भक्ति काव्य व भजन रविवार विशेष (भगवान सूर्य नारायण)

भाई दूज यम द्वितीया की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र व पारण नियम

भाई दूज यम द्वितीया की संपूर्ण पूजा विधि, संकल्प मंत्र व पारण नियम की संदर्भ एवं व्याख्या सहित जानकारी। पढ़ें भाई दूज का महत्व।

आध्यात्मिक परिचय एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

सनातन हिंदू धर्म में कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को 'भाई दूज' या 'यम द्वितीया' के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व भाई और बहन के बीच के निश्छल प्रेम, पवित्र स्नेह और अटूट बंधन का प्रतीक है। दीपावली के ठीक दो दिन बाद आने वाला यह त्योहार पारिवारिक सौहार्द को सुदृढ़ करने के साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के मस्तक पर विजय तिलक लगाती हैं, उनकी दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं, तथा भाई अपनी बहनों को रक्षा और उपहार का वचन देते हैं।

इस पर्व की पौराणिक पृष्ठभूमि सीधे तौर पर मृत्यु के देवता भगवान यमराज और उनकी भगिनी सूर्यपुत्री यमुना (कालिंदी) से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य देव की संतान यमुना जी अपने भाई यमराज से अत्यधिक स्नेह करती थीं। यमुना जी बार-बार अपने भाई यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करती थीं, परंतु अपने व्यस्त और कठोर कर्तव्यों के कारण यमराज उनका निमंत्रण टाल देते थे। अंततः, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे। बहन यमुना ने अत्यंत प्रेम, आदर और सत्कार के साथ अपने भाई का स्वागत किया, उन्हें स्वादिष्ट व्यंजनों का भोजन कराया और उनके मस्तक पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु की प्रार्थना की।

अपनी बहन के इस निष्काम और निश्चल प्रेम से अभिभूत होकर भगवान यमराज ने यमुना जी से वर मांगने को कहा। तब यमुना जी ने वरदान मांगा कि, "हे भगवन्! आज के दिन जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करेगा और आपकी पूजा करेगा, उसे कभी भी अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा और वह अंततः मोक्ष को प्राप्त करेगा।" यमराज ने तथास्तु कहकर इस वरदान को सत्य कर दिया। तभी से कार्तिक शुक्ल द्वितीया को 'यम द्वितीया' और 'भाई दूज' के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन जो व्यक्ति सच्चे मन से यमराज और यमुना जी का स्मरण करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

सम्पूर्ण प्रामाणिक मूल पाठ एवं लिरिक्स

भाई दूज और यम द्वितीया के पावन अवसर पर यमराज, यमुना जी तथा भाई-बहन के स्नेह को समर्पित प्रामाणिक श्लोक, मंत्र और स्तुति पाठ का यहां संपूर्ण विवरण प्रस्तुत है। इसका पाठ करने से साधक को आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है:

यमराज एवं यमुना ध्यान मंत्र

सूर्यपुत्रो दीर्घकाले महाकाल यमेश्वरः।
चित्रगुप्त सहिताश्चैव गृहणन्तु अर्घ्यमुत्तमम्।।
यमुने लोकसंहापि सर्वपापहरा भवेत्।
पुण्यदा कुरु मे शांति प्रीतिं च वर्धय सदा।।

संकल्प मंत्र (पूजा के समय उच्चारण हेतु)

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखंडे आर्यावर्तान्तर्गाते [अपने नगर/क्षेत्र का नाम लें] क्षेत्रे बौद्धावतारे [वर्तमान संवत्सर का नाम] कार्तिक मासे शुक्ल पक्षे द्वितीया तिथ్యాम् [गोत्र का नाम] गोत्रोत्पन्नः [अपना नाम] अहम् अपमृत्यु निवारणार्थं भ्रातृ-भगिनी प्रीति वृद्धयर्थं श्रीयमार्जन-यमुनापूजनं च करिष्ये।

भ्रातृ-तिलक स्तुति मंत्र

गंगा यमुना तौ च द्वितीया यमपूजनात्।
भ्रातुः सुखानि लभते आयुर्वृद्धिः सदा भवेत्।।
यमुना कालिंदी तीरे यमराजस्य पूजनम्।
करोति यः पुमान् तस्य न भयं विद्यते क्वचित्।।

प्रत्येक पद / श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

उपर्युक्त मंत्रों और श्लोकों का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करता है। 'सूर्यपुत्रो दीर्घकाले महाकाल यमेश्वरः' श्लोक के माध्यम से हम भगवान यमराज के उस स्वरूप का स्मरण करते हैं जो न्याय के देवता हैं, जो कर्मों का सटीक लेखा-जोखा रखते हैं और धर्म की रक्षा करते हैं। उनके साथ चित्रगुप्त जी का स्मरण करने से यह चेतना जागृत होती है कि हमारे द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म सूक्ष्म रूप से दर्ज हो रहा है, अतः हमें सदा सत्कर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।

संकल्प मंत्र का उद्देश्य हमारे मन को भौतिक आसक्तियों से हटाकर पवित्र अनुष्ठान की ऊर्जा से जोड़ना है। जब हम संकल्प लेते हैं कि हम अपमृत्यु के निवारण और भाई-बहन के प्रेम की वृद्धि के लिए यह पूजा कर रहे हैं, तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह तेज हो जाता है। भाई दूज के तिलक मंत्र का भाव यह है कि जिस प्रकार गंगा और यमुना नदियां संसार को जीवन प्रदान करती हैं, उसी प्रकार बहन का आशीर्वाद और भाई का स्नेह परिवार में जीवन और ऊर्जा का संचार करता है। यमराज और यमुना की यह कथा हमें यह सिखाती है कि पारिवारिक प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर मृत्यु के भय जैसी विकट परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाया जा सकता है।

शास्त्रीय पाठ व गायन विधि, शुभ मुहूर्त, नियम एवं सावधानियां

भाई दूज या यम द्वितीया के अनुष्ठान को शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार ही संपन्न करना चाहिए ताकि इसका पूर्ण फल प्राप्त हो सके:

  • शुभ मुहूर्त: भाई दूज के दिन मध्याह्न काल (दोपहर का समय) तिलक और पूजन के लिए सर्वोपरि माना गया है। इस समय सूर्य अपने मध्य में होते हैं और ऊर्जा का स्तर उच्चतम होता है।
  • स्थान की शुद्धि: पूजा से पूर्व घर के ईशान कोण या उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ कर लें। वहां गंगाजल का छिड़काव करें।
  • आसन और दिशा: भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लकड़ी के पाटे (चौकी) पर बिठाना चाहिए। बहन का मुख उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।
  • दीपक प्रज्वलन: संध्या के समय घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त चार मुख वाला (चौमुखी) आटे का दीपक जलाना चाहिए। दक्षिण दिशा यमराज की दिशा मानी जाती है।
  • पूजन सामग्री: तिलक के लिए रोली, अक्षत, चंदन, पान का पत्ता, सुपारी, गोले का टुकड़ा (सूखा नारियल), कलावा (रक्षा सूत्र), फल और मिठाई थाली में सजाएं।
  • सावधानियां: इस दिन क्रोध, द्वेष और विवाद से पूर्णतः बचना चाहिए। भाई को अपनी बहन का अपमान नहीं करना चाहिए और बहन को भी शुद्ध मन से भाई का सत्कार करना चाहिए। भोजन ग्रहण करने से पूर्व यमराज और यमुना जी का स्मरण अवश्य करें।

नित्य पाठ के 11 अलौकिक दिव्य फल, लाभ एवं फलश्रुति

यम द्वितीया के इस पावन पर्व पर विधि-विधान से पूजा और मंत्र पाठ करने तथा भाई-बहन के इस अनुष्ठान को निभाने से साधक को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में ग्यारह अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. अकाल मृत्यु का निवारण: यमराज की कृपा से साधक और उसके परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु या दुर्घटनाओं के भय से मुक्ति मिलती है।
  2. पारिवारिक सौहार्द में वृद्धि: भाई-बहन के बीच का प्रेम प्रगाढ़ होता है और परिवार में आपसी कलह एवं मतभेद समाप्त होते हैं।
  3. आयु और स्वास्थ्य की प्राप्ति: नित्य या पर्व विशेष पर इस विधान का पालन करने से दीर्घायु और उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
  4. पापों का शमन: यमुना जी और यमराज के स्मरण मात्र से पूर्वकृत अजाने पापों का शमन होता है और अंतःकरण शुद्ध होता है।
  5. पितृ प्रसन्नता: सूर्यपुत्र यमराज और यमुना की पूजा से पितृगण तृप्त होते हैं और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है।
  6. नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर के द्वार पर यम दीपक जलाने से नकारात्मक शक्तियां, बुरी नजर और प्रेत बाधाएं घर में प्रवेश नहीं करतीं।
  7. सकारात्मकता का संचार: मन में संयम, परोपकार, धर्म और नैतिकता के उच्च संस्कारों का विकास होता है।
  8. आर्थिक समृद्धि: घर में बरकत बनी रहती है और अन्न-धन के भंडार हमेशा भरे रहते हैं।
  9. मानसिक शांति: भय, चिंता और तनाव से मुक्ति मिलती है तथा मन में आध्यात्मिक शांति का वास होता है।
  10. रिश्तों में प्रगाढ़ता: समाज और परिवार में मान-सम्मान बढ़ता है तथा रिश्ते मजबूत होते हैं।
  11. मोक्ष मार्ग की प्राप्ति: जीवन के अंतिम समय में भगवत धाम की प्राप्ति होती है और यमलोक की यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता।

निष्कर्ष

भाई दूज या यम द्वितीया केवल एक भाई-बहन के मिलने का पर्व नहीं है, बल्कि यह जीवन, मृत्यु, कर्तव्य और प्रेम के एक गहरे दार्शनिक सत्य को उजागर करता है। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि प्रेम और सद्भाव में वह शक्ति है जो मृत्यु के भय को भी उत्सव में बदल सकती है। आइए, इस पावन पर्व पर पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ यमराज और यमुना जी का पूजन करें तथा अपने रिश्तों की डोर को और अधिक मजबूत बनाएं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!