सनातन संस्कृति में प्रातः काल का समय अत्यंत पावन, शांत और ऊर्जावान माना गया है। इस बेला में की गई ईश्वर की आराधना, ध्यान और संकीर्तन मनुष्य के पूरे दिन को सकारात्मकता से भर देता है। इसी परंपरा के अंतर्गत प्रातः स्मरणीय भगवान गणेश संकीर्तन: नित्य प्रातः स्मरण भजन बोल - का नित्य 108 बार जप एवं लाभ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। भगवान श्री गणेश को वेदों, उपनिषदों और पुराणों में 'प्रणव स्वरूप', 'विघ्नहर्ता', 'बुद्धिदाता' और 'सर्वप्रथम पूज्य' कहा गया है। जब कोई साधक प्रातःकाल उठकर सबसे पहले विघ्नहर्ता गणेश का स्मरण करता है, तो उसके जीवन के समस्त मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होने लगते हैं। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम भगवान गणेश के इस पावन संकीर्तन के संपूर्ण लिरिक्स, उसके गहरे दार्शनिक अर्थ, पाठ विधि, और इसके नित्य 108 बार जप से मिलने वाले अलौकिक लाभों का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
नित्य प्रातः स्मरण भजन बोल - का नित्य 108 बार जप एवं लाभ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ - आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
भारतीय सनातन दर्शन में गणेश विद्या का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। पुराणों के अनुसार, जब भी सृष्टि का सृजन हुआ अथवा किसी भी देवता ने कोई नया कार्य आरंभ किया, तो उन्होंने सर्वप्रथम भगवान गणेश का ही आह्वान किया। गणेश जी केवल एक देवता नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि 'ॐ' (प्रणव) और चेतना के प्रतीक हैं। उनका स्थूल शरीर हाथी के मस्तक और मनुष्य के धड़ का अद्भुत समन्वय है, जो इस बात का द्योतक है कि मनुष्य की बुद्धि (मनुष्य रूप) और विवेक (हाथी रूप) का उत्तम संतुलन ही परम ज्ञान की प्राप्ति करवा सकता है।
प्रातः स्मरणीय संकीर्तन की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि और साधक सूर्योदय से पूर्व उठकर अपने इष्ट देव का स्मरण करते थे। भगवान गणेश का यह निर्गुणी एवं सगुण मिश्रित संकीर्तन मन को विषय-विकारों से मुक्त कर शुद्ध चैतन्य में स्थापित करता है। जब कोई भक्त नित्य प्रातः उठकर इस संकीर्तन के बोल गुनगुनाता है और इसका 108 बार जप करता है, तो उसके भीतर की मूलाधार चक्र की ऊर्जा जाग्रत होने लगती है। यह संकीर्तन केवल भय और बाधाओं का नाश ही नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर अदम्य साहस, संयम और बौद्धिक उत्कृष्टता का बीज बोता है।
नित्य प्रातः स्मरण भजन बोल - का नित्य 108 बार जप एवं लाभ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ - सम्पूर्ण प्रामाणिक मूल पाठ एवं लिरिक्स
स्थायी (मुखड़ा):
प्रातः स्मरण करूँ गणेश का, हरें सकल विघ्न कलेश का!
गौरी नंदन वंदन बारम्बार, भज मन गणेश का आधार॥
प्रथम अंतरा:
एकदंत दयालु कृपासिंधु, मूषक वाहन सुख के सिंधु।
हाथ में लड्डू मोदक सोहे, रूप देख सुर-मुनि मन मोहे॥
रिद्धि-सिद्धि के दाता स्वामी, अंतरर्यामी घट-घट रामी।
प्रातः स्मरण करूँ गणेश का, हरें सकल विघ्न कलेश का॥
द्वितीय अंतरा:
लंबोदर गजानन प्यारे, संकट मोचन भक्त हमारे।
जो कोई ध्यावे फल पावे, भवसागर से पार लगावे॥
विद्या बुद्धि ज्ञान के सागर, टेर सुनो हे दया के आगर।
प्रातः स्मरण करूँ गणेश का, हरें सकल विघ्न कलेश का॥
तृतीय अंतरा:
सिंदूर चढ़े ललाट विराजे, मस्तक पर चंदा सा साजे।
कान सूप सम ज्ञान बटोरें, मोह-माया के बंधन तोड़ें॥
चरणों में झुकाऊँ मैं शीश, कृपा करो हे जग के ईश।
प्रातः स्मरण करूँ गणेश का, हरें सकल विघ्न कलेश का॥
चतुर्थ अंतरा:
प्रथम पूज्य तुम जग में कहलाए, वेद पुराण तुम्हें महिमा गाए।
जो जन नित्य तुम्हारा जापे, उसके आगे यम भी काँपे॥
सुख-समृद्धि घर में आवे, दुःख दरिद्रता दूर भगावे।
प्रातः स्मरण करूँ गणेश का, हरें सकल विघ्न कलेश का॥
अन्तिम समापन पद (फलश्रुति):
जो यह पावन पाठ पढ़ेगा, उसका तेज निरंतर बढ़ेगा।
गणेश कृपा से सुख पावे, अंत में बैकुंठ सिधावे॥
बोलो गजानन महाराज की जय, विघ्नहर्ता भगवान गणेश की जय!
