॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं - संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान श्री कृष्ण के त्रिभंगिमा रूप में सुसज्जित, वृंदावन के प्राणधन श्री बांके बिहारी लाल की यह परम पावन आरती 'श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं' भक्तों के हृदय में भक्ति रस का संचार करने वाली सर्वोपरि स्तुति है। इस आरती का गान करने मात्र से मन के समस्त कलुष धुल जाते हैं और साधक को सीधे लटकन वाले कुंडल और मोरमुकुट धारी बांके बिहारी के चरणों की अलौकिक शरण प्राप्त होती है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस दिव्य आरती के मूल बोल, गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि और इसके अलौकिक आध्यात्मिक प्रभावों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
आरती गाऊं प्यारे बिहारी जी को रिझाऊं।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥
चरण कमल में बंधन सोहे,
दर्शन करत पाप मन मोहे।
धनुष बाण नहीं हाथ तुम्हारे,
मोर मुकुट सिर शीश संवारे॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥
दास अनन्य तुम्हारे द्वार, खड़े हैं जोड़ कर कर जोरे,
कृपा दृष्टि कर दो भगवान, तुम बिन कौन हमारा हो रे।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥
कनक कटोरे कपूर बाती,
आरती करत मिटे सब पाती।
गावत बांके बिहारी की बानी,
सुख संपत्ति पावे जग प्राणी॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री बांके बिहारी जी की इस परम कल्याणकारी आरती की हर एक पंक्ति में अगाध भक्ति और समर्पण का सागर छिपा है। इसके भावार्थ को समझकर आरती गाने से भगवान के प्रति प्रेम और गाढ़ा हो जाता है:
प्रथम चरण का भावार्थ
'श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, आरती गाऊं प्यारे बिहारी जी को रिझाऊं।'
यहाँ भक्त अपने आराध्य के चरणों में समर्पित होकर कहता है कि हे बांके बिहारी! मैं आपकी इस दिव्य आरती का गान करता हूँ। इस आरती के माध्यम से मेरा एकमात्र उद्देश्य मेरे प्यारे बिहारी लाल को प्रसन्न करना और उनकी कृपा प्राप्त करना है।
द्वितीय चरण का भावार्थ
'चरण कमल में बंधन सोहे, दर्शन करत पाप मन मोहे। धनुष बाण नहीं हाथ तुम्हारे, मोर मुकुट सिर शीश संवारे।'
इस पंक्ति में प्रभु के सौम्य और अद्वितीय स्वरूप का वर्णन किया गया है। भगवान श्री कृष्ण का यह बांके बिहारी रूप युद्ध के शस्त्रों से सुसज्जित नहीं है, बल्कि उनके सिर पर सुंदर मोरमुकुट और त्रिभंग मुद्रा उनके प्रेम स्वरूप को दर्शाती है। उनके चरण कमलों का दर्शन मात्र मनुष्य के जन्म-जन्म के पापों को नष्ट कर देता है और मन को पूरी तरह से मोह लेता है।
तृतीय चरण का भावार्थ
'दास अनन्य तुम्हारे द्वार, खड़े हैं जोड़ कर कर जोरे, कृपा दृष्टि कर दो भगवान, तुम बिन कौन हमारा हो रे।'
भक्त अपनी दीनता और प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम का भाव प्रकट करते हुए कहता है कि हे प्रभु! हम आपके अनन्य दास आपके द्वार पर हाथ जोड़कर खड़े हैं। इस संसार में आपके सिवा हमारा और कोई नहीं है। अपनी एक बूंद कृपा दृष्टि हम पर भी डाल दीजिए।
चतुर्थ चरण का भावार्थ
'कनक कटोरे कपूर बाती, आरती करत मिटे सब पाती। गावत बांके बिहारी की बानी, सुख संपत्ति पावे जग प्राणी।'
सोने के कटोरे में कपूर की बाती जलाकर जब भक्त भगवान की आरती उतारता है, तो उसके जीवन के सभी कष्ट और पाप (पाती) समाप्त हो जाते हैं। इस आरती का गान करने वाले प्राणी को इस संसार में असीम सुख, शांति और परम आध्यात्मिक संपत्ति की प्राप्ति होती है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिरों में से एक है। यहाँ भगवान कृष्ण बाल्यावस्था और किशोर अवस्था के संधिकाल के रूप में त्रिभंग मुद्रा में विराजमान हैं। मान्यता है कि बांके बिहारी जी अपने भक्तों के साथ अत्यंत आत्मीय संबंध रखते हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वामी हरिदास जी ने अपनी अनन्य साधना और संगीत से वृंदावन की निधिवन स्थली में बांके बिहारी जी के विग्रह को प्रकट किया था। स्वामी हरिदास जी का यह लाड़ला स्वरूप इतना सजीव है कि यहाँ पर्दा डालने और हटाने की अनूठी परंपरा है। पल-पल दर्शन देने वाले बिहारी जी की आरती उतारने का विशेष महत्व है क्योंकि इस आरती से भगवान की योगमाया और वृंदावन की निकुंज लीलाओं का साक्षात अनुभव होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
श्री बांके बिहारी जी की आरती करने के कुछ निश्चित और पवित्र नियम हैं, जिनका पालन करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- शुचिता और स्नान: प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। लाल या पीले वस्त्र पहनना इस पूजा में अत्यंत शुभ माना जाता है।
- वेदी की स्थापना: मंदिर या घर के पूजा गृह में बांके बिहारी जी की मूर्ति या चित्र को लाल आसन पर स्थापित करें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन: आरती से पूर्व भगवान को जल, रोष, अक्षत, पुष्प, धूप और नैवेद्य (मक्खन-मिश्री) अर्पित करें।
- आरती का क्रम: आरती की थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कुल सात बार घुमाना चाहिए। पहले चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार और मुख मंडल पर 1 बार, तथा अंत में पूरे शरीर पर 7 बार आरती घुमाई जाती है।
- शंख और घंटी नाद: आरती के दौरान शंख, घंटी और मंजीरे का मधुर नाद होना चाहिए जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और फलदायी आरती के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- आरती की थाल: चांदी, तांबे या पीतल की स्वच्छ थाल।
- दीपक और कपूर: शुद्ध घी का दीपक (रुई की बत्ती के साथ) और कपूर की टिकिया।
- घंटी और शंख: ध्वनि शुद्धिकरण के लिए पीतल की घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।
- पुष्प और अक्षत: ताजे फूल (विशेषकर गेंदा या गुलाब) और बिना टूटे हुए चावल।
- भोग सामग्री: बांके बिहारी जी को अति प्रिय माखन-मिश्री, पेड़ा या तुलसी दल सहित चरणामृत।
राग, ताल एवं गायन समय
श्री बांके बिहारी जी संगीत के प्रणेता स्वामी हरिदास के इष्ट हैं, इसलिए इस आरती का गायन शास्त्रीय धुनों पर करना बेहद आनंददायक होता है:
- उचित राग: राग कल्याण, यमन या खमाज में इस आरती का गायन करने से विशेष रस उत्पन्न होता है।
- ताल: तीन ताल या कहहरवा ताल (धीमी और मधुर लय में)।
- गायन समय: संध्या आरती (संध्याकाल जब सूर्य अस्त हो रहा हो) और शयन आरती से पूर्व इसका गायन सर्वोच्च फलदायी माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री बांके बिहारी की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मन की शांति: चंचल मन एकाग्र होने लगता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
- भक्ति भाव की वृद्धि: हृदय में भगवान कृष्ण और राधारानी के प्रति अनन्य प्रेम जागृत होता है।
- पापों का क्षय: जन्म-जन्मांतर के कर्म बंधन और पाप नष्ट होते हैं।
- पारिवारिक सुख-समृद्धि: घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहती है।