॥ श्री अन्नपूर्णा माता की आरती - ॐ जय अन्नपूर्णा माता, मैया जय अन्नपूर्णा माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माँ अन्नपूर्णा जगत जननी आदिशक्ति माता पार्वती का ही एक ऐसा स्वरूप हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के समस्त जीवों का भरण-पोषण करती हैं। 'अन्नपूर्णा' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है—'अन्न' जिसका अर्थ भोजन या धान्य है, और 'पूर्णा' जिसका अर्थ परिपूर्ण या प्रचुरता से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि में अकाल और भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हुई थी, तब स्वयं महादेव शिव ने माता पार्वती से भिक्षा मांगकर संसार के जीवों की क्षुधा शांत की थी। काशी (वाराणसी) नगरी को माता अन्नपूर्णा की मुख्य नगरी माना जाता है, जहाँ वे स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान होकर अपने भक्तों को अन्न और ज्ञान दोनों का दान करती हैं। श्री अन्नपूर्णा माता की आरती का नियमित गायन और श्रवण करने से साधक के घर-परिवार में कभी भी अन्न, धन और वैभव की कमी नहीं होती है। रसोई घर को माता अन्नपूर्णा का पवित्र मंदिर माना गया है, और विधि-विधान से की गई आरती से घर की ऊर्जा पवित्र और सकारात्मक बनती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम माँ अन्नपूर्णा की संपूर्ण आरती, उसके गहरे आध्यात्मिक भावार्थ, पूजा की सही विधि, आवश्यक सामग्री, भोग और व्रत के नियमों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय अन्नपूर्णा माता, मैया जय अन्नपूर्णा माता। विश्वप्रपालक कर्त्ता, तुम ही हो ज्ञाता॥ ॐ जय... जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय... हुमेश्वरी तुम माता, जग की हो कन्माता। सेवक नित ध्यावत, आशीष तुम दाता॥ ॐ जय... भुवनेश्वरी माता, तुम ही हो जगदाता। देवी चरण कमल का, बलिहारी जाता॥ ॐ जय... चन्द्रमुखी तुम सुंदर, भव भय भंजनी। आनंद सिन्धु बहावनी, संकट हंजनी॥ ॐ जय... अक्षय कोष तुम्हारा, भरता जग सारा। तुम बिन कौन सके है, पोषण भण्डारा॥ ॐ जय... देवी विविध प्रकार की, भोग लगै प्यारा। संत जन करते हैं, नित पाठ तुम्हारा॥ ॐ जय... धूप दीप फल नैवेद्य, सब ही मन भावे। माता कृपा करो तो, साधक सुख पावे॥ ॐ जय... जो यह आरती गावे, नित प्रति चित्त लाएँ। सो नर सुख संपति, बहुविधि फल पाए॥ ॐ जय...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माँ अन्नपूर्णा की यह आरती अत्यंत सरल होते हुए भी गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है। इसका प्रत्येक शब्द साधक को ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता का पाठ पढ़ाता है:
प्रथम चरण - 'ॐ जय अन्नपूर्णा माता, मैया जय अन्नपूर्णा माता। विश्वप्रपालक कर्त्ता, तुम ही हो ज्ञाता॥' इस पंक्ति का भाव है कि हे माता अन्नपूर्णा! आपकी जय हो। आप इस संपूर्ण विश्व का पालन-पोषण करने वाली हैं और इस सृष्टि के कण-कण की ज्ञाता (सब कुछ जानने वाली) हैं। आपके बिना इस ब्रह्मांड में किसी भी जीव का जीवन संभव नहीं है।
द्वितीय चरण - 'जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥' माता का स्मरण मात्र करने से मनुष्य के सभी मानसिक और शारीरिक कष्ट दूर हो जाते हैं। जो भक्त सच्चे मन से माता का ध्यान करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और उसके घर में सुख, शांति एवं समृद्धि का वास होता है।
तृतीय चरण - 'अक्षय कोष तुम्हारा, भरता जग सारा। तुम बिन कौन सके है, पोषण भण्डारा॥' इस संसार में जितने भी जीव हैं, उन सबका पेट भरने वाला माता का खजाना कभी खाली नहीं होता। माता का अन्न भंडार 'अक्षय' है, यानी वह कभी समाप्त नहीं होता। इस संपूर्ण जगत के पोषण का एकमात्र अधिकार और सामर्थ्य केवल माँ अन्नपूर्णा के पास ही है।
