॥ श्री बद्रीनाथ जी कीआरती - ॐ जय बद्री विशाल, स्वामी जय बद्री विशाल: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★उत्तराखंड की हसीन और पवित्र वादियों में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित भगवान श्री बद्रीनाथ का धाम सनातन धर्म के सर्वोच्च तीर्थों में से एक है। यह स्थान चार धामों और पंच बद्री में प्रमुख है। भगवान विष्णु के इस पावन धाम में प्रतिदिन होने वाली 'श्री बद्रीनाथ जी की आरती' (ॐ जय बद्री विशाल, स्वामी जय बद्री विशाल) का भक्तों के जीवन में अद्वितीय आध्यात्मिक महत्व है। इस आरती का गायन और श्रवण करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय बद्री विशाल, स्वामी जय बद्री विशाल।
धवल सिंहासन शोभित, कैलाशाचल वासी, ॐ जय बद्री विशाल॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का, ॐ जय बद्री विशाल॥
लख कुबेर सह आये, इन्द्रनदि दर्शन को, स्वामी इन्द्रनदि दर्शन को।
ऋषि मुनि तुमको ध्यावें, ऋद्धि सिद्धि पावे, ॐ जय बद्री विशाल॥
उलझन सकल मिटाओ, भव बंधन काटो, स्वामी भव बंधन काटो।
सिंह सिंहासन बैठे, मानहरी जागो, ॐ जय बद्री विशाल॥
काल रूप तुम आये, भक्तन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी।
असुर निकंदन भंजन, सुर मुनि सुखकारी, ॐ जय बद्री विशाल॥
यहाँ अलकनंदा बहती, चरणन को धोती, स्वामी चरणन को धोती।<
तीरथ कोटि फल पावे, दर्शन कर जोती, ॐ जय बद्री विशाल॥
देवर्षि नारद गावत, स्तुति नित करते, स्वामी स्तुति नित करते।
गावत भजन तुम्हारे, भव से वे तरते, ॐ जय बद्री विशाल॥
जो यह आरती गावे, घर सुख अति आवे, स्वामी घर सुख अति आवे।
निश्चय मनवांछित फल, निश्चय नर पावे, ॐ जय बद्री विशाल॥
ॐ जय बद्री विशाल, स्वामी जय बद्री विशाल।
धवल सिंहासन शोभित, कैलाशाचल वासी, ॐ जय बद्री विशाल॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान बद्रीनाथ की यह आरती केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह साक्षात वेदों और पुराणों का सार है। इसके भावार्थ को समझने से भक्त का भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण और अधिक प्रगाढ़ हो जाता है:
प्रथम चरण का अर्थ: 'ॐ जय बद्री विशाल, स्वामी जय बद्री विशाल' - हे भगवान बद्री विशाल, आपकी जय हो। आप इस ब्रह्मांड के स्वामी हैं और श्वेत (धवल) रंग के दिव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। आप कैलास पर्वत के समान पवित्र और अचल स्वरूप वाले हैं।
द्वितीय चरण का अर्थ: 'जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का' - जो भी सच्चा भक्त आपका स्मरण करता है, वह तुरंत मनोवांछित फल प्राप्त करता है। उसके मन के सभी प्रकार के दुःख और संताप नष्ट हो जाते हैं। उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और शरीर के सारे कष्ट मिट जाते हैं.
तृतीय चरण का अर्थ: 'लख कुबेर सह आये, इन्द्रनदि दर्शन को' - आपके दर्शन के लिए यक्षराज कुबेर और राजा इन्द्रद्युम्न सहित अनगिनत देवी-देवता आते हैं। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आपका ध्यान करते हैं और आपसे अष्ट-सिद्धियां एवं नवनिधियां प्राप्त करते हैं।
चतुर्थ चरण का अर्थ: 'उलझन सकल मिटाओ, भव बंधन काटो' - हे प्रभु! हमारे जीवन की समस्त उलझनों को समाप्त कर दीजिए और इस संसार के जन्म-मृत्यु के बंधनों से हमें मुक्त कीजिए। आप सिंह जैसे पराक्रमी और भक्तों के मान की रक्षा करने वाले हैं।
पंचम चरण का अर्थ: 'काल रूप तुम आये, भक्तन हितकारी' - आप अपने भक्तों के कल्याण के लिए साक्षात काल के भी नियंत्रक हैं। आप असुरों का संहार करने वाले और देवताओं तथा ऋषियों को परम सुख प्रदान करने वाले हैं।
षष्ठम चरण का अर्थ: 'यहाँ अलकनंदा बहती, चरणन को धोती' - आपके पावन चरणों को धोने के लिए यहाँ अलकनंदा नदी निरंतर प्रवाहित होती है। आपके इस दिव्य ज्योति स्वरूप का दर्शन करने मात्र से करोड़ों तीर्थों के स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
सप्तम चरण का अर्थ: 'देवर्षि नारद गावत, स्तुति नित करते' - देवर्षि नारद सदा आपकी स्तुति और गुणगान करते हैं। आपके भजनों को गाकर भक्त इस संसार रूपी भवसागर से आसानी से तर जाते हैं।
अष्टम चरण का अर्थ: 'जो यह आरती गावे, घर सुख अति आवे' - जो भी मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के साथ इस आरती का गान करता है, उसके घर में सुख-शांति और ऐश्वर्य का आगमन होता है। उसे निश्चित रूप से अपने सभी मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, बद्रीनाथ धाम को 'बद्रीनारायण' के रूप में जाना जाता है। यहाँ भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रूप में कठोर तपस्या की थी। इस स्थान पर भगवान विष्णु ध्यान की मुद्रा में विराजमान हैं। बद्रीनाथ की यह आरती भगवान के इसी शांत, तपस्वी और कल्याणकारी स्वरूप का बखान करती है।
ऐसी मान्यता है कि बद्रीनाथ धाम में भगवान की संध्या आरती में सम्मिलित होने से मनुष्य के पिछले जन्मों के पाप भी धुल जाते हैं। इस आरती का पाठ करने से विशेष रूप से पितृ दोष, ग्रह बाधा और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। जो लोग शारीरिक रूप से बद्रीनाथ धाम जाने में असमर्थ हैं, वे यदि अपने घर पर ही नियमित रूप से इस आरती का पाठ करें, तो उन्हें प्रत्यक्ष धाम यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है.
