भक्ति काव्य व भजन गुरुवार विशेष (भगवान श्री हरि विष्णु व गुरुदेव)

श्री भैरव चालीसा संपूर्ण 40 चौपाइयां एवं आरती

भगवान कालभैरव और बटुक भैरव की प्रसन्नता के लिए श्री भैरव चालीसा का संपूर्ण मूल पाठ, हिंदी भावार्थ, शास्त्रीय पूजन विधि, लाभ एवं आरती यहाँ पढ़ें।

प्रस्तावना एवं परिचय

पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में भगवान कालभैरव और बटुक भैरव को देवाधिदेव महादेव शिव का अत्यंत उग्र, तेजस्वी और कृपालु अवतार माना गया है। 'भैरव' शब्द का अर्थ है - 'भय का हरण करने वाले' और 'संसार का भरण-पोषण करने वाले'। शिव महापुराण के अनुसार, जब ब्रह्मा जी के पंचम मुख ने महादेव के प्रति अहंकार प्रदर्शित किया, तब शिव के क्रोध से भगवान कालभैरव का प्राकट्य हुआ। वे काल के भी काल हैं, इसलिए उन्हें 'कालभैरव' कहा जाता है। वे काशी के कोतवाल हैं, जिनकी अनुमति के बिना काशी विश्वनाथ की नगरी में कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

श्री भैरव चालीसा एक अत्यंत शक्तिशाली और सिद्ध स्तोत्र है। इसकी चालीस चौपाइयों में भगवान भैरव के सौम्य (बटुक) और रौद्र (काल) दोनों रूपों की स्तुति की गई है। इस चालीसा का नियमित पाठ करने से साधक के जीवन से भय, दरिद्रता, शत्रु बाधा, तंत्र-मंत्र का कुप्रभाव और अकाल मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है। यह चालीसा कलयुग में शीघ्र फल देने वाली मानी गई है क्योंकि भैरव जी अपने भक्तों की पुकार बहुत जल्दी सुनते हैं।

सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र रचना

यहाँ श्री भैरव चालीसा का पूर्णतः शुद्ध एवं प्रामाणिक मूल पाठ दिया जा रहा है। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करें:

॥ दोहा ॥

श्री गणपति गुरु गौरी पद, प्रेम सहित धरि माथ।
चालीसा वंदन करौं, श्री शिव भैरवनाथ॥
क्रंदन कर कलिमल हरण, विघ्न हरण सुखधाम।
सेवा करहिं नित दास जो, सिद्ध करहिं सब काम॥

॥ चौपाई ॥

१. जय जय श्री काली के लाला। जयति जयति काशी के पाला॥
२. जयति बटुक भैरव भय हारी। जयति शरण संकट टलकारी॥
३. जयति काल भैरव विकराला। जयति नाथ रक्षक जग काला॥
४. तुम हो शिव के रूप अनूपा। अद्भुत तेज अखंड स्वरूपा॥
५. शिव के क्रोध अनल से जन्मे। महिमा अमित गाई सब जन में॥
६. जब-जब विपत भक्त पर आई। तब-तब तुम ही भये सहाई॥
७. संकट हरण मंगल के दाता। तुम ही जग के भाग्य विधाता॥
८. रूप चतुर्भुज अति मनभावन। त्रिशूल डमरू कर सोहावन॥
९. वाहन श्वान अतिहि छवि न्यारी। तुम हो भक्तन के हितकारी॥
१०. मुंडमाल गल सोहे सुंदर। भस्म अंग लेपन मनहर॥
११. कानन कुंडल झलकत न्यारे। नयन विशाल लाल चमकारे॥
१२. जटा मुकुट सिर सोहे नीका। भाल विराजत तिलक सुटीका॥
१३. तुम हो रक्षक काशी पुरी के। संकट हरत भक्त जन जी के॥
१४. काशी के कोतवाल कहाओ। पापी जन को मार भगाओ॥
१५. बटुक रूप धरि लीला कीन्हा। भक्तन को आनंद रस दीन्हा॥
१६. काल भैरव बन काल डराओ। दुष्ट दलन करि कीर्ति कमाओ॥
१७. भूत प्रेत पिशाच सब भागें। तुमरो नाम सुनत भय जागें॥
१८. डाकिनी शाकिनी भागि पलावे। जो जन तुमरो ध्यान लगावे॥
१९. रोग शोक सब मिटत हारी। जो ध्यावे तुमको नर नारी॥
२०. दरिद्र मिटे सुख संपत्ति आवे। जो जन तुमरो जस नित गावे॥
२१. कारागार बंध जो होई। तुमरो नाम जपे सुख होई॥
२२. शत्रु पराजित हो सब जाहीं। तुमरे बल की समता नाहीं॥
२३. जय जय जय भैरव अविनाशी। करहु कृपा घट-घट के वासी॥
२४. तुम हो दीन दयाल कृपाला। राखहु लाज जन की जगपाला॥
२५. जो जन पाठ करे चालीसा। तापर कृपा करहिं गौरीशा॥
२६. नित प्रति पाठ करे जो कोई। ताको कष्ट कबहूँ न होई॥
२७. धूप दीप दे भोग लगावे। सो नर मनवांछित फल पावे॥
२८. रवि अथवा मंगल को गावे। जनम-जनम के पाप बहावे॥
२९. श्रद्धा सहित पढ़े जो ज्ञानी। ताकी महिमा वेद बखानी॥
३०. तुम हो देव परम सुखदाता। विघ्न हरण मंगल के कर्ता॥
३१. जय भैरव जय जय जगदीशा। राखहु लाज दास की ईशा॥
३२. तुमरे शरण रहूँ दिन राती। तुम ही मेरे मात और पितु पित्राती॥
३३. संकट हरहु नाथ मम भारी। राखहु लाज शरण हूँ तुम्हारी॥
३४. जय जय भैरव देव अनंता। तुमरे भजन करत सब संता॥
३५. महिमा अमित तुम्हारी स्वामी। तुम हो सबके अंतर्यामी॥
३६. करहु कृपा अब मोपर देवा। नित उठि करूँ तुम्हारी सेवा॥
३७. तुमरो नाम जपे जो कोई। ताको दुःख कबहूँ न होई॥
३८. जय जय भैरव संकट हारी। जयति जयति काशी अधिकारी॥
३९. यह चालीसा जो जन गावे। सो नर परम पदवी पावे॥
४०. 'भक्त' शरण में आया तुम्हारी। राखहु लाज संकट हारी॥

॥ दोहा ॥

भैरव संकट हरण अति, मंगल मोद निधान।
जो ध्यावे सो पावे सुख, राखहु मोरी आन॥
करहु कृपा भैरव सतत, दीजै ज्ञान प्रकाश।
रहूँ शरण मैं आपकी, पूरण कीजै आस॥


🪔 श्री कालभैरव जी की आरती 🪔

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
जय काली के लाला, संकट हरन देवा॥ जय भैरव...

तुम हो काशी के कोतवाल, महिमा अति भारी।
दुष्ट दलन जगपालक, शिव के अवतारी॥ जय भैरव...

त्रिशूल डमरू सोहे, कर में अति सुंदर।
वाहन श्वान विराजे, अद्भुत रूप धर॥ जय भैरव...

भूत-पिशाच न आवें, जहाँ तुम्हारा वास।
शत्रु भय सब भागे, मिटे कष्ट और त्रास॥ जय भैरव...

बटुक रूप सुखकारी, काल रूप विकराल।
शरण पड़े जो तेरी, राखो दीन दयाल॥ जय भैरव...

धूप-दीप नैवेद्य से, जो आरती गावे।
कहे 'भक्त' मनवांछित, सुख-संपत्ति पावे॥ जय भैरव...

श्लोकवार विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं दार्शनिक व्याख्या

भैरव चालीसा के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए यहाँ प्रत्येक चौपाई का सरल हिंदी भावार्थ प्रस्तुत है:

  • चौपाई १-२: माता काली के प्रिय पुत्र और काशी के रक्षक भैरव देव की जय हो। भय का नाश करने वाले और शरण में आए भक्तों के संकट टालने वाले बटुक भैरव की जय हो।
  • चौपाई ३-४: काल के समान विकराल रूप वाले और संपूर्ण जगत की रक्षा करने वाले कालभैरव की जय हो। आप भगवान शिव के ही अत्यंत अनुपम और अखंड तेजस्वी रूप हैं।
  • चौपाई ५-६: आपका जन्म शिव के क्रोध रूपी अग्नि से हुआ है, जिसकी महिमा संसार गाता है। जब भी भक्तों पर विपत्ति आती है, आप सदैव उनकी सहायता करते हैं।
  • चौपाई ७-८: आप संकटों को हरने वाले और मंगल प्रदान करने वाले हैं। आपके चार हाथों में त्रिशूल और डमरू सुशोभित हैं, जो भक्तों के मन को मोह लेता है।
  • चौपाई ९-१०: आपका वाहन श्वान (कुत्ता) है, जिसकी छवि अत्यंत सुंदर है। आपके गले में मुंडों की माला और शरीर पर भस्म का लेपन अत्यंत मनमोहक लगता है।

  • चौपाई ११-१२: आपके कानों में कुंडल चमक रहे हैं और बड़ी-बड़ी लाल आँखें तेज बिखेर रही हैं। आपके सिर पर जटा मुकुट और मस्तक पर सुंदर तिलक सुशोभित है।
  • चौपाई १३-१४: आप काशी नगरी के रक्षक और कोतवाल हैं, जो भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं और पापियों को वहाँ से भगा देते हैं।
  • चौपाई १५-१६: आपने बटुक रूप धारण कर अनेक लीलाएं कीं और भक्तों को आनंद दिया। वहीं कालभैरव रूप में आपने काल को भी डराया और दुष्टों का संहार किया।
  • चौपाई १७-१८: आपका नाम सुनते ही भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी और शाकिनी जैसी नकारात्मक शक्तियां भयभीत होकर भाग जाती हैं।
  • चौपाई १९-२०: जो भी स्त्री-पुरुष आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी रोग, शोक और दरिद्रता दूर हो जाती है और उन्हें सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

  • चौपाई २१-२२: यदि कोई व्यक्ति कारागार (जेल) में बंद हो, तो आपका नाम जपने से वह मुक्त हो जाता है। आपके बल के समान संसार में कोई दूसरा नहीं है, जिससे शत्रु पराजित हो जाते हैं।
  • चौपाई २३-२४: हे अविनाशी भैरव देव! आप घट-घट के वासी हैं, मुझ पर कृपा करें। आप दीनों पर दया करने वाले हैं, मेरी लाज रखिए।
  • चौपाई २५-२६: जो मनुष्य इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर माता पार्वती और भगवान शिव की विशेष कृपा होती है और उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता।
  • चौपाई २७-२८: जो धूप-दीप अर्पित कर भोग लगाता है और रविवार या मंगलवार को इस चालीसा का पाठ करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • चौपाई २९-३०: जो ज्ञानी जन श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ते हैं, उनकी महिमा वेद भी गाते हैं। आप परम सुख देने वाले और सभी विघ्नों को हरने वाले देव हैं।

  • चौपाई ३१-३२: हे जगदीश्वर भैरव! अपने इस दास की लाज रखिए। मैं दिन-रात आपकी शरण में हूँ, आप ही मेरे माता-पिता और बंधु हैं।
  • चौपाई ३३-३४: हे नाथ! मेरे भारी संकटों को दूर करें। सभी संत और साधक आपकी अनंत महिमा का गान करते हैं।
  • चौपाई ३५-३६: हे अंतर्यामी स्वामी! आपकी महिमा अपरंपार है। मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं नित्य उठकर आपकी सेवा-आराधना कर सकूँ।
  • चौपाई ३७-३८: आपका नाम जपने वाले को कभी कोई दुःख नहीं होता। हे संकट हारी, काशी के स्वामी! आपकी सदा ही जय हो।
  • चौपाई ३९-४०: जो भी मनुष्य इस चालीसा का नित्य गान करता है, वह परम पद को प्राप्त करता है। हे भैरव देव! मैं आपकी शरण में हूँ, मेरे संकटों का नाश करें।

सम्पूर्ण पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

भैरव चालीसा का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में एक निश्चित विधि और नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य है:

  • शुभ दिन एवं समय: भैरव चालीसा का पाठ करने के लिए रविवार और मंगलवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त कालाष्टमी और भैरव जयंती पर किया गया पाठ अत्यंत फलदायी होता है। पाठ का उत्तम समय रात्रि काल या संध्याकाल है।
  • दिशा एवं आसन: पाठ करते समय साधक का मुख दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। बैठने के लिए कुशा या लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
  • दीपक एवं पूजन सामग्री: भगवान भैरव के सम्मुख सरसों के तेल का चौमुखी दीपक प्रज्वलित करें। उन्हें लाल चंदन, लाल फूल, और भोग में गुड़, चने या उड़द की दाल से बने बड़े अर्पित करें।
  • संकल्प: पाठ प्रारंभ करने से पूर्व हाथ में जल लेकर अपनी मनोकामना कहें और संकल्प लें। इसके बाद शांत चित्त से चालीसा का पाठ करें।
  • विशेष नियम: भैरव साधना के दौरान तामसिक भोजन (मांस, मदिरा) से पूर्णतः दूर रहें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। श्वान (कुत्ते) को भैरव जी का वाहन माना जाता है, इसलिए पाठ के बाद काले कुत्ते को रोटी या बिस्कुट अवश्य खिलाएं।

सम्पूर्ण फलश्रुति, धार्मिक लाभ एवं प्रभाव

नियमित रूप से श्री भैरव चालीसा का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. भय और तनाव से मुक्ति: यदि आपको अज्ञात भय, बुरे सपने या मानसिक तनाव रहता है, तो इस चालीसा के प्रभाव से मन शांत और निर्भय हो जाता है।
  2. शत्रु और तंत्र बाधा का नाश: भैरव देव अपने भक्तों के शत्रुओं का स्वतः शमन कर देते हैं। किसी भी प्रकार की नजर दोष, टोना-टोटका या नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश नहीं कर पाती।
  3. ग्रह दोषों से शांति: कुंडली में राहु, केतु और शनि के अशुभ प्रभाव को शांत करने के लिए भैरव चालीसा का पाठ अचूक उपाय है।
  4. मुकदमे और कोर्ट-कचहरी में विजय: यदि आप किसी झूठे मुकदमे या विवाद में फंसे हैं, तो रविवार के दिन किया गया पाठ आपको न्याय दिलाता है।
  5. आरोग्य और दीर्घायु: गंभीर रोगों से पीड़ित जातकों को बटुक भैरव का ध्यान करने से स्वास्थ्य लाभ और अकाल मृत्यु से सुरक्षा मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हाँ, महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ श्री भैरव चालीसा का पाठ कर सकती हैं। विशेषकर बटुक भैरव (जो कि भैरव जी का बाल रूप हैं) की पूजा महिलाओं के लिए अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी मानी गई है।

भैरव जी की पूजा सामान्यतः संध्याकाल या रात्रि के समय (विशेषकर प्रदोष काल में) करना सबसे अधिक प्रभावशाली माना जाता है। सुबह के समय भी शुद्ध होकर पाठ किया जा सकता है।

हाँ, श्वान (कुत्ता) भगवान भैरव का वाहन है। भैरव पूजा की पूर्णता तभी मानी जाती है जब आप किसी काले या सामान्य कुत्ते को दूध, रोटी या मीठी रोटी खिलाते हैं। इससे राहु-केतु के दोष भी दूर होते हैं।

नहीं, भैरव देव के दो मुख्य रूप पूजे जाते हैं। 'कालभैरव' उनका उग्र और न्यायप्रिय रूप है, जबकि 'बटुक भैरव' उनका अत्यंत सौम्य, बाल रूप है जो भक्तों को शीघ्र आनंद और सुरक्षा प्रदान करता है। गृहस्थ जीवन वाले लोगों को बटुक भैरव की आराधना अधिक करनी चाहिए।

पाठ के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष या अहित की भावना न रखें। तामसिक भोजन, मदिरापान और अनैतिक कार्यों से पूरी तरह दूर रहें। साधना काल में स्वच्छता और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 01 Oct 2026

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