भक्ति काव्य व भजन शुक्रवार विशेष (माता महालक्ष्मी व दुर्गा भवानी)

सोमवार प्रदोष व्रत की संपूर्ण आरती, ध्यान श्लोक एवं स्तोत्र पाठ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

सोमवार प्रदोष व्रत की संपूर्ण आरती, ध्यान श्लोक एवं स्तोत्र पाठ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ (Somvar Prdosh Vrt Kee Sampurna Aarti Dhyan Shlok Evn Stotra Path Sampurna Path Evn Srl Hindee Meaning) का संपूर्ण प्रामाणिक पाठ (Full Lyrics in Hindi), सरल हिंदी भावार्थ, पाठ विधि, नियम और नित्य पाठ के 11 अलौकिक लाभ विस्तार से पढ़ें।

आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की उपासना के लिए प्रदोष व्रत का अत्यंत विशिष्ट और पावन स्थान है। त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत के रूप में मनाया जाता है, जो महीने में दो बार यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में आती है। जब यह त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे 'सोम प्रदोष व्रत' कहा जाता है। सोम प्रदोष व्रत का सीधा संबंध चंद्रदेव से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान हैं और उनका नाम 'सोम' भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रमा को क्षय रोग का शाप हो गया था, जिसके निवारण के लिए उन्होंने सोमनाथ में महादेव की आराधना की थी और प्रदोष काल में भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उनके शाप का निवारण किया था। तभी से चंद्रदेव ने इस व्रत का नाम अपने नाम पर 'सोम प्रदोष' रखा।

प्रदोष काल का समय वह पावन बेला है जब दिन और रात का मिलन होता है, यानी गोधूलि बेला या सूर्यास्त के आसपास का समय। इस विशेष समय में भगवान शिव अपने कैलास पर्वत पर अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं तथा उनके गण, माता पार्वती और समस्त देवी-देवता उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। जो साधक इस काल में सच्ची श्रद्धा के साथ भगवान शिव का ध्यान, ध्यान श्लोक, स्तोत्र पाठ और आरती करते हैं, उनके जीवन के समस्त कष्ट, ग्रह बाधाएं, मानसिक संताप और अकाल मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। यह व्रत मोक्ष और भोग दोनों को प्रदान करने वाला कल्पवृक्ष के समान है।

सम्पूर्ण प्रामाणिक मूल पाठ एवं लिरिक्स

यहाँ भगवान शिव के ध्यान श्लोक, प्रदोष स्तोत्र तथा संपूर्ण आरती का प्रामाणिक और त्रुटिरहित मूल पाठ प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसे भक्तगण अपनी साधना के समय सस्वर पाठ कर सकते हैं:

अथ शिव ध्यान श्लोक

ध्यायेनित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं,
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैव्याघ्रचर्म वसानं,
विश्वद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।

अथ प्रदोष स्तोत्रम्

जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत।
जय सर्वेश्वरेशान जय पशुपते प्रभो।।
प्रदोष समये प्राप्ते तव पूजनतत्परः।
लभते वाञ्छितं सर्वं प्रसीद परमेश्वर।।
वृषभारूढ जगन्नाथ त्रिशूलधनुषधर।
गङ्गाधर शशाङ्काङ्क भक्तानां भयभञ्जन।।
मम पापमखिलं घोरं नाशय त्वं कृपाकर।
मृत्युसंसारसागरात् तार मां परमेश्वर।।

भगवान शिव की संपूर्ण आरती (जय शिव ओंकारा)

जय शिव ओंकारा प्रभु जय शिव ओंकारा।
ब्रह्म विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।। (जय शिव...َّة)

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे।। (जय शिव...)

दो भुज चार चतुर्भुज दशभुज अति सोहे।
तीनों रूप लखता त्रिभुवन जन मोहे।। (जय शिव...)

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगगम सोहै भाले शशि धारी।। (जय शिव...)

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर धारी।
सनकादिक गर्दिश भूतादिक भारी।। (जय शिव...)

कर के बीच कमंडल चक्र त्रिशूलकर्ता।
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता।। (जय शिव...)

ब्रह्म विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका।। (जय शिव...)

त्रिगुणात्मक शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे।। (जय शिव...)

प्रत्येक पद / श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

शिवोपासना में प्रयुक्त होने वाले प्रत्येक श्लोक और स्तोत्र का आंतरिक अर्थ अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने वाला है। आइए इनके सरल हिंदी भावार्थ को समझें:

  • ध्यान श्लोक का भावार्थ: हम नित्य उन महेश्वर का ध्यान करते हैं जिनका शरीर चांदी के पर्वत के समान अत्यंत श्वेत और निर्मल है। जिनके मस्तक पर सुंदर चंद्रमा का आभूषण सुशोभित है, जो विभिन्न रत्नों के आभूषणों से देदीप्यमान हैं, जिनके हाथों में परशु (कुल्हाड़ी), मृग, वर मुद्रा और अभय मुद्रा शोभा दे रही है जो सदा प्रसन्नचित्त हैं। जो कमल के आसन पर विराजमान हैं, जिनकी स्तुति समस्त देवतागण करते हैं, जिन्होंने बाघ की खाल धारण कर रखी है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के आराध्य, जगत के बीज और समस्त भयों को हरने वाले पांच मुख और तीन नेत्रों वाले भगवान शिव हैं, हम उन्हें बारंबार प्रणाम करते हैं।
  • प्रदोष स्तोत्र का भावार्थ: हे जगन्नाथ! हे शाश्वत शंकर! आपकी जय हो। हे सर्वेश्वर, ईशान और समस्त जीवों के स्वामी पशुपति प्रभु आपकी जय हो। प्रदोष काल के समय जो भक्त आपकी पूजा में तत्पर रहता है, वह आपकी कृपा से अपनी समस्त मनोकामनाएं प्राप्त करता है। हे परमेश्वर! हम पर प्रसन्न होइए। हे वृषभ (नंदी) पर आरूढ़ होने वाले, त्रिशूल और धनुष धारण करने वाले जगन्नाथ! हे गंगाधर, मस्तक पर चंद्रमा को धारण करने वाले और भक्तों के भयों का नाश करने वाले! हमारे संपूर्ण घोर पापों का नाश कीजिए। इस भवसागर और मृत्यु के चक्र से हे परमेश्वर, हम आपका उद्धार कीजिए।
  • आरती का भावार्थ: हे प्रभु शिव ओंकारा, आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के रूप में संपूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं। आपके मुखों, वाहनों और रूपों की विविधता देखकर संपूर्ण त्रिभुवन मोहित हो जाता है। आप गले में मुण्डमाला और भाल पर चंद्रमा तथा चंदन धारण करते हैं। आप ही इस संसार के रचयिता, पालक और संहारक हैं। जो कोई भी श्रद्धापूर्वक इस त्रिशुलाधारी की आरती गाता है, वह भगवान शिव की कृपा से मनवांछित फल को प्राप्त करता है।

शास्त्रीय पाठ व गायन विधि, शुभ मुहूर्त, नियम एवं सावधानियां

सोमवार प्रदोष व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष नियम, विधि और मुहूर्तों का विधान बताया गया है जिनका पालन करना अत्यंत आवश्यक है:

  1. ब्रह्म मुहूर्त जागरण एवं संकल्प: व्रत के दिन साधक को सूर्योदय से पूर्व प्रातकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान शिव के समक्ष व्रत का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए।
  2. पूजा का शुभ मुहूर्त (प्रदोष काल): प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा प्रदोष काल में ही होती है, जो सूर्यास्त के समय आरंभ होती है। इस समय साधक को शिव मंदिर जाकर अथवा घर के ईशान कोण में शांतचित्त होकर बैठना चाहिए।
  3. आसन एवं दिशा: पूजा और स्तोत्र पाठ के लिए कुश या ऊनी आसन का प्रयोग करना उत्तम माना गया है। बैठते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  4. शिवलिंग का अभिषेक: प्रदोष काल में तांबे या चांदी के पात्र से शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध, शहद, घी और शर्करा अर्पित करते हुए 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का निरंतर जाप करना चाहिए।
  5. नैवेद्य एवं दीपदान: भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प, श्वेत चंदन और भांग अर्पित करें। इसके बाद घी का दीपक और धूप प्रज्वलित कर विधिवत प्रदोष स्तोत्र का पाठ और आरती संपन्न करें।

नित्य पाठ के 11 अलौकिक दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति

सोमवार प्रदोष व्रत की कथा, ध्यान श्लोक, स्तोत्र पाठ और आरती का नियमित अथवा प्रत्येक प्रदोष के दिन पाठ करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित ग्यारह अलौकिक फलों की प्राप्ति होती है:

  • मानसिक शांति और चंद्र दोष मुक्ति: इस व्रत और पाठ से जन्मकुंडली में स्थित चंद्र दोष शांत होता है तथा मन की चंचलता समाप्त होकर परम शांति की प्राप्ति होती है।
  • अकाल मृत्यु एवं भय का नाश: भगवान शिव के महाकाल स्वरूप की कृपा से साधक के जीवन से अकाल मृत्यु का भय, दुर्घटना और शत्रुओं का भय हमेशा के लिए दूर हो जाता है।
  • आरोग्य और दीर्घायु: शिव कृपा से गंभीर से गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा व ओज की वृद्धि होती है।
  • पारिवारिक सुख एवं वैवाहिक सौहार्द: पति-पत्नी के बीच आपसी प्रेम बढ़ता है, वैवाहिक जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
  • दरिद्रता का नाश और ऐश्वर्य प्राप्ति: भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त कृपा से घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं रहती और बरकत बनी रहती है।
  • कर्म बंधनों से मुक्ति: निरंतर स्तोत्र पाठ से संचित कर्मों के बंधन ढीले होते हैं और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • संतान सुख की प्राप्ति: निस्संतान दंपतियों के लिए यह व्रत और स्तोत्र पाठ पुत्र-पुत्री रत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करता है।
  • वाक् सिद्धि और बुद्धि विकास: स्मरण शक्ति तीव्र होती है, एकाग्रता बढ़ती है और साधक की वाणी में ओज व प्रभाव उत्पन्न होता है।
  • गृह क्लेश एवं नकारात्मकता का शमन: घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक और पवित्र आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: जीवन के अंतिम समय में शिवलोक (कैलास धाम) की प्राप्ति का मार्ग सुगम होता है।
  • सर्वमनोकामना सिद्धि: साधक जो भी सच्चे मन से महादेव से मांगता है, वह प्रदोष व्रत के प्रभाव से अवश्य प्राप्त होता है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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