"प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो" भक्ति काल के महान कवि, अष्टछाप के शिरोमणि संत सूरदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत भावपूर्ण, विनय और आत्म-समर्पण से ओत-प्रोत पद है। यह भजन वैष्णव भक्ति परंपरा में 'विनय के पद' के अंतर्गत आता है, जिसमें भक्त अपने समस्त पापों, त्रुटियों और दुर्गुणों को स्वीकार करते हुए भगवान श्री कृष्ण के समक्ष पूर्ण रूप से शरणागत हो जाता है। इस भजन का मुख्य स्वर 'करुणा' और 'समर्पण' का है। यहाँ भक्त अपनी पात्रता के बल पर नहीं, बल्कि ईश्वर के 'समदर्शी' और 'पतित-पावन' स्वभाव के भरोसे मुक्ति की याचना करता है। यह पद हमें सिखाता है कि जब जीव अपने अहंकार को त्यागकर अपनी कमियों को स्वीकार कर लेता है, तब परमात्मा की असीम कृपा का द्वार उसके लिए खुल जाता है। विभिन्न सत्संगों, शास्त्रीय संगीत की सभाओं और दैनिक प्रार्थनाओं में इस भजन का गायन मन को परम शांति और ईश्वर के प्रति अनन्य विश्वास से भर देता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो।
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करो ॥
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परो।
सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो ॥
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो...
एक नदिया एक नाल कहावत, मैलो नीर भरो।
जब मिलिके दोऊ एक बरन भये, सुरसरी नाम परो ॥
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो...
एक जीव एक ब्रह्म कहावत, सूर श्याम झगरो।
अब की बेर मोहि पार उतारो, नहिं पन जात टरो ॥
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
संत सूरदास जी महाराज इस पद में भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! आप मेरे अवगुणों (दोषों और पापों) को अपने हृदय में स्थान मत दीजिए, अर्थात् उन पर ध्यान मत दीजिए। आपका एक नाम 'समदर्शी' भी है, जो सबको एक समान दृष्टि से देखता है। यदि आप चाहें, तो अपनी इसी समदर्शी दृष्टि से मेरा उद्धार कर सकते हैं, मुझे इस संसार रूपी भवसागर से पार उतार सकते हैं।
सूरदास जी अपनी बात को सिद्ध करने के लिए अत्यंत सुंदर और व्यावहारिक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि लोहा तो लोहा ही है; एक लोहा वह है जिसका उपयोग देव-पूजन में किया जाता है, और दूसरा लोहा वह है जो कसाई (बधिक) के घर में हिंसा के काम आता है। लेकिन पारस पत्थर इस भेदभाव या दुविधा को नहीं देखता। वह जैसे ही दोनों प्रकार के लोहे को स्पर्श करता है, दोनों को ही समान रूप से शुद्ध और बहुमूल्य स्वर्ण (कंचन) में परिवर्तित कर देता है। पारस लोहे के पिछले कर्म या उसकी स्थिति पर विचार नहीं करता।
दूसरा उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि एक तो पवित्र नदी (जैसे गंगा) है और दूसरा गंदा नाला है जिसमें मलिन जल भरा हुआ है। परंतु जब ये दोनों आपस में मिल जाते हैं, तो नाले का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और वह भी गंगाजल के समान पवित्र होकर 'सुरसरी' (देवताओं की नदी अर्थात् गंगा) के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार, हे प्रभु! मैं चाहे कितना भी मलिन क्यों न हूँ, जब मैं आपकी शरण में आ जाऊँगा, तो मैं भी पवित्र हो जाऊँगा।
अंत में सूरदास जी कहते हैं कि यह जीव और ब्रह्म का संबंध भी ऐसा ही है। लोग इन्हें अलग-अलग कहते हैं, लेकिन वास्तव में जीव ईश्वर का ही अंश है। अब सूरदास और उनके आराध्य श्यामसुंदर के बीच यही द्वंद्व या झगड़ा है कि प्रभु इस बार उनका उद्धार करते हैं या नहीं। वे प्रार्थना करते हैं कि हे श्याम! इस बार मुझे इस संसार-चक्र से पार उतार दीजिए, अन्यथा आपकी प्रतिज्ञा (पतितों का उद्धार करने का प्रण) झूठी पड़ जाएगी।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन और विशिष्टाद्वैत या शुद्धाद्वैत वेदांत के सिद्धांतों का संगीतमय निरूपण है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- अनन्य शरणागति: इस पद में भक्त अपने पुरुषार्थ या सत्कर्मों का दावा नहीं करता। वह पूरी तरह से भगवान की दया और उनके स्वभाव पर निर्भर है।
- समदर्शिता का सिद्धांत: भगवान किसी भी जीव में जाति, कर्म या स्थिति के आधार पर भेद नहीं करते। उनके लिए सभी जीव समान हैं।
- अहंकार का विसर्जन: सूरदास जी स्वयं को अवगुणी मानकर अपने अहंकार को पूरी तरह नष्ट कर देते हैं। अध्यात्म में प्रगति के लिए यह पहली सीढ़ी है।
- दृष्टांतों का सटीक प्रयोग: पारस-लोहा और नदी-नाले के उदाहरणों के माध्यम से अत्यंत गूढ़ दार्शनिक सत्यों को बहुत ही सरल भाषा में समझाया गया है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए किसी विशेष बंधन की आवश्यकता नहीं है, परंतु साधना की दृष्टि से निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी जाती है:
- प्रातः काल की प्रार्थना: सुबह के समय शांत चित्त से इस भजन का गायन या श्रवण करने से मन में विनम्रता और सकारात्मकता का संचार होता है।
- संध्या आरती के बाद: शाम को मंदिर या घर के पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित कर इस पद को गाने से दिनभर के मानसिक तनाव और विकारों से मुक्ति मिलती है।
- सत्संग और कीर्तन: सामूहिक रूप से हरि संकीर्तन या सत्संग के दौरान इस भजन को गाने से सामूहिक चेतना का विकास होता है और भक्ति भाव सघन होता है।
- गायन की विधि: इसे राग भैरवी या बिलावल में अत्यंत शांत और करुण भाव से गाया जाना चाहिए। वाद्य यंत्रों में हारमोनियम, तानपुरा और तबले का धीमा प्रयोग इसके भाव को और अधिक गहरा बनाता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण (श्यामसुंदर) को समर्पित है। भगवान कृष्ण को शास्त्रों में 'पतित-पावन' और 'करुणा-सिंधु' कहा गया है, जो अपने शरणागत भक्तों के सभी पापों को हर लेते हैं।
इसकी रचना महान संत सूरदास जी ने की थी। सूरदास जी अष्टछाप के प्रमुख कवि थे और उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन श्री कृष्ण की लीलाओं के गान में समर्पित कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के संपर्क में आने के बाद सूरदास जी की भक्ति में सख्य और माधुर्य भाव का समावेश हुआ, परंतु उनके प्रारंभिक पदों में विनय और दीनता का यह अद्भुत भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
एक प्रसिद्ध जनश्रुति के अनुसार, जब सूरदास जी युवावस्था में थे और अभी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से उनकी भेंट नहीं हुई थी, तब वे गऊघाट पर रहकर दीनता के पद गाया करते थे। एक बार उनके मन में अपनी अंधता और सांसारिक उपेक्षा के कारण गहरा दुःख हुआ। उन्होंने महसूस किया कि वे अनेक अवगुणों से भरे हुए हैं। इसी आत्म-मंथन और व्याकुलता की स्थिति में उन्होंने इस पद की रचना की थी।
जब उन्होंने यह पद गाया, तो उन्हें साक्षात भगवान की समदर्शी सत्ता का अनुभव हुआ। यह पद इस बात का प्रमाण है कि भगवान बाह्य आचरण या शारीरिक पूर्णता को नहीं देखते, वे केवल हृदय के शुद्ध भाव और समर्पण को देखते हैं।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा शुद्ध 'ब्रजभाषा' है, जो अपनी मधुरता और कोमलता के लिए जानी जाती है। सूरदास जी ने इस पद में गेय शैली (गाने योग्य) का प्रयोग किया है।
काव्यशास्त्र की दृष्टि से इसमें 'विनयोक्ति' और 'दृष्टांत अलंकार' का उत्कृष्ट समन्वय है। 'लोहा और पारस' तथा 'नदी और नाला' के दृष्टांत इतने सजीव हैं कि वे सीधे पाठक या श्रोता के हृदय में उतर जाते हैं। पद में शांत रस और करुण रस का सुंदर परिपाक हुआ है, जो भक्त को अंतर्मुखी होने के लिए प्रेरित करता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह कालजयी रचना हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाती है:
- स्वीकारोक्ति का साहस: अपनी गलतियों और अवगुणों को स्वीकार करना ही सुधार की दिशा में पहला कदम है। जब हम ईश्वर के सामने अपनी कमियों को स्वीकार करते हैं, तो हमारा अहंकार पिघल जाता है।
- समानता का दृष्टिकोण: जैसे पारस और गंगा किसी में भेद नहीं करते, वैसे ही हमें भी समाज में ऊंच-नीच, अमीर-गरीब या जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए।
- संगति का प्रभाव: गंदा नाला भी जब गंगा में मिलता है तो गंगा बन जाता है। इसी प्रकार, यदि हम सत्संग और संतों की संगति करेंगे, तो हमारे दुर्गुण भी सद्गुणों में बदल जाएंगे।
- पूर्ण विश्वास: ईश्वर की कृपा पर अटूट विश्वास रखना चाहिए। वे हमारे भूतकाल को नहीं, बल्कि वर्तमान के समर्पण को देखते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| अवगुण | दोष, बुराइयाँ, पाप | जीव के सांसारिक विकार और त्रुटियाँ। |
| चित ना धरो | हृदय में न रखना, ध्यान न देना | भगवान से प्रार्थना कि वे हमारे पापों का हिसाब न रखें। |
| समदर्शी | सबको समान रूप से देखने वाला | परमात्मा का वह स्वरूप जो बिना किसी भेदभाव के सब पर कृपा करता है। |
| बधिक | कसाई, वध करने वाला | संसार के तामसिक और पापी जीवों का प्रतीक। |
| कंचन | सोना (स्वर्ण) | परम पवित्र और शुद्ध आत्म-स्वरूप। |
| सुरसरी | सुर-सरिता (गंगा नदी) | परम पावन भगवद-भक्ति या ईश्वरीय सत्ता। |
| पन | प्रण, प्रतिज्ञा | भगवान का वह संकल्प जिसमें वे भक्तों के उद्धार का वचन देते हैं। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
पंक्ति 1: "प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो। समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो तो पार करो ॥"
व्याख्या: हे प्रभु, मेरे भीतर अनंत दोष हैं, आप उन्हें अपने मन में मत लाइए। आपका नाम 'समदर्शी' है, आप सभी को एक समान देखते हैं। यदि आप अपनी इस महिमा को बनाए रखना चाहते हैं, तो मेरा भी उद्धार कर दीजिए।
पंक्ति 2: "एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परो। सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो ॥"
व्याख्या: एक लोहा मंदिर में पूजा के काम आता है और दूसरा कसाई के घर में हिंसा के लिए रखा होता है। परंतु पारस पत्थर इन दