॥ श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भुवन अर्थात समस्त ब्रह्मांड के ईश्वर और अधिपति भगवान शिव के त्रैलोक्य रूप को समर्पित श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती (Shri Bhuvaneshwar Mahadev Ji ki Aarti) सनातन धर्म में अत्यंत महिमामान और फलदायी मानी गई है। 'भुवन' का अर्थ लोक या पृथ्वी और 'ईश्वर' का अर्थ स्वामी होता है, अतः संपूर्ण चराचर जगत, त्रैलोक्य और ब्रह्मांड के पालक व संहारक भगवान शिव ही 'भुवन+ईश्वर' यानी 'भुवनेश्वर' हैं। जिस प्रकार काशी में बाबा विश्वनाथ विराजते हैं, उसी प्रकार ओडिशा की ऐतिहासिक पवित्र भूमि भुवनेश्वर में स्वयंभू रूप में प्रकट होकर भोलेनाथ संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन कर रहे हैं। भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर जब कोई साधक इस अलौकिक आरती का गान करता है, तो उसके जीवन के समस्त ताप, संताप और भव-बंधन स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं। Bhaktilok.in के इस पावन अंक में आइए भगवान भुवनेश्वर महादेव की इस दिव्य आरती, इसके गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि और आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करें।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...॥
धरा और गगन के तुम हो रखवारे, तीनों लोक के स्वामी तुम जगत के प्यारे।
चरणों में तेरे झुकते सुर-मुनि और देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
गल मुण्डमाल विराजे, सोहे भुजंगा, डमरू की धुन बाजे, नाचे त्रिभंगा।
भस्म रमे तन पर, शिव भोले देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
मस्तक पै चंदा साजे, गंगा की धारा, पापियों को तारे जो, है जग से न्यारा।
महिमा तुम्हारी गावे सारा भुवन देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
जो जन तेरे द्वार पर आते हैं शीश झुकाते, मन वांछित फल पाते, दुःख दूर भगाते।
दया करो करुणाकर, हे भोले देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
तुम हो सृष्टिकर्ता, तुम ही हो संहर्ता, भक्तों के संकट को पल में हो हरता।
तेरी शरण में आया, राखो मेरी लज्जा देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
आरती जो कोई गावे, ध्यावे मन लाके, सुख-संपत्ति घर पावे, भव से तर जावे।
चरण शरण में रख लो, हे भुवनेश्वर देवा॥ ॐ जय भुवनेश्वर देवा...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा...
हे संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी भुवनेश्वर देवा! आपकी जय हो, आपकी जय हो। आप अपने शरणागत भक्तजनों के समस्त दुखों और संकटों को क्षणमात्र में दूर कर देते हैं। आपके स्मरण मात्र से ही भक्तों के कष्टों का निवारण हो जाता है।
धरा और गगन के तुम हो रखवारे...
इस पृथ्वी से लेकर आकाश और पाताल तक, तीनों लोकों के आप ही एकमात्र रक्षक और पालनहार हैं। हे जगत के प्रिय स्वामी! आपके चरणों में देवता, ऋषि-मुनि और ज्ञानीजन भी श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होते हैं।
गल मुण्डमाल विराजे, सोहे भुजंगा...
आपके गले में नरमुंडों की माला सुशोभित है और आपके अंगों पर दिव्य सर्प (भुजंग) लिपटे हुए हैं। आपके हाथों में डमरू बजता है और त्रिभंग मुद्रा में आपका यह अद्भुत नृत्य ब्रह्मांड में ऊर्जा का संचार करता है। आपके शरीर पर भस्म रमी हुई है, हे भोलेनाथ! आपका यह रूप अति कल्याणकारी है।
मस्तक पै चंदा साजे, गंगा की धारा...
आपके मस्तक पर चंद्रकला शोभायमान है और आपकी जटाओं से मां गंगा की पावन धारा प्रवाहित होती है। आप पापी से पापी प्राणियों का भी उद्धार करने वाले हैं और इस संपूर्ण सृष्टि से अलौकिक व अनूठे हैं। आपकी महिमा का गान पूरा भुवन (संसार) करता है।
जो जन तेरे द्वार पर आते हैं शीश झुकाते...
जो भी मनुष्य सच्चे हृदय से आपके दरबार में आता है और श्रद्धा से अपना शीश झुकाता है, वह अपने मन की इच्छा के अनुसार वांछित फल प्राप्त करता है और उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं। हे करुणा के सागर भोले देवा! हम पर अपनी असीम दया बनाए रखें।
तुम हो सृष्टिकर्ता, तुम ही हो संहर्ता...
हे प्रभु! इस संसार की रचना करने वाले आप ही हैं और आवश्यकता पड़ने पर इसका संहार (विलीन) करने वाले भी आप ही हैं। आप अपने भक्तों के हर संकट को पलक झपकते ही हर लेते हैं। मैं आपकी शरण में आया हूँ, हे देव! मेरी लाज और मर्यादा की रक्षा कीजिए।
आरती जो कोई गावे, ध्यावे मन लाके...
जो भी साधक या भक्त एकाग्र मन से इस पावन आरती का गान और ध्यान करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और वह इस भवसागर (जन्म-ममृत्यु के चक्र) से तर जाता है। हे भुवनेश्वर देवा! मुझे अपने श्रीचरणों की शरण प्रदान करें।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों की उपासना का अनंत महत्व है। 'भुवनेश्वर' नाम अपने आप में इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव केवल एक स्थान विशेष के देवता नहीं हैं, बल्कि वे संपूर्ण ब्रह्मांड (भुवन) के ईश्वर हैं। पुराणों के अनुसार, भुवनेश्वर क्षेत्र को 'त्रिभुवन क्षेत्र' या 'एकाम्र क्षेत्र' भी कहा जाता है, जहाँ साक्षात महादेव का निवास माना गया है।
इस आरती का पाठ करने से साधक को महाशिवरात्रि, सावन मास और प्रदोष व्रत के समान ही पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। यह आरती न केवल मानसिक शांति प्रदान करती है, बल्कि साधक के भीतर छिपे अहंकार, भय और नकारात्मकता को भी भस्म कर देती है। भगवान भुवनेश्वर की आरती का नियमित गान करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का प्रवाह बढ़ता है और पितृ दोष, ग्रह बाधा तथा अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
किसी भी देवी-देवता की आरती का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे शास्त्रीय नियमों और विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाए। श्री भुवनेश्वर महादेव की आरती के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन करना चाहिए:
- शुद्धता एवं स्नान: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में अथवा संध्या काल में स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, धुले हुए वस्त्र (विशेषकर श्वेत, पीले या लाल) धारण करें।
- मंदिर की स्वच्छता: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। भगवान भुवनेश्वर महादेव (शिवलिंग या शिव प्रतिमा) को स्थापित करें।
- षोडशोपचार या पंचोपचार पूजन: महादेव को जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से स्नान कराएं। तत्पश्चात चंदन, अक्षत (अखंड चावल), बेलपत्र, धतूरा, आ आक के फूल, भस्म और जनेऊ अर्पित करें।
- धूप-दीप प्रज्वलन: भगवान के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- आरती गान: हाथ में कपूर या घी का दीपक और घंटी लेकर पूरी श्रद्धा, लय और ताल के साथ 'ॐ जय भुवनेश्वर देवा' आरती का सस्वर गान करें।
- परिक्रमा एवं प्रदक्षिणा: आरती पूर्ण होने के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार clockwise परिक्रमा करें और भगवान को आरती समर्पित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
भगवान भुवनेश्वर महादेव की आरती को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:
- आरती की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीप प्रज्वलन हेतु: शुद्ध गाय का घी, रुई की बत्ती, और कपूर की टिकिया।
- ध्वनि यंत्र: घंटी (घंटा) और शंख (आरती के दौरान सकारात्मक ध्वनि ऊर्जा के लिए)।
- पुष्प एवं अक्षत: ताजे फूल, बेलपत्र और बिना टूटे हुए चावल (अक्षत)।
- भोग सामग्री: महादेव को अर्पित करने के लिए फल, मिष्ठान्न या ठंडाई/पंचामृत।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण अथवा राग भैरवी में गाना अत्यंत आनंददायी और प्रभावशाली माना जाता है। इसकी लय कहरवा या दादरा ताल (मध्यलय) में होनी चाहिए ताकि सभी भक्त आसानी से इसमें सम्मिलित हो सकें।
गायन का समय: इस आरती को प्रतिदिन संध्या काल (प्रदोष काल) के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है। इसके अतिरिक्त सोमवार के दिन, सावन मास में, महाशिवरात्रि के पर्व पर तथा प्रत्येक चतुर्दशी तिथि को विशेष रूप से इस आरती का गान करने से देवाधिदेव महादेव अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती करने वाले साधक के जीवन में चमत्कारी बदलाव देखने को मिलते हैं:
- मानसिक शांति व स्थिरता: मन का भटकाव और अज्ञात भय दूर होता है, जिससे मानसिक एकाग्रता में वृद्धि होती है।
- रोग मुक्ति एवं आरोग्यता: महादेव के महामृत्युंजय स्वरूप का स्मरण होने से दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
- कष्टों का निवारण: जीवन में आने वाली आर्थिक तंगी, कर्ज और पारिवारिक कलह का नाश होता है।
- मोक्ष प्राप्ति: अंत समय में शिवलोक (कैलाश) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री भुवनेश्वर महादेव जी की आरती कब करनी चाहिए?
यह आरती प्रतिदिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में या पूजा के अंत में करनी चाहिए। विशेष रूप से सोमवार और सावन मास में इसका गान अति फलदायी है।
क्या इस आरती को घर पर किया जा सकता है?
हाँ, आप अपने घर के मंदिर में शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर के समक्ष इस आरती को पूरी विधि-विधान से गा सकते हैं।
भुवनेश्वर महादेव कौन हैं?
भगवान शिव ही संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी होने के कारण 'भुवनेश्वर' कहलाते हैं। ओडिशा के भुवनेश्वर शहर में इनका प्रसिद्ध स्वयंभू लिंग विराजमान है।
आरती के समय शंख बजाना क्यों आवश्यक है?
शंख की ध्वनि से वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और सकारात्मक तथा दिव्य स्पंदन उत्पन्न होते हैं, जो भगवान को अतिप्रिय हैं।