॥ श्री बांके बिहारी जी की पावन सायं कालीन आरती - जय श्री बांके बिहारी, तेरी आरती गाऊं: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★ब्रज भूमि के पावन कण-कण में रमे, भक्तों के प्राणधन और निकुंज बिहारी श्री बांके बिहारी लाल की सायं कालीन आरती का सनातन धर्म में अद्वितीय एवं सर्वोच्च स्थान है। जब संध्या के समय वृंदावन के पुनीत धाम में बांके बिहारी मंदिर के पट खुलते हैं और 'जय श्री बांके बिहारी, तेरी आरती गाऊं' के दिव्य स्वर गूंजते हैं, तो संपूर्ण ब्रह्मांड का वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का एक भजन नहीं है, बल्कि यह साक्षात परब्रह्म श्री कृष्ण और राधा रानी के संयुक्त प्रेम, युगल स्वरूप और निकुंज लीला का जीवंत दर्शन है। भुवनसुंदर त्रिभंग मुद्रा में खड़े हमारे ठाकुर जी के चरणों में समर्पित यह आरती भक्त के हृदय के समस्त अंधकार को मिटाकर ज्ञान और प्रेम का प्रकाश भर देती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
जय श्री बांके बिहारी, तेरी आरती गाऊं। आरती गाऊं प्यारे, चरणों को ध्याऊं॥ जय श्री बांके बिहारी...॥
शीश मुकुट कर काछनी, मुरली उर माला। चरणों में नूपुर बजे, दरस भयो भाला॥ जय श्री बांके बिहारी...॥
कौंध रही दामिनी सी, छवि अति सुखकारी। मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, छवि बलिहारी॥ जय श्री बांके बिहारी...॥
दास मनो रथ पूरन कर दो, चरणों की सेवा। श्री हरिदास के स्वामी, तुम ही हो देवा॥ जय श्री बांके बिहारी...॥
चरण कमल की जो कोई पूजा, भव से तर जावे। चरणन की बलिहारी बांके, दर्शन फल पावे॥ जय श्री बांके बिहारी, तेरी आरती गाऊं। आरती गाऊं प्यारे, चरणों को ध्याऊं॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री बांके बिहारी लाल की इस अमर आरती की हर एक पंक्ति में अगाध भक्ति और अद्वैत दर्शन छिपा हुआ है। भावार्थ के माध्यम से हम इसके मर्म को समझ सकते हैं:
'जय श्री बांके बिहारी, तेरी आरती गाऊं। आरती गाऊं प्यारे, चरणों को ध्याऊं॥'
इसका अर्थ है कि हे मेरे आराध्य, त्रिकालदर्शी एवं त्रिभंग मुद्रा में खड़े श्री बांके बिहारी! मैं आपकी जयकार करते हुए आपकी पावन आरती गा रहा हूं। हे प्रियतम! आरती गाते-गाते मेरा चित्त आपके कमल चरणों के ध्यान में पूरी तरह से मग्न हो चुका है।
'शीश मुकुट कर काछनी, मुरली उर माला। चरणों में नूपुर बजे, दरस भयो भाला॥'
इस पंक्ति में भगवान के अलौकिक श्रृंगार का वर्णन है। उनके मस्तक पर सुंदर मोर मुकुट सुशोभित है, कमर में पीतांबर और काछनी है, वक्षस्थल पर सुंदर वैजयंती माला और मुरली विराजमान है। उनके चरणों में बंधे हुए नूपुर (घुंघरू) जब बजते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे संपूर्ण ब्रज में आनंद की लहर दौड़ गई हो और उनके इस दुर्लभ दर्शन से जीवन धन्य हो गया है।
'कौंध रही दामिनी सी, छवि अति सुखकारी। मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, छवि बलिहारी॥'
बांके बिहारी जी का साँवला सलोना रूप बादलों में चमकती हुई बिजली (दामिनी) के समान अत्यंत देदीप्यमान और सुखकारी है। उनके कानों में पड़े हुए मकराकृत (मगरमच्छ के आकार के) कुण्डल उनके गालों को चूमते हैं, जिन पर मैं और मेरा सर्वस्व न्योछावर (बलिहारी) है।
'दास मनो रथ पूरन कर दो, चरणों की सेवा। श्री हरिदास के स्वामी, तुम ही हो देवा॥'
यहाँ स्वामी हरिदास जी के आराध्य के रूप में बिहारी जी को संबोधित किया गया है। भक्त प्रार्थना करता है कि हे स्वामी! इस अकिंचन दास के सभी मनोरथ पूर्ण कर दीजिए और अपने नित्य चरणों की सेवा प्रदान कीजिए। आप ही हमारे सर्वोपरि देव हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
वृंदावन के निधिवन और बांके बिहारी मंदिर का इतिहास संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी से जुड़ा हुआ है। स्वामी हरिदास जी ने अपनी अनन्य साधना और संगीत से श्री बांके बिहारी को प्रकट किया था। बांके बिहारी जी की यह सायं कालीन आरती भक्त और भगवान के बीच के आत्मीय संबंधों को प्रगाढ़ करती है। ऐसी मान्यता है कि बांके बिहारी जी अत्यंत नटखट और संवेदनशील हैं, वे अपने भक्तों की अत्यधिक देर तक टकटकी लगाकर देखने पर भाव-विभोर होकर उनके साथ ही चल देते हैं। इसलिए बांके बिहारी मंदिर में पर्दा डालने और हटाने की अनूठी परंपरा है। इस आरती को संध्या के समय करने से मानसिक शांति, नकारात्मक ऊर्जा का नाश और पारिवारिक सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- शुद्धता एवं समय: सायं काल गोधूलि बेला में (जब सूर्य छिप रहा हो और रात हो रही हो) यह आरती करना सबसे उत्तम माना जाता है। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- स्थान का चयन: अपने घर के मंदिर या ईशान कोण में श्री बांके बिहारी जी की मूर्ति या चित्र को स्थापित करें।
- आसन: ऊनी या कुश के आसन पर बैठकर ही पूजा और आरती का आरंभ करें।
- प्रज्वलन: सबसे पहले घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित करें। धूपबत्ती जलाएं।
- आरती का क्रम: दीपक को भगवान के चरणों की ओर चार बार, नाभि की ओर दो बार और मुख मंडल की ओर तीन बार घुमाते हुए कुल सात बार आचमन करें। इसके बाद शंख और घंटी बजाते हुए समवेत स्वर में आरती गाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
श्री बांके बिहारी जी की आरती को विधिवत संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना आवश्यक है:
- स्वच्छ तांबे या चांदी की थाली (पुजा थाल)।
- शुद्ध गाय के घी का दीपक (पंचमुखी या एकमुखी)।
- कपूर आरती के लिए शुद्ध कपूर।
- धूपबत्ती और अगरबत्ती।
- ताजे फूलों की माला (विशेषकर तुलसी दल और पीले गेंदे के फूल)।
- नैवेद्य के रूप में मिश्री-माखन या ताजे फल।
- पूजा की घंटी (घंटा) और शंख।
- जल से भरा आचमनी कलश।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत की दृष्टि से श्री बांके बिहारी जी की यह आरती राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाई जाती है। इसकी चाल विलंबित से मध्यलय की होती है, जो चित्त को एकाग्र करने में सहायक है। सायं काल के ५:०० बजे से ७:०० बजे के बीच का समय इस आरती के गायन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
प्रतिदिन नियमपूर्वक श्री बांके बिहारी जी की सायं कालीन आरती करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मन की चंचलता समाप्त होती है और भगवान के चरणों में गाढ़ी भक्ति उत्पन्न होती है।
- घर-परिवार में कलह-क्लेश समाप्त होकर सुख, शांति और वैभव का वास होता है।
- अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है, तथा संकटों के समय ठाकुर जी स्वयं रक्षा के लिए आते हैं।
- मृत्यु के पश्चात भगवान के निकुंज धाम में स्थान प्राप्त होता है।