॥ श्री अन्नपूर्णा माता की पावनआरती - जय अन्नपूर्णे मैया, स्वामी जय अन्नपूर्णे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन संस्कृति में अन्न को ब्रह्मस्वरूप माना गया है और अन्न की अधिष्ठात्री देवी जगतजननी माँ अन्नपूर्णा साक्षात् जगतपालक भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं। काशी नगरी की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित माँ अन्नपूर्णा की पावन आरती 'जय अन्नपूर्णे मैया, स्वामी जय अन्नपूर्णे' का गान करने मात्र से घर में कभी भी अन्न-धन के भंडार की कमी नहीं होती। भक्तालोक (Bhaktilok.in) के इस विस्तृत और पावन आरती गाइड में हम माँ अन्नपूर्णा की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गूढ़ भावार्थ, शास्त्रीय पूजा विधि, आवश्यक सामग्री तथा इसके अनंत आध्यात्मिक और भौतिक लाभों की विस्तार से चर्चा करेंगे। यह मार्गदर्शिका प्रत्येक सनातनी साधक के लिए अत्यंत उपयोगी है जो अपने रसोई घर और जीवन में माता की असीम कृपा प्राप्त करना चाहते हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
जय अन्नपूर्णे मैया, स्वामी जय अन्नपूर्णे।
प्रतिदिन सुख देने वाली, संकट को हरने। (जय अन्नपूर्णे...)
नित्यानंद करी माता, पावन विष्णुपद।
निज भक्तन हितकारी, मेटत सब विपद। (जय अन्नपूर्णे...)
चतुरभुज रूप विराजत, सिर पर मुकुट सजै।
झलमल रूप अनूपम, कोटि चंद्र लजै। (जय अन्नपूर्णे...)
घंट बजत डमरू बाजत, शंख धुनि भारी।
आरती करत सकल जन, जग की महतारी। (जय अन्नपूर्णे...)
अन्नदान महादान है, सब विधि सुखकारी।
जेहि पर कृपा तुम्हारी, सो धन्य नर नारी। (जय अन्नपूर्णे...)
माता तुम हो सबकी, पिता तुम मेरे।
आश्रय शरण तुम्हारी, हम बालक तेरे। (जय अन्नपूर्णे...)
जो जन ध्यावहि तुमको, वांछिंत फल पावै।
दुःख दारिद्र सब भागे, सुख संपति आवै। (जय अन्नपूर्णे...)
आरती जन मन रंजन, सुख की खानी है।
जो गावे नर नारी, सुत सुख पानी है। (जय अन्नपूर्णे...)
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माँ अन्नपूर्णा की यह आरती अत्यंत सरल किंतु गहन आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। इसके प्रत्येक चरण में जगत के पालन-पोषण का संदेश छिपा हुआ है:
प्रथम चरण - 'जय अन्नपूर्णे मैया, स्वामी जय अन्नपूर्णे। प्रतिदिन सुख देने वाली, संकट को हरने।' - इस पंक्ति में भक्त माता की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे मैया अन्नपूर्णा! आपकी जय हो। आप भक्तों को प्रतिदिन सांसारिक और आध्यात्मिक सुख प्रदान करती हैं तथा उनके सभी प्रकार के दुखों और संकटों का नाश करती हैं।
द्वितीय चरण - 'नित्यानंद करी माता, पावन विष्णुपद। निज भक्तन हितकारी, मेटत सब विपद।' - माँ अन्नपूर्णा नित्य आनंद प्रदान करने वाली हैं और भगवान विष्णु के चरणों जितनी ही पवित्र हैं। वे अपने सच्चे भक्तों का हमेशा हित सोचती हैं और उनके जीवन की समस्त विपत्तियों को जड़ से समाप्त कर देती हैं।
तृतीय चरण - 'चतुर्भुज रूप विराजत, सिर पर मुकुट सजै। झलमल रूप अनूपम, कोटि चंद्र लजै।' - माता का स्वरूप चतुर्भुज (चार भुजाओं वाला) है। उनके मस्तक पर अत्यंत सुंदर मुकुट सुशोभित होता है। उनका यह अलौकिक और देदीप्यमान सौंदर्य ऐसा है जिसके आगे करोड़ों चंद्रमाओं की चमक भी फीकी पड़ जाती है।
चतुर्थ चरण - 'घंट बजत डमरू बाजत, शंख धुनि भारी। आरती करत सकल जन, जग की महतारी।' - आरती के समय मंदिर या घर में घंटियाँ, डमरू और शंख की मंगल ध्वनि गूंजती है। संपूर्ण संसार की माता (महतारी) कही जाने वाली माँ की आरती सभी जन मिलकर श्रद्धा भाव से करते हैं।
पंचम चरण - 'अन्नदान महादान है, सब विधि सुखकारी। जेहि पर कृपा तुम्हारी, सो धन्य नर नारी।' - सनातन धर्म में अन्नदान को महादान कहा गया है, जो हर प्रकार के सुखों को देने वाला है। जिस भी मनुष्य पर माता आपकी कृपा हो जाती है, वे नर-नारी इस संसार में सबसे अधिक धन्य और भाग्यशाली हो जाते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार काशी नगरी में जब भिक्षाटन के बिना अन्न का संकट उत्पन्न हो गया और समस्त जीव-जंतु भूख से पीड़ित होने लगे, तब जगत के पालनहार भगवान भोलेनाथ ने स्वयं भिक्षुक का रूप धारण किया और माता पार्वती ने 'अन्नपूर्णा' का रूप लेकर सभी को भिक्षा प्रदान की। काशी के अन्नपूर्णा मंदिर में आज भी माता स्वर्ण रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अन्न का आशीर्वाद देती हैं। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति रसोई घर को पवित्र रखकर और माता अन्नपूर्णा का स्मरण करके भोजन ग्रहण करता है, उसके घर में कभी भी अन्न के भंडार खाली नहीं होते। यह आरती माता के इसी महात्म्य का गुणगान करती है और घर में बरकत लाती है.
आरती करने की सही विधि एवं नियम
- स्थान की शुद्धि: आरती हमेशा रसोई घर में, पूजा घर में अथवा अन्नपूर्णा माता के विग्रह के समक्ष करनी चाहिए। स्थान पूरी तरह स्वच्छ होना चाहिए।
- स्नान और वस्त्र: साधक को प्रातःकाल या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या लाल वस्त्र) धारण करने चाहिए।
- दीपक प्रज्वलन: गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। धूप, कुमकुम, अक्षत (अतूट चावल), पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
- आचरण: आरती के दौरान घंटी अवश्य बजाएं और श्रद्धा पूर्वक दोनों हाथों से थाल को घुमाते हुए माता का ध्यान करें। आरती के पश्चात् दोनों हाथों से कपूर की आरती की लौ को अपनी आँखों और मस्तक से लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (मिट्टी का या धातु का)।
- कपूर: शुद्ध camphor (कपूर) आरती को प्रज्वलित करने के लिए।
- घंटी और शंख: सकारात्मक ऊर्जा के संचार और वातावरण को पवित्र करने के लिए।
- पुष्प और अक्षत: माता को अर्पित करने के लिए ताजे फूल और साबुत चावल।
- नैवेद्य: खीर, हलवा, फल या मिष्ठान्न का भोग।
राग, ताल एवं गायन समय
माँ अन्नपूर्णा की यह आरती पारंपरिक लोक धुनों और शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन में अत्यंत मधुरता के साथ गाई जाती है। इसे मध्यलय (तथा ताल दीपचंदी या कहहरवा) में गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल रसोई में प्रवेश करते समय (भोजन बनाने से पूर्व) या प्रदोष काल (संध्या के समय) माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नित्य नियम से माँ अन्नपूर्णा की इस आरती का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
- घर के रसोई घर में माँ अन्नपूर्णा का वास होता है और कभी भी अन्न-धान्य की कमी नहीं होती।
- परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और आपसी प्रेम का विस्तार होता है।
- अतिथि सत्कार की भावना प्रबल होती है क्योंकि 'अतिथि देवो भव:' का वास्तविक अर्थ अन्नपूर्णा की कृपा से ही फलीभूत होता है।
- दरिद्रता और अन्न संकट का नाश होता है।