परिचय तथा ऐतिहासिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि
श्री निर्वाण षटकम् (जिसे आत्म षटकम् भी कहा जाता है) सनातन धर्म के अद्वैत वेदांत दर्शन का सर्वोत्कृष्ट, परम पावन और व्यावहारिक सार-संग्रह है। आठवीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह छह श्लोकों का स्तोत्र केवल एक काव्य नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की प्रत्यक्ष अनुभूति है। 'निर्वाण' शब्द का अर्थ है - समस्त बंधनों, कष्टों, अहंता और अज्ञान का विलीन हो जाना तथा 'षटकम्' का अर्थ है - छह पदों का समूह।
इस अलौकिक स्तोत्र की उत्पत्ति के पीछे एक अत्यंत सुंदर एवं ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। जब बाल संन्यासी शंकर अपने गुरु की खोज में नर्मदा नदी के तट पर महर्षि गोविंदपाद के आश्रम पहुँचे, तब गुरु गोविंदपाद ने उनसे प्रश्न किया—"कस्त्वम्?" (तुम कौन हो?)। इस सीधे और गंभीर प्रश्न का उत्तर बाल शंकर ने किसी लौकिक परिचय (जैसे नाम, जाति, कुल या स्थान) से नहीं दिया। उन्होंने तात्कालिक समाधि भाव में लीन होकर छह श्लोकों की रचना की, जिसमें उन्होंने बताया कि वे शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार या इंद्रियाँ नहीं हैं, बल्कि नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त परमात्म तत्त्व हैं। इन श्लोकों को सुनकर महर्षि गोविंदपाद ने तुरंत समझ लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात शिव का अवतार हैं, और उन्हें अपने शिष्य रूप में स्वीकार किया।
निर्वाण षटकम् उपनिषदों के 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) सिद्धांत पर आधारित है। यह जीव को उसके नश्वर स्वरूप से मुक्त कराकर उसके वास्तविक स्वरूप—"चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्" (मैं ज्ञान और आनंद स्वरूप शिव हूँ)—का बोध कराता है।
सम्पूर्ण निर्वाण षटकम् संस्कृत श्लोक
नीचे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री निर्वाण षटकम् के सभी 6 प्रामाणिक श्लोक मूल संस्कृत रूप में प्रस्तुत हैं:
मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
१ ॥
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुर्न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
२ ॥
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
३ ॥
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
४ ॥
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
५ ॥
अहन्निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
६ ॥
श्लोक-दर-श्लोक हिन्दी अर्थ एवं आध्यात्मिक भावार्थ
प्रथम श्लोक: अंतःकरण एवं पंचमहाभूतों का निषेधश्लोक:
मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
१ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
मनो-बुद्धि-अहंकार-चित्तानि न अहम्: मैं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त (अंतःकरण के चार रूप) नहीं हूँ।न च श्रोत्र-जिह्वे न च घ्राण-नेत्रे: न ही मैं कान, जिह्वा (जीभ), घ्राण (नाक) और नेत्र (आँखें) हूँ।न च व्योम भूमिः न तेजः न वायुः: न मैं आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि और न ही वायु हूँ।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्: मैं तो केवल चैतन्य और आनंद स्वरूप शिव हूँ, मैं शिव हूँ।गहन भावार्थ: आदि शंकराचार्य यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जिसे हम सामान्यतः 'मैं' समझते हैं—अर्थात हमारा मन, सोचने वाली बुद्धि, 'मैं-पन' का अहंकार, और स्मृतियों का भंडार 'चित्त'—वह हम नहीं हैं। ये केवल सूक्ष्म उपकरण हैं। इसी प्रकार, ज्ञानेंद्रियाँ (कान, नाक, आंख, त्वचा, जीभ) और पंचतत्त्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) भी केवल दृश्य जगत् का हिस्सा हैं। आत्मा इन सबसे परे द्रष्टा (देखने वाली) है।
द्वितीय श्लोक: प्राण, शरीर की धातुओं एवं कर्मेंद्रियों का निषेधश्लोक:
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुर्न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
२ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
न च प्राणसंज्ञो: न मैं मुख्य प्राण (साँस) हूँ।न वै पञ्चवायुः: न ही मैं पाँचों प्रकार की वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) हूँ।न वा सप्तधातुः: न मैं शरीर की सात धातुएँ (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) हूँ।न वा पञ्चकोशः: न मैं पंचकोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोश) हूँ।न वाक्-पाणि-पादं न च उपस्थ-पायू: न मैं कर्मेंद्रियाँ हूँ—न वाणी, न हाथ, न पैर, न जननेंद्रिय और न ही गुदा।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्: मैं केवल चिदानंद स्वरूप शिव हूँ।गहन भावार्थ: हमारा भौतिक शरीर सात धातुओं से बना है और पाँच कोशों से घिरा है। प्राण वायु शरीर को चलाती है और कर्मेंद्रियाँ क्रियाएँ करती हैं। लेकिन आत्मा इन भौतिक और सूक्ष्म जैविक प्रक्रियाओं से पूरी तरह पृथक है। आत्मा न साँस लेती है, न चलती है, न बोलती है; वह केवल इन सब गतिविधियों का निस्पृह साक्षी है।
तृतीय श्लोक: मानसिक विकारों एवं पुरुषार्थों से परेश्लोक:
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
३ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
न मे द्वेष-रागौ: न मेरे भीतर द्वेष (घृणा) है और न राग (आसक्ति)।न मे लोभ-मोहौ: न मुझमें लोभ है और न मोह।मदो नैव मे न मात्सर्यभावः: न मुझमें मद (अहंकार/घमंड) है और न ही ईर्ष्या या मत्सर की भावना।न धर्मो न च अर्थो न कामो न मोक्षः: न मुझमें चार पुरुषार्थ हैं—न धर्म, न अर्थ, न काम और न ही मोक्ष की इच्छा।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्: मैं शुद्ध चैतन्य आनंद स्वरूप शिव हूँ।गहन भावार्थ: राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर (षड्रिपु) मन की तरंगें हैं, आत्मा की नहीं। परम स्थिति में जब द्वैत ही समाप्त हो जाता है, तब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे साधन भी पीछे छूट जाते हैं, क्योंकि आत्मा स्वयं सिद्ध और नित्य मुक्त है।
चतुर्थ श्लोक: कर्म, कर्मफल एवं साधन-साध्य का निषेधश्लोक:
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
४ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
न पुण्यं न पापं: मेरे लिए न कोई पुण्य है और न कोई पाप।न सौख्यं न दुःखं: न सुख है और न ही दुःख।न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः: न मंत्र, न तीर्थ, न वेद और न ही यज्ञ।अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता: न मैं उपभोग की क्रिया हूँ, न उपभोग की वस्तु (भोज्य) और न ही उपभोग करने वाला (भोक्ता)।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्: मैं ज्ञान और आनंद स्वरूप शिव हूँ।गहन भावार्थ: यह श्लोक अद्वैत की पराकाष्ठा है। पाप और पुण्य, सुख और दुःख बुद्धि के स्तर पर होते हैं। आत्मा इन द्वंद्वों से परे है। परम सत्ता में मंत्र, वेद, तीर्थ और यज्ञ जैसी साधना पद्धतियाँ भी विलीन हो जाती हैं। आत्मा न तो अनुभवकर्ता है और न ही अनुभूत वस्तु, वह केवल निरपेक्ष सत्य है।
पंचम श्लोक: सांसारिक संबंधों एवं जन्म-मृत्यु का निषेधश्लोक:
न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
५ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
न मृत्युः न शङ्का: न मेरी मृत्यु होती है और न ही मुझे मृत्यु का कोई भय/शंका है।न मे जातिभेदः: न मुझमें कोई जाति या वर्ण का भेद है।पिता नैव मे नैव माता न जन्म: न मेरे कोई पिता हैं, न माता और न ही मेरा कभी जन्म हुआ है।न बन्धुः न मित्रं: न मेरा कोई भाई-बंधु है और न ही कोई मित्र।गुरुः नैव शिष्यः: न मैं गुरु हूँ और न ही शिष्य।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्: मैं केवल चिदानंद स्वरूप शिव हूँ।गहन भावार्थ: जन्म और मृत्यु केवल इस देह के होते हैं। आत्मा अजन्मा और अमर है। सांसारिक संबंध—माता, पिता, मित्र, बंधु—केवल देह और उपाधि पर आधारित हैं। आत्म-साक्षात्कार के उच्चतम शिखर पर गुरु और शिष्य का भेद भी समाप्त हो जाता है, केवल एक अद्वैत ब्रह्म ही शेष रहता है।
षष्ठ श्लोक: सर्वव्यापकता एवं परम निर्वाण की स्थितिश्लोक:
अहन्निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
६ ॥
पद-विश्लेषण एवं अर्थ:
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो: मैं समस्त संकल्पों-विकल्पों से रहित और बिना किसी आकार वाला हूँ।विभुत्वात् च सर्वत्र सर्व-इन्द्रियाणाम्: मैं विभु (सर्वव्यापी) हूँ और सभी इंद्रियों में तथा सर्वत्र विद्यमान हूँ।न च असङ्गतं नैव मुक्तिः न मेयः: न मैं किसी में आसक्त हूँ, न मुझे मुक्ति की आवश्यकता है (क्योंकि मैं नित्य मुक्त हूँ) और न ही मैं प्रमेय (मापने योग्य) हूँ।चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्: मैं ज्ञान और आनंद स्वरूप शिव हूँ, मैं शिव हूँ।गहन भावार्थ: अंतिम श्लोक में शंकराचार्य अपनी वास्तविक स्थिति की घोषणा करते हैं। आत्मा निराकार है, सर्वव्यापी है। इसे न तो किसी बंधन में बाँधा जा सकता है और न ही इसे 'मुक्त' होने की आवश्यकता है, क्योंकि जो कभी बंधा ही नहीं, उसकी मुक्ति कैसी? वह केवल सर्वत्र व्याप्त अखंड चैतन्य है।
निर्वाण षटकम् और अद्वैत वेदांत दर्शन
अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है: "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः" (अर्थात केवल ब्रह्म सत्य है, जगत् व्यावहारिक/मिथ्या है, और जीव ब्रह्म से अलग नहीं है)। निर्वाण षटकम् इसी सिद्धांत का काव्यात्मक और आत्म-साक्षात्कार योग्य रूप है।
नेति-नेति (Not This, Not This) की पद्धति
उपनिषदों में अद्वैत बोध प्राप्त करने के लिए 'नेति-नेति' मार्ग बताया गया है। निर्वाण षटकम् में आदि शंकराचार्य इसी पद्धति का प्रयोग करते हैं। वे एक-एक करके मानव अस्तित्व के सभी छद्म आवरणों को नकारते हैं:
| क्र.सं. | अस्वीकृत आवरण (क्या मैं नहीं हूँ?) | आध्यात्मिक कारण |
|---|---|---|
| 1 | अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त) | ये परिवर्तनशील हैं और आत्मा द्वारा दृश्य हैं। |
| 2 | ज्ञानेंद्रियाँ एवं पंचभूत | ये भौतिक जगत् के साधन और घटक हैं। |
| 3 | प्राण एवं पंचकोश | ये केवल जैविक ऊर्जा और आवरण हैं। |
| 4 | मानसिक विकार (राग, द्वेष आदि) | ये मन के धर्म हैं, आत्मा के नहीं। |
| 5 | सांसारिक संबंध एवं जाति | ये केवल देह से जुड़े हुए अस्थाई नाम हैं। |
| 6 | शुद्ध चैतन्य (शिवोऽहम्) | यह नित्य, अजर, अमर और सर्वव्यापी सत्य है। |
वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस भी स्वीकार करते हैं कि हमारी 'अहंकार' (Ego) की पहचान केवल मस्तिष्क की निर्मिति है। तनाव, अवसाद और भय तभी उत्पन्न होते हैं जब व्यक्ति स्वयं को अपनी बुद्धि, विचारों, असफलताओं या शरीर की सीमाओं से जोड़ लेता है।
निर्वाण षटकम् का निरंतर ध्यान व्यक्ति को 'साक्षी भाव' (Observational Consciousness) में लाता है। जब आप यह समझ जाते हैं कि "मैं यह तनाव नहीं हूँ, मैं यह बीमारी नहीं हूँ, मैं यह असफलता नहीं हूँ," तो मानसिक कष्ट स्वतः समाप्त हो जाता है। यही निर्वाण (Liberation from suffering) है।
जप विधि, नियम एवं उपयुक्त समय
श्री निर्वाण षटकम् का पाठ केवल मंत्र जाप नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय ध्यान प्रक्रिया है। इसके पूर्ण लाभ हेतु निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- उत्कृष्ट समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) इसके पाठ के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इस समय वातावरण शांत और सात्विक होता है, जिससे मन आसानी से ध्यानस्थ हो जाता है। संध्या काल में भी इसका पाठ किया जा सकता है।
- स्थान एवं आसन: एक शांत, स्वच्छ स्थान चुनें। कुशा या ऊन के आसन पर पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन में बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
- मानसिक स्थिति: पाठ शुरू करने से पहले कुछ गहरी साँसें लें और मन को शांत करें। पाठ करते समय प्रत्येक श्लोक के अर्थ पर चिंतन करें। केवल शब्दों को दोहराएं नहीं, बल्कि महसूस करें कि आप शरीर और मन से परे आत्मा हैं।
- उच्चारण शुद्धता: संस्कृत के शब्दों का स्पष्ट और लयबद्ध उच्चारण करें। अंतिम पंक्ति "चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्" को विशेष भाव और तल्लीनता के साथ गाएं।
फलश्रुति एवं अलौकिक लाभ
निर्वाण षटकम् का नियमित पाठ और इस पर ध्यान करने से साधक को अद्भुत आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और भय से मुक्ति: मृत्यु, बीमारी, हानि और अकेलेपन का भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि साधक अपनी अमर आत्मा से जुड़ जाता है।
- अहंकार का विनाश: 'मैं और मेरा' का मिथ्या अहंकार नष्ट होता है, जिससे नम्रता और आंतरिक प्रसन्नता का विकास होता है।
- तनाव और अवसाद का निवारण: यह स्तोत्र मानसिक विकारों, चिंता और डिप्रेशन के लिए एक परमौषधि है।
- आध्यात्मिक जागृति: साधक में साक्षी भाव विकसित होता है, जिससे अद्वैत ज्ञान की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।
- बंधनों से मुक्ति: राग-द्वेष और वासनाओं के बंधन शिथिल हो जाते हैं, जिससे जीवन में परम स्वतंत्रता (निर्वाण) का अनुभव होता है।
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