॥ माता तुलसी जी की आरती - जय जय तुलसी माता मैया जय तुलसी माता सब जग की सुख दाता वर दाता ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन हिंदू संस्कृति में वनस्पति जगत को केवल जीविका का साधन नहीं माना गया, बल्कि उन्हें साक्षात देवी-देवताओं का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस पावन परंपरा में 'माता तुलसी' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। तुलसी को भगवान विष्णु की प्रियतमा, 'हरिप्रिया', वृंदा और भूलोक में विष्णु प्रिया के रूप में पूजा जाता है। 'जय जय तुलसी माता' आरती माता तुलसी की महिमा, उनके चरणों में शरणागति और उनके आशीर्वाद से प्राप्त होने वाले भौतिक व आध्यात्मिक सुखों का अत्यंत सुंदर और भावुक संकलन है।
यद्यपि इस कालजयी आरती के मूल रचयिता का नाम किसी प्राचीन लिखित ग्रंथ में स्पष्ट रूप से उद्धृत नहीं है, परंतु लोक-संस्कृति, संतों की वाणी और सनातन परंपराओं के माध्यम से यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होती आ रही है। यह आरती तुलसी विवाह, कार्तिक मास के विशेष अनुศาสनों, एकादशी व्रतों और दैनिक संध्या वंदन के समय प्रत्येक सनातनी घर में पूरी श्रद्धा के साथ गाई जाती है। पुराणों के अनुसार, स्कंद पुराण और पद्म पुराण में तुलसी के महात्म्य का विस्तार से वर्णन मिलता है, और इसी भक्ति भाव को सरलता से जन-जन तक पहुँचाने के लिए इस आरती की रचना की गई।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
यहाँ माता तुलसी जी की संपूर्ण और प्रामाणिक आरती प्रस्तुत है, जिसका उच्चारण दैनिक पूजन में किया जाता है:
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुख दाता, वर दाता, जय जय तुलसी माता।।सब योगिन के ऊपर, सब रोगिन के ऊपर,
रस की बरसानी, मैया रस की बरसानी।
रोगा भव हरणी जाकी मति दाता, जय जय तुलसी माता।।भटकत जन जो आए, सरन तुम्हारी पाए,
दुख बिसारि सब का, मैया दुख बिसारि सब का,
सुख-संपति दाता, जय जय तुलसी माता।।अनिभुत रूप तुम्हारा, सब जग से न्यारा,
मुनि जन सेवत चरनन, मैया मुनि जन सेवत चरनन,
हरि को मन भाता, जय जय तुलसी माता।।रूप तुम्हारी छबि अति भारी, संतन हितकारी,
चैतन्य रूप प्रकटी, मैया चैतन्य रूप प्रकटी,
ज्ञान प्रकाश जता, जय जय तुलसी माता।।भीमसेन सुत गावत, नित प्रति फल पावत,
आरती जो कोई गावे, मैया आरती जो कोई गावे,
नित सुख संपति पावे, जय जय तुलसी माता।।जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुख दाता, वर दाता, जय जय तुलसी माता।।
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
आरती के प्रत्येक पद का गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ नीचे समझाया गया है:
प्रथम पद का भावार्थ
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। सब जग की सुख दाता, वर दाता, जय जय तुलसी माता।।
भावार्थ: हे माता तुलसी! आपकी जय हो, बार-बार जय हो। आप संपूर्ण संसार को भौतिक और आध्यात्मिक सुख प्रदान करने वाली हैं तथा भक्तों को मनवांछित वर देने वाली वरदायिनी हैं। हम आपके चरणों में नमन करते हैं।
द्वितीय पद का भावार्थ
सब योगिन के ऊपर, सब रोगिन के ऊपर... रोगा भव हरणी जाकी मति दाता, जय जय तुलसी माता।।
भावार्थ: आप योगियों की साधना की आराध्य और रोगियों के लिए संजीवनी बूटी के समान आरोग्यता प्रदान करने वाली हैं। आप संसार के सभी दैहिक, दैविक और भौतिक रोगों तथा भव-बाधाओं का हरण करने वाली हैं और साधकों को सन्मति (सद्बुद्धि) प्रदान करती हैं।
तृतीय पद का भावार्थ
भटकत जन जो आए, सरन तुम्हारी पाए... सुख-संपति दाता, जय जय तुलसी माता।।
भावार्थ: जो लोग मोह-माया के संसार में भटकते हुए आपकी शरण में आते हैं और आपके चरणों का आश्रय लेते हैं, आप उनके सभी दुखों को दूर करके उनके जीवन में सुख और ऐश्वर्य का संचार करती हैं।
चतुर्थ पद का भावार्थ
अनिभुत रूप तुम्हारा, सब जग से न्यारा... हरि को मन भाता, जय जय तुलसी माता।।
भावार्थ: हे मैया! आपका स्वरूप अत्यंत अलौकिक और इस संपूर्ण संसार से निराला है। ऋषि-मुनि निरंतर आपके चरणों की सेवा करते हैं। आप जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु को अत्यंत प्रिय (हरिप्रिया) हैं।
गायन का राग, ताल एवं धुन
भक्ति संगीत में भावों की शुद्धि और एकाग्रता के लिए सही राग और ताल का चयन अत्यंत आवश्यक है। माता तुलसी की आरती का गायन निम्नलिखित शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय परिपाटी के अनुसार किया जाता है:
- संभावित राग: राग बिलावल, राग यमन अथवा मिश्र कल्याण। ये राग शांत रस, भक्ति भाव और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।
- ताल: कहवा (८ मात्रा) या दादरा (६ मात्रा)। इन तालों की सरलता के कारण महिलाएँ, पुरुष और बच्चे सभी इसे आसानी से लयबद्ध होकर गा सकते हैं।
- लय: मध्य लय (Medium Tempo)। आरती गाते समय गति न तो बहुत तीव्र होनी चाहिए और न ही अत्यधिक धीमी, ताकि मन में स्थिरता बनी रहे।
- वाद्य यंत्र: हारमोनियम, मंजीरा, ढोलक और मृदंग का साथ इस आरती में आध्यात्मिक आनंद को कई गुना बढ़ा देता है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
तुलसी पूजन और आरती का विधान शास्त्रों में अत्यंत पवित्र और अनुशासित बताया गया है। सही विधि से आरती करने पर ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है:
- समय का चयन: तुलसी की आरती मुख्य रूप से ब्रह्म बेला (प्रातःकाल) और गोधूलि बेला (संध्याकाल) में की जानी चाहिए। संध्या के समय तुलसी के पास दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अशुद्ध अवस्था में तुलसी के पत्तों को छूना वर्जित माना गया है।
- दीप प्रज्वलन: थाली में शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। इसके साथ ही धूपबत्ती, कुमकुम, अक्षत (अतूट चावल), पुष्प और जल का पात्र रखें।
- परिक्रमा का नियम: आरती संपन्न होने के पश्चात् तुलसी माता की कम से कम 3 या 7 बार परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा के समय धीमी आवाज में मंत्र या जयकारा बोलना चाहिए।
- जल अर्पण: एकादशी, रविवार और सूर्य ग्रहण को छोड़कर प्रतिदिन सायंकाल में दीपक जलाएं और प्रातःकाल जल अर्पित करें।
स्पर्श निषेध और विशेष तिथियों के नियम
तुलसी पूजन में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
| तिथि / वार | नियम व निषेध |
|---|---|
| रविवार (Sunday) | रविवार के दिन तुलसी में जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही उनके पत्ते तोड़ने चाहिए। इस दिन तुलसी माता भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। |
| एकादशी तिथि (Ekadashi) | एकादशी के पावन दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना पूर्णतः वर्जित है। इस दिन तुलसी जी की विशेष पूजा और रात्रि जागरण का विधान है। |
| सूर्यास्त के बाद | सूर्यास्त के पश्चात् तुलसी के पत्ते कभी नहीं तोड़ने चाहिए। यदि बहुत आवश्यक हो, तो तोड़ने से पूर्व तुलसी माता से क्षमा प्रार्थना कर लेनी चाहिए। |
आध्यात्मिक Significance, Karpura Gauram & Phalasruthi
तुलसी केवल एक पौधा नहीं है, बल्कि यह आयुर्वेद और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तुलसी का पौधा प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ता है और वातावरण को शुद्ध करता है। धार्मिक दृष्टि से, जिस घर में नियमित रूप से तुलसी की आरती होती है, वहाँ नकारात्मक ऊर्जा, वास्तु दोष और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता।
आरती के अंत में कपूर जलाकर 'कर्पूरगौरं करुणावतारम्...' का पाठ करने से वातावरण पूरी तरह पवित्र हो जाता है। तुलसी आरती की फलश्रुति के अनुसार, जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से प्रतिदिन यह आरती गाता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, घर में माता लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, और अंत में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
तुलसी की आरती किस समय करनी चाहिए?
तुलसी की आरती मुख्य रूप से प्रातःकाल स्नान के पश्चात और संध्याकाल (गोधूलि बेला) में दीपक प्रज्वलित करते समय करनी चाहिए। संध्या की आरती का विशेष महत्व है।
क्या रविवार के दिन तुलसी में जल दे सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार रविवार के दिन तुलसी में जल अर्पित करना और उनके पत्ते तोड़ना वर्जित माना गया है, क्योंकि इस दिन तुलसी माता भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं।
तुलसी के पत्ते तोड़ने का सही नियम क्या है?
तुलसी के पत्ते कभी भी नाखून से नहीं खींचने चाहिए। पत्तों को तोड़ते समय हल्के से ऊपर की ओर खींचें और अनामिका उंगली का प्रयोग करें। एकादशी, रविवार और सूर्यास्त के बाद पत्ते तोड़ना वर्जित है।
घर में तुलसी का पौधा किस दिशा में लगाना चाहिए?
वास्तु शास्त्र के अनुसार तुलसी का पौधा हमेशा उत्तर, उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा में लगाना सबसे शुभ माना जाता है। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।