चतुर्थ चरण - 'जो यह आरती गावे, नित प्रति चित्त लाएँ। सो नर सुख संपति, बहुविधि फल पाए॥' जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ प्रतिदिन इस आरती का गान करता है और माता के चरणों में अपना चित्त लगाता है, वह अलौकिक सुख, ऐश्वर्य और विभिन्न प्रकार के भौतिक तथा आध्यात्मिक फलों को प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिन्दू पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर काशी खंड और शिव पुराण में माँ अन्नपूर्णा के अवतरण की अद्भुत कथा का वर्णन मिलता है। एक बार इस संसार में यह मिथ्या भ्रम फैल गया कि चूँकि जगत भौतिक माया (प्रकृति) से संचालित है, इसलिए ज्ञान और अन्न का कोई विशेष मूल्य नहीं है। इस अहंकार से अन्न का अपमान होने लगा। तब माता पार्वती (अन्नपूर्णा) क्रुद्ध होकर अंतर्ध्यान हो गईं। उनके अंतर्ध्यान होते ही पृथ्वी पर सूखा पड़ गया, अन्न के भंडार सूख गए और हाहाकार मच गया। स्वयं महादेव शिव को भी भिक्षा मांगने के लिए पृथ्वी पर आना पड़ा। जब माता पार्वती ने देखा कि उनके बालकों (जीवों) की स्थिति दयनीय हो गई है, तो उनका मातृ हृदय पिघल गया। उन्होंने काशी में प्रकट होकर अन्नपूर्णा रूप में सभी को भिक्षा दी। तब से यह मान्यता स्थापित हुई कि अन्न का कभी अनादर नहीं करना चाहिए।
माँ अन्नपूर्णा की आरती का धार्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह रसोई और भोजन को पवित्र बनाती है। जो ग्रहणी या परिवार भोजन बनाने से पूर्व या पश्चात माता अन्नपूर्णा का स्मरण और आरती करता है, उसके घर में कभी भी अन्न की बरकत कम नहीं होती। यह आरती मनुष्य को अन्न के प्रति कृतज्ञ होना सिखाती है और उसे यह बोध कराती है कि थाली में परोसा जाने वाला प्रत्येक अन्न का दाना माँ का प्रसाद है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
माता अन्नपूर्णा की आरती और पूजा करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
- स्थान की पवित्रता: माता अन्नपूर्णा का वास मुख्य रूप से रसोई घर (किचन) में माना जाता है। अतः रसोई को हमेशा स्वच्छ रखें। विशेष अवसरों जैसे अन्नकूट, दीपावली या मार्गशीर्ष मास में रसोई की उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में माता अन्नपूर्णा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- शुद्धता एवं आचार: स्नान करने के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करके ही रसोई में प्रवेश करें और आरती करें। यदि संभव हो तो भोजन पकाने के उपरांत पहला भोग माता को अर्पित करें।
- दीपक प्रज्वलन: घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूपबत्ती और पुष्प अर्पित करें।
- आरती गान: हाथ में थाल लेकर श्रद्धा भाव से घंटी बजाते हुए लयबद्ध तरीके से आरती गाएं। आरती के उपरांत माता को प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
माता अन्नपूर्णा की आरती को पूर्ण विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:
- शुद्ध घी का दीपक (मिट्टी का दीया या पीतल का दीपक)
- कपूर और प्रज्वलन सलाई
- धूपबत्ती या अगरबत्ती
- रोली, अक्षत (सासाबुत चावल) और कलावा
- ताजे पुष्प या पुष्प माला
- भोग के लिए मिष्ठान, खीर, हलवा या सात्विक भोजन
- पूजा की घंटी और शंख
- जल से भरा हुआ आचमनी या तांबे का लोटा
राग, ताल एवं गायन समय
श्री अन्नपूर्णा माता की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो मन को शांति और सकारात्मकता प्रदान करता है। इसे तीन ताल या कहरवा ताल में गाया जा सकता है। आरती करने का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल रसोई संभालने से पूर्व या संध्याकाल में सूर्यास्त के समय होता है। इसके अलावा, अन्नकूट पर्व (गोवर्धन पूजा) और मार्गशीर्ष पूर्णिमा (अन्नपूर्णा जयंती) के दिन विशेष रूप से इस आरती का गायन सामूहिक रूप से करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
माँ अन्नपूर्णा की आरती का नियमित पाठ करने से जीवन में निम्नलिखित सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:
- घर के भंडार हमेशा भरे रहते हैं और कभी भी अन्न-धन का संकट नहीं आता।
- परिवार में आपसी प्रेम, सद्भाव और संतोष की भावना बढ़ती है।
- भोजन के प्रति सम्मान की भावना जागृत होती है, जिससे पेट और पाचन से जुड़े स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं।
- मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
- अतिथि सत्कार की भारतीय संस्कृति और परंपरा मजबूत होती है, क्योंकि 'अतिथि देवो भव:' का भाव अन्नपूर्णा की कृपा से ही संभव है।