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान बद्रीनाथ की आरती करते समय निम्नलिखित नियमों और विधियों का पालन करना चाहिए:
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
- आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- प्रतिमा स्थापना: भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति या तस्वीर के सामने शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- पुष्प और नैवेद्य: भगवान को ताजे फूल, तुलसी दल (विशेष रूप से प्रिय), और सात्विक भोग (मिश्री, फल या पंचामृत) अर्पित करें।
- आरती का क्रम: आरती की थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम चार बार चरणों की ओर, दो बार नाभि की ओर और सात बार संपूर्ण शरीर की ओर घुमाएं।
- शंख और घंटी: आरती के दौरान निरंतर घंटी बजाएं और आरती के अंत में शंखनाद अवश्य करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और फलदायी आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री का होना अनिवार्य है:
- चांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ आरती की थाली।
- शुद्ध गाय के घी का दीपक (या कपूर की टिकिया)।
- रुई की बत्तियां।
- धूपबत्ती और अगरबत्ती।
- ताजे फूलों की माला और खुले पुष्प।
- रोटी, मिश्री या पंचामृत का भोग।
- पूजा की घंटी और पवित्र शंख।
- आचमनी और गंगाजल से भरा पात्र।
राग, ताल एवं गायन समय
श्री बद्रीनाथ जी की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की धुनों में अत्यंत भावपूर्ण ढंग से गाया जाता है। इसकी ताल त्रिताल या कहहरवा होती है जो इसे लयात्मक और मनमोहक बनाती है।
गायन का समय: इस आरती को मुख्य रूप से संध्या काल (प्रदोष काल) में भगवान बद्रीनाथ के कपाट बंद होने से पहले या शयन आरती के समय गाया जाता है। हालांकि, ब्रह्म मुहूर्त और प्रातःकालीन पूजा के समय भी इसका गान अत्यंत लाभकारी माना गया है.
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से बद्रीनाथ आरती का गान और श्रवण करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- आंतरिक शांति: मन का भटकाव दूर होता है और ध्यान केंद्रित करने की शक्ति बढ़ती है।
- भय मुक्ति: अज्ञात भय, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है।
- मोक्ष मार्ग: जीवन के अंत में भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- कुटुंब कल्याण: परिवार में सुख, शांति, प्रेम और आरोग्य का वास होता है।
- कर्म शुद्धि: अनजाने में हुए पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
भगवान बद्रीनाथ की आरती प्रतिदिन किस समय करनी चाहिए?
भगवान बद्रीनाथ की आरती मुख्य रूप से संध्याकाल (सूर्यास्त के समय) और प्रातःकाल करनी चाहिए। बद्रीनाथ धाम में संध्या आरती का समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
क्या घर पर बद्रीनाथ जी की आरती की जा सकती है?
हाँ, यदि आप चार धाम की यात्रा पर नहीं जा पा रहे हैं, तो आप अपने घर के मंदिर में भगवान बद्रीनाथ की तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से यह आरती कर सकते हैं।
बद्रीनाथ आरती के समय तुलसी दल का होना क्यों आवश्यक है?
भगवान विष्णु और उनके स्वरूप बद्रीनाथ को तुलसी अतिप्रिय है। भोग अर्पित करते समय और आरती के दौरान तुलसी का प्रयोग करने से पूजा पूर्ण मानी जाती है।
बद्रीनाथ धाम के कपाट वर्ष में कितने महीने खुले रहते हैं?
बद्रीनाथ धाम के कपाट वर्ष में लगभग 6 महीने (मई से नवंबर तक) खुले रहते हैं और सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बंद कर दिए जाते हैं।