प्रत्येक पद / श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य
इस सुंदर संकीर्तन का प्रत्येक पद साधक के हृदय को प्रफुल्लित करने वाला और ज्ञान चक्षु खोलने वाला है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझें:
स्थायी का अर्थ: हे मन! तू प्रातःकाल उठकर सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण कर। ऐसा करने से जीवन के समस्त विघ्न और मानसिक क्लेश नष्ट हो जाते हैं। माता गौरी के नंदन भगवान गणेश की बारम्बार वंदना करो, क्योंकि वही हमारे जीवन का एकमात्र सच्चा आधार हैं।
प्रथम अंतरे का अर्थ: हे एकदंत दयालु कृपासिंधु! आप मूषक की सवारी करने वाले और भक्तों को सुख देने वाले सिंधु के समान अगाध हैं। आपके हाथ में मोदक सुशोभित होता है, और आपका यह अलौकिक रूप देखकर देवता और मुनिगण भी मुग्ध हो जाते हैं। आप रिद्धि और सिद्धि के स्वामी हैं, सबके भीतर वास करने वाले अंतर्यामी हैं।
द्वितीय अंतरे का अर्थ: हे लंबोदर और प्यारे गजानन! आप हमारे संकटों को हरने वाले हैं। जो भी मनुष्य श्रद्धा से आपका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है और इस भवसागर से आसानी से तर जाता है। आप विद्या, बुद्धि और ज्ञान के असीम सागर हैं, हे दया के आगर! हमारी पुकार सुनिए।
तृतीय अंतरे का अर्थ: आपके ललाट पर सिंदूर सुशोभित होता है और मस्तक पर चंद्रकला जैसी भव्यता चमकती है। आपके सूप जैसे बड़े कान हमें यह शिक्षा देते हैं कि संसार से केवल उत्तम ज्ञान ही ग्रहण करो और व्यर्थ की बातों को त्याग दो। आप हमारे मोह-माया के सभी बंधनों को काट देते हैं। मैं आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ, हे जग के ईश! मुझपर कृपा करें।
चतुर्थ अंतरे और समापन का अर्थ: आप इस संसार में 'प्रथम पूज्य' के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वेद और पुराण भी आपकी महिमा का गुणगान करते हैं। जो मनुष्य नित्य आपका जप करता है, उसके संकट देखकर भय भी काँपने लगता है। उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और दरिद्रता कोसों दूर भाग जाती है। जो इस पावन पाठ को नियमित पढ़ता है, उसका तेज और ज्ञान निरंतर बढ़ता जाता है।
शास्त्रीय पाठ व गायन विधि, शुभ मुहूर्त, नियम एवं सावधानियां
किसी भी मंत्र, भजन या संकीर्तन का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए उसकी शास्त्रीय विधि और नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक है:
- शुभ मुहूर्त: इस संकीर्तन का पाठ करने का सबसे उत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे तक) है। स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- आसन एवं दिशा: कुश या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। मन को शांत रखें और रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
- दीप प्रज्वलन: भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें। दूर्वा घास और लाल फूल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- जप संख्या (108 बार): इस संकीर्तन या भगवान गणेश के बीज मंत्र 'ॐ गं गणपतये नमः' का रुद्राक्ष अथवा स्फटिक की माला से नित्य 108 बार (एक माला) जप करें।
- नियम व सावधानियां: पाठ के दौरान पूर्ण सात्विकता का पालन करें। खान-पान में लहसुन-प्याज रहित सात्विक आहार लें और मन में किसी के प्रति ईर्ष्या या द्वेष का भाव न रखें।
नित्य पाठ के 11 अलौकिक दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति
भगवान गणेश के इस पावन संकीर्तन का नित्य 108 बार जप और स्मरण करने से साधक को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
- विघ्न बाधाओं का नाश: जीवन में आने वाली सभी आकस्मिक बाधाएं और अड़चनें स्वतः समाप्त होने लगती हैं।
- बुद्धि और स्मरण शक्ति का विकास: विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह पाठ तीव्र बौद्धिक क्षमता और एकाग्रता प्रदान करता है।
- आर्थिक समृद्धि का आगमन: घर में स्थायी लक्ष्मी और धन-धान्य की वृद्धि होती है, तथा कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलती है।
- मानसिक शांति व तनाव मुक्ति: मन का अवसाद, चिंता और भय दूर होकर असीम मानसिक शांति की अनुभूति होती है।
- नकारात्मक ऊर्जा का निवारण: घर और कार्यस्थल से नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर और बाधाओं का प्रभाव समाप्त होता है।
- पारिवारिक सौहार्द: परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम, समझ और सामंजस्य मजबूत होता है।
- कैरियर व व्यापार में सफलता: नौकरी में प्रमोशन और व्यापार में नए, लाभप्रद अवसरों के मार्ग खुलते हैं।
- वाकसिद्धि और वाणी में ओज: वक्ता, शिक्षक, लेखक और कलाकारों की वाणी में प्रभाव और आकर्षण बढ़ता है।
- शत्रु बाधा से सुरक्षा: गुप्त शत्रुओं और विरोधियों के षड्यंत्र निष्फल हो जाते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: कुंडलिनी शक्ति के मूलाधार चक्र को जाग्रत करने में सहायता मिलती है, जिससे आत्मिक बल बढ़ता है।
- मोक्ष और अभय पद की प्राप्ति: भगवान गणेश की कृपा से जीवन के अंत में उत्तम गति और भवसागर से मुक्ति मिलती है।
निष्कर्षतः, प्रातः स्मरणीय भगवान गणेश संकीर्तन: नित्य प्रातः स्मरण भजन बोल - का नित्य 108 बार जप एवं लाभ सम्पूर्ण पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ केवल एक पाठ मात्र नहीं है, बल्कि यह आपके जीवन को एक नई दिशा, ऊर्जा और दिव्यता प्रदान करने की कुंजी है। इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं और विघ्नहर्ता की असीम कृपा के भागीदार बनें।
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