत्र या ज्योतिर्लिंग स्वरूपों के अंतर्गत) में अत्यंत पूजनीय माना गया है।

  • भवसागर से मुक्ति: भुवनेश्वर महादेव की आरती करने से साधक के संचित कर्मों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • ग्रह बाधा निवारण: भगवान शिव की आराधना से कुंडली के सभी प्रकार के ग्रह दोष, विशेषकर शनि, राहु-केतु और चंद्रमा के बुरे प्रभाव शांत होते हैं।
  • मानसिक शांति: इस आरती का नियमित गान करने से मन को असीम शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. प्रातःकाल एवं प्रदोष काल: भुवनेश्वर महादेव की आरती प्रतिदिन सुबह स्नान करने के पश्चात तथा संध्याकाल (प्रदोष काल) में करनी चाहिए।
  2. शुद्धता का ध्यान: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। स्वयं स्वच्छ वस्त्र धारण करें और आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. शिवलिंग का अभिषेक: आरती से पूर्व भगवान भुवनेश्वर (शिवलिंग) को जल, दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल से स्नान कराएं।
  4. पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा: महादेव को चंदन लगाएं, अक्षत (अखंड चावल) चढ़ाएं, श्वेत या लाल फूल अर्पित करें, और धूप-दीप दिखाएं।
  5. आरती का क्रम: घी या कपूर का दीपक प्रज्वलित करें। थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम सात बार भगवान के चारों ओर घुमाएं। पहले चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार और मुख मंडल पर 1 बार घुमाते हुए कुल सात बार आरती करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

सफलतापूर्वक और विधि-विधान से आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:

  • थाल: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (अथवा कर्पूर आरती के लिए कपूर)।
  • अग्नि पात्र: धूप और दीप जलाने के लिए।
  • घंटी एवं शंख: आरती के दौरान सकारात्मक ऊर्जा के संचार और नकारात्मकता को दूर भगाने के लिए शंखनाद और घंटी वादन।
  • पुष्प एवं अक्षत: भगवान पर अर्पित करने के लिए ताजे फूल और अक्षत।
  • नैवेद्य: भोग के लिए फल, मिष्ठान, धतूरा, बेलपत्र और भांग।

राग, ताल एवं गायन समय

भगवान भुवनेश्वर महादेव की यह आरती भगवान शिव के शांत, गंभीर और रौद्र दोनों रूपों का समन्वय प्रस्तुत करती है।

  • उपयुक्त राग: इसे 'राग कल्याण', 'राग यमन' या 'शिवरंजनी' राग में गाना अत्यंत आनंददायक और ऊर्जावान होता है।
  • ताल: कहहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल में इसका लयबद्ध गायन सरलता से किया जा सकता है।
  • सर्वोत्तम समय: प्रदोष काल (संध्या के समय) या सोमवार के दिन विशेष रूप से इसका गान करना फलदायी होता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती करने से साधक के जीवन में चमत्कारी बदलाव आते हैं:

  • घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।
  • अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है। भगवान शिव अपने भक्त की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं।
  • पारिवारिक कलह समाप्त होती है और आपसी प्रेम एवं सौहार्द बढ़ता है।
  • विद्यार्थियों को बुद्धि, ज्ञान और एकाग्रता की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री भुवनेश्वर महादेव जी की पावन आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान शिव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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