भक्ति काव्य व भजन रविवार विशेष (भगवान सूर्य नारायण)

गोवर्धन पूजा अन्नकूट की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र व पारण नियम

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र, पारण नियम और पौराणिक कथा। जानें अन्नकूट भोग लगाने का सही तरीका। संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

सनातन हिंदू धर्म में दीपावली के पावन पर्व के ठीक अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक पर्व मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण, जीवमात्र और गोवंश के प्रति हमारी अगाध कृतज्ञता और प्रेम का प्रतीक है। भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इंद्र के अहंकार से मुक्त कराने के लिए गोवर्धन पर्वत की पूजा की परंपरा की शुरुआत की थी। इस दिन घर-आंगन में गोबर से गिरिराज गोवर्धन की भव्य आकृति बनाई जाती है, उनका षोडशोपचार पूजन किया जाता है और विभिन्न प्रकार के अनाजों, सब्जियों व मिठाइयों से तैयार अन्नकूट भोग भगवान को समर्पित किया जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रज में सभी लोग देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी कर रहे थे और भारी मात्रा में पकवान व सामग्रियां जुटाई जा रही थीं। तब बाल्यकाल में भगवान श्री कृष्ण ने नंद बाबा और ब्रजवासियों से प्रश्न किया कि आप लोग इंद्र की पूजा क्यों कर रहे हैं? इंद्र तो केवल वर्षा करते हैं, जबकि हमारी असली आजीविका और जीवन का आधार तो यह गोवर्धन पर्वत है, जिसके कारण हमें ताजी घास, जड़ी-बूटियाँ और आश्रय मिलता है तथा हमारी पूजनीय गाएं इसी पर्वत पर चरती हैं। भगवान कृष्ण की इस तार्किक और सत्य बात को मानकर ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा बंद कर गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी। इससे कुपित होकर देवराज इंद्र ने प्रलयकारी मूसलाधार वर्षा और बादलों (संवर्तक बादलों) को ब्रज को डुबोने के लिए भेज दिया।

तब ब्रजवासियों की रक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ (छींगुरी) उंगली पर गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक लगातार उठाकर छाता बना लिया। समस्त ब्रजवासी उस पर्वत के नीचे सुरक्षित आ गए। अंततः देवराज इंद्र का अहंकार टूटा और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की शरण में आकर क्षमा याचना की। तभी से गोवर्धन पूजा की यह महान परंपरा पृथ्वी पर आरंभ हुई। इस दिन अन्नकूट का भोग लगाने से घर में कभी भी अन्न, धन और वैभव की कमी नहीं होती तथा भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस लेख में हम गोवर्धन पूजा की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र, प्रामाणिक स्तोत्र, आरती और पारण नियमों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

गोवर्धन पूजा अन्नकूट की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र व प्रामाणिक पाठ

गोवर्धन पूजा के दिन प्रातःकाल ब्रह्म बेला में उठकर शरीर की शुद्धि के पश्चात स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात अपने घर के आंगन या मुख्य द्वार के सामने अथवा पूजा स्थल पर पवित्र गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की सुंदर आकृति का निर्माण करें। इस आकृति में भगवान श्री कृष्ण, ग्वाल-बाल, और गोवंश (गाय-बछड़े) की छोटी-छोटी आकृतियां भी बनाई जाती हैं। पूजा के समय सबसे पहले पवित्रीकरण और संकल्प लिया जाता है।

गोवर्धन पूजा संकल्प मंत्र (Sankalpa Mantra)

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वंतररे अष्टविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतवर्षे आर्यावर्ते देशे
(अपने गोत्र व नाम का उच्चारण करें)
कार्तिक मासे शुक्ल पक्षे प्रतिपदा तिथ्याम् अमुक वासरे गोवर्धन पूजा कर्म अहम् करिष्ये।

संकल्प लेने के पश्चात गोवर्धन पर्वत पर जल, दूध, दही, शहद, और घी से अभिषेक करें। इसके उपरांत रोली, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, बताशे, खील और विशेष रूप से अन्नकूट का भोग अर्पित करें। गोवर्धन पूजा के दौरान निम्नलिखित प्रामाणिक श्लोक और प्रार्थना का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:

श्री गोवर्धन स्तुति एवं ध्यान मंत्र

गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुकृతోच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥
लक्ष्मीः कृपारूपा गवां च माता,
गोवर्धनो गोकुलस्य च त्राता।
कृष्णप्रियो भक्तमनोहरश्च,
पातु नः सर्वदा गोवर्धनोऽयम्॥

भूमौ प्रस्थापितो येन गोवर्धनो महामणिः。
तं कृष्णं शिरसा वन्दे सर्वदा गोकुलेश्वरम्॥
इन्द्रमदप्रशमनाय गोवर्धनधराय ते。
नमो नमस्ते कृष्णाय गोकुलाधिपतये नमः॥

प्रत्येक पद / श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

उपर्युक्त गोवर्धन स्तुति और संकल्प मंत्रों का आंतरिक आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गहरा है। आइए इन श्लोकों के सरल हिंदी भावार्थ को समझते हैं:

प्रथम श्लोक का भावार्थ: हे गोवर्धन पर्वत! आप इस पृथ्वी को धारण करने वाले हैं, संपूर्ण गोकुल की रक्षा करने वाले हैं। भगवान विष्णु की भुजाओं के समान अत्यंत ऊंचे और शक्तिशाली होकर आपने ब्रजवासियों को बचाया है। आप हमें कोटि-कोटि गवां (गोवंश) और सुख-समृद्धि का दान प्रदान करें। इस श्लोक के माध्यम से भक्तगण पर्वत को भगवान विष्णु का ही स्वरूप मानकर उसकी वंदना करते हैं।

द्वितीय श्लोक का भावार्थ: माता लक्ष्मी की कृपा का रूप और गायों की मातास्वरूप गोमती तथा गोवर्धन पर्वत ही गोकुल के सच्चे त्राता (रक्षक) हैं। भगवान श्री कृष्ण को अत्यंत प्रिय लगने वाले और भक्तों के मन को मोहने वाले यह गोवर्धन पर्वत हमारी सभी प्रकार से रक्षा करें। यहां पर्वत को भगवान कृष्ण की लीलास्थली और उनके प्रिय के रूप में चित्रित किया गया है.

तृतीय श्लोक का भावार्थ: इस पृथ्वी पर जिस प्रभु ने गोवर्धन जैसे महान पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर धारण किया, उन गोकुलेश्वर भगवान श्री कृष्ण को मैं अपने सिर झुकाकर बारंबार वंदन करता हूँ। अहंकार में चूर देवराज इंद्र के घमंड को चूर-चूर करने वाले, गोवर्धन को धारण करने वाले उन कृष्ण को मेरा बार-बार प्रणाम है।

अन्नकूट महोत्सव का आध्यात्मिक रहस्य यह है कि हम अपने जीवन में ग्रहण किए जाने वाले समस्त अन्नों और भोज्य पदार्थों को सबसे पहले परमात्मा को समर्पित करें (यज्ञ शिष्टामृतभुजः)। अन्न ही हमारी चेतना का निर्माण करता है, इसलिए शुद्ध और सात्विक अन्न जब भगवान को भोग लगाकर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है, तो वह हमारे अंतःकरण को भी शुद्ध और पवित्र बनाता है।

शास्त्रीय पाठ व गायन विधि, शुभ मुहूर्त, नियम एवं सावधानियां

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन विधि-विधान से करने पर ही इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसके लिए निम्नलिखित नियमों और शास्त्रीय पद्धतियों का पालन करना आवश्यक है:

  • शुभ मुहूर्त: गोवर्धन पूजा प्रतिपदा तिथि के दिन प्रातःकाल या सायंकाल प्रदोष काल में की जाती है। इस दिन मुहूर्त का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि प्रतिपदा तिथि दो दिन पड़े, तो जिस दिन सूर्योदय के समय प्रतिपदा हो, उसी दिन पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है।
  • स्थान का चयन: पूजा हमेशा घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या आंगन के स्वच्छ भाग में करनी चाहिए। गोबर से लेपन करके वहां सुंदर रंगोली सजाई जानी चाहिए।
  • वस्त्र एवं आसन: पूजा करने वाले यजमान को पीले या लाल रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। कुश या ऊनी आसन पर बैठकर शांत चित्त से पूजा संपन्न करनी चाहिए।
  • परिक्रमा नियम: गोवर्धन पूजा के पश्चात गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा अवश्य लगाई जाती है। यदि आप गोवर्धन (मथुरा) में हैं, तो वहां की सप्तकोसी परिक्रमा का विशेष महत्व है। घर पर बने गोवर्धन की भी प्रतीकात्मक रूप से सात परिक्रमा लगाई जाती है, जिसमें हाथ में जल का लोटा लेकर धीरे-धीरे जलधारा गिराते हुए परिक्रमा पूरी की जाती है।
  • सावधानियां: पूजा के दौरान तामसिक वस्तुओं (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि) का पूर्ण त्याग करना चाहिए। घर में या पूजा स्थल पर क्रोध, द्वेष और अशांति का वातावरण नहीं होना पूर्णतः वर्जित है।

नित्य पाठ के 11 अलौकिक दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति

गोवर्धन पूजा, अन्नकूट दर्शन और संबंधित मंत्रों व स्तोत्रों का नियमित स्मरण या वार्षिक पर्व पर विधि-विधान से अनुष्ठान करने से साधक को जीवन में निम्नलिखित 11 अलौकिक दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. अन्न एवं धन की अक्षय समृद्धि: अन्नकूट के प्रभाव से साधक के घर में कभी भी अन्न और धन के भंडार खाली नहीं होते, सदैव माता अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
  2. गोवंश सेवा का पुण्य: गोवर्धन पूजा करने से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गोवंश की सेवा का पुण्य प्राप्त होता है, जिससे पापों का नाश होता है।
  3. आपदाओं और संकटों से रक्षा: जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने गोवर्धन उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी, उसी प्रकार इस व्रत के प्रभाव से भक्त के परिवार पर आने वाली सभी विपत्तियां टल जाती हैं।
  4. इंद्रदोष एवं नकारात्मकता का शमन: जीवन में अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और साधक विनम्र व सेवाभावी बनता है।
  5. स्वास्थ्य लाभ एवं आरोग्य: सात्विक अन्नकूट प्रसाद ग्रहण करने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है और शारीरिक स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  6. पारिवारिक सौहार्द व शांति: परिवार के सभी सदस्यों के बीच प्रेम, एकता और आत्मीयता बढ़ती है, आपसी कलह-क्लेश समाप्त होते हैं।
  7. मोक्ष एवं भगवान कृष्ण की प्राप्ति: अंत समय में भगवान श्री कृष्ण के चरणों में स्थान और परम धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  8. ग्रह दोष शांति: कुंडली में दुर्बल चंद्रमा, बृहस्पति और सूर्य से संबंधित दोषों का शमन होता है, क्योंकि यह प्रकृति और ग्रहों की ऊर्जा से जुड़ा पर्व है।
  9. मानसिक शांति व संतोष: मन में संतोष और परोपकार की भावना जागृत होती है, जिससे मानसिक तनाव और अवसाद दूर होते हैं।
  10. व्यापार एवं कृषि में वृद्धि: किसानों, व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह पर्व विशेष फलदायी है, जिससे उनके कार्यक्षेत्र में उत्तरोत्तर उन्नति होती है।
  11. पितृ तृप्ति: इस दिन अन्नदान और गोसेवा करने से पितृगण तृप्त होते हैं और उनका आशीर्वाद परिवार पर सदैव बना रहता है।

निष्कर्ष

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का यह महान पर्व हमें सनातन संस्कृति की उस महान जीवनदृष्टि से परिचित कराता है, जहाँ प्रकृति और पर्यावरण को ही ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने हमें यह सिखाया कि हमें अपनी आजीविका प्रदान करने वाले पेड़ों, पर्वतों, नदियों और पशुओं का सम्मान करना चाहिए और उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इस पावन अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम जीवमात्र की सेवा करेंगे और सात्विक जीवन शैली अपनाकर भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अपनी पूर्ण भक्ति समर्पित करेंगे। बोलो गिरिराज गोवर्धन महाराज की जय!

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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