पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान बद्रीनाथ आरती
5 पाठ

श्री बद्रीनाथ जी की संध्या आरती - ॐ जय बद्री भगवान, स्वामी जय बद्री भगवान (संध्या विशेष)

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री बद्रीनाथ जी की संध्या आरती - ॐ जय बद्री भगवान, स्वामी जय बद्री भगवान (संध्या विशेष) ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

उत्तराखंड के महाहिमालय की गोद में, अलकनंदा के तट पर स्थित श्री बद्रीनाथ धाम सनातन धर्म के सर्वोच्च तीर्थों में एक है। यहाँ साक्षात भगवान विष्णु 'नारायण' रूप में तपस्यारत हैं। संध्याकाल में जब नर और नारायण की इस पावन भूमि पर घंटा-घड़ियालों की गूंज के साथ 'ॐ जय बद्री भगवान' की संध्या आरती आरंभ होती है, तो संपूर्ण चराचर जगत भक्ति रस में सराबोर हो जाता है। यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का गान नहीं है, बल्कि यह भौतिक संसार की मोह-माया से परे उस परम चेतना से मिलने का एक दिव्य मार्ग है। भक्तिलok.in के इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम श्री बद्रीनाथ जी की संध्या आरती के मूल बोल, गूढ़ार्थ, शास्त्रीय विधि, महत्व और संपूर्ण फलश्रुति का रसास्वादन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय बद्री भगवान, स्वामी जय बद्री भगवान।
नर-नारायण जोड़े, दर्शन से कल्याण॥ ॐ जय...॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का।<
सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

इंद्रासन हिल बैठा, जब तुम ध्यान किया।
ऋषि-मुनि डर काँपे, भय आसन लिया॥ ॐ जय...॥

खलक बीच तू व्यापक, सब का प्राण पता।<
दीन दयाल दयानिधि, संकट हरता॥ ॐ जय...॥

उत्तराखंड सुशोभित, सुन्दर धाम तेरा।
अलकनंदा तट पावन, महिमा लखि न मेरा॥ ॐ जय...॥

तुम्ही हो सत्य विधाता, तुम हो हितकारी।
पूर्ण करो मन की आशा, दर्शन बलिहारी॥ ॐ जय...॥

जो यह आरती गावे, प्रेम सहित भावे।
कहत 'नंद' स्वामी, बैकुंठ धाम पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री बद्रीनाथ जी की इस दिव्य आरती का एक-एक शब्द भगवान विष्णु के उस स्वरूप का बखान करता है जो भक्तों के उद्धार के लिए निरंतर तत्पर है। आइए इस आरती की हर पंक्ति के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

प्रथम पद: 'ॐ जय बद्री भगवान, स्वामी जय बद्री भगवान। नर-नारायण जोड़े, दर्शन से कल्याण॥'
अर्थ: हे बद्रीनाथ भगवान! आपकी जय हो। आप इस ब्रह्मांड के स्वामी हैं। यहाँ बद्रीकाश्रम में नर और नारायण (अर्जुन और भगवान विष्णु के अंश) की जोड़ी निवास करती है। आपके मात्र दर्शन करने से ही मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप कट जाते हैं और उसका कल्याण हो जाता है।

द्वितीय पद: 'जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥'
अर्थ: जो भी सच्चा भक्त एकाग्रचित्त होकर आपका ध्यान करता है, वह मनवांछित फल प्राप्त करता है। उसके मन के सभी संताप नष्ट हो जाते हैं। उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और शरीर के सभी प्रकार के रोग व कष्ट दूर हो जाते हैं।

तृतीय पद: 'इंद्रासन हिल बैठा, जब तुम ध्यान किया। ऋषि-मुनि डर काँपे, भय आसन लिया॥'
अर्थ: जब आपने इस पावन भूमि पर कठोर तपस्या और ध्यान किया, तो आपकी योग शक्ति और तेज से देवराज इंद्र का सिंहासन भी हिल उठा। आपकी उस अद्भुत योग साधना को देखकर ऋषि-मुनि भी चकित रह गए।

चतुर्थ पद: 'खलक बीच तू व्यापक, सब का प्राण पता। दीन दयाल दयानिधि, संकट हरता॥'
अर्थ: हे प्रभु! आप इस संपूर्ण ब्रह्मांड (खलक) के कण-कण में व्याप्त हैं। आप ही समस्त जीवों के प्राणों के आधार हैं। आप दीनों पर दया करने वाले, दया के सागर और भक्तों के सभी संकटों को हरने वाले हैं।

पंचम पद: 'उत्तराखंड सुशोभित, सुन्दर धाम तेरा। अलकनंदा तट पावन, महिमा लखि न मेरा॥'
अर्थ: आपका यह परम पावन धाम उत्तराखंड की वादियों में अत्यंत सुंदर रूप से सुशोभित है। अलकनंदा नदी आपके चरणों को पखारती है। हे प्रभु! आपकी असीम महिमा का वर्णन करने में मेरी बुद्धि असमर्थ है।

षष्ठ पद: 'तुम्ही हो सत्य विधाता, तुम हो हितकारी। पूर्ण करो मन की आशा, दर्शन बलिहारी॥'
अर्थ: इस सृष्टि के सच्चे विधाता और नियंता आप ही हैं। आप सभी का हित करने वाले हैं। हे बद्रीनाथ! हम आपके दर्शनों पर न्योछावर हैं, कृपया हमारी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करें।

सप्तम पद: 'जो यह आरती गावे, प्रेम सहित भावे। कहत 'नंद' स्वामी, बैकुंठ धाम पावे॥'
अर्थ: जो भी भक्त इस आरती को सच्चे प्रेम, श्रद्धा और भाव के साथ गाता है, उसे अंत में भगवान विष्णु के परमधाम 'बैकुंठ' की प्राप्ति होती है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

बद्रीनाथ धाम चार धामों और पंच बद्री में प्रमुख स्थान रखता है। पुराणों के अनुसार, सतयुग में यह स्थान केवल भगवान नारायण के दर्शन मात्र से ही मुक्ति दे देता था। यहाँ संध्या आरती का विशेष महत्व है क्योंकि संध्या बेला को 'प्रदोष काल' कहा जाता है, जो भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की आराधना के लिए अति उत्तम माना जाता है। बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद होने से पहले और प्रतिदिन संध्या के समय जब रावल (मुख्य पुजारी) जी आरती करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं देवगण आकाश से पुष्प वर्षा कर रहे हैं। इस आरती में भाग लेने या इसे प्रतिदिन घर पर गाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और घर में सकारात्मकता, शांति एवं समृद्धि का संचार होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

संध्या आरती करने के लिए कुछेक नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  • शुद्धता: संध्या स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि स्नान संभव न हो तो हाथ-पैर धोकर आचमन करें।
  • स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
  • दीपक प्रज्वलन: घी या चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। कपूर आरती का भी विशेष महत्व है।
  • क्रम: सबसे पहले गणेश जी, फिर अपने इष्टदेव भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति या चित्र के समक्ष धूप-दीप दिखाएं।
  • आवाहन व घंटी वादन: आरती गाते समय एक हाथ से घंटी बजाएं और दूसरे हाथ से थाल को दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घुमाएं।
  • प्रदक्षिणा: अंत में भगवान की तीन बार परिक्रमा करें और आरती को परिवार के सभी सदस्यों में घुमाकर आशीर्वाद लें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

एक आदर्श संध्या आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना आवश्यक है:

  • पूजा थाल: पीतल, तांबे या चांदी की थाली।
  • दीपक: अखंड ज्योति या कपूर जलाने के लिए कपूर आरती पात्र।
  • घंटी: शुद्ध पीतल या काँसे की घंटी (नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के लिए)।
  • शंख: आरती के आरंभ और समापन पर शंखनाद के लिए।
  • पुष्प और अक्षत: भगवान पर अर्पित करने के लिए ताजे फूल और पीले चावल।
  • चंदन और रोली: तिलक हेतु।
  • भोग: नैवेद्य के रूप में मिष्ठान, फल या सूखे मेवे।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री बद्रीनाथ जी की यह संध्या आरती मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों पर गाई जाती है। इस राग की विशेषता यह है कि यह संध्या काल के समय मन को शांत और एकाग्र करती है। आरती की ताल कहरवा या दादरा होती है, जिसे आसानी से सामान्य जन भी ताल से ताल मिलाकर गा सकते हैं। इसका सही गायन समय सूर्यास्त के ठीक बाद (संध्या बेला / प्रदोष काल) का होता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य प्रति संध्या के समय बद्रीनाथ जी की इस पावन आरती का पाठ या श्रवण करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है।
  • घर में माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की कृपा से सुख, शांति व वैभव बना रहता है।
  • अकाल मृत्यु का भय और शत्रुओं की बाधा समाप्त होती है।
  • कुंडली में ग्रह दोष विशेषकर गुरु और शनि के नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।
  • अंत समय में भगवान बद्रीनाथ के चरणों में स्थान या बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री बद्रीनाथ जी की संध्या आरती - ॐ जय बद्री भगवान, स्वामी जय बद्री भगवान (संध्या विशेष) का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान बद्रीनाथ के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

संबंधित पावन आरतियाँ

समस्त आरतियाँ देखें →

भक्त विचार एवं टिप्पणियां (0)

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। सर्वप्रथम अपने भक्ति विचार साझा करें!

भगवान श्री भगवान बद्रीनाथ जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

श्री भगवान बद्रीनाथ की समस्त आरतियाँ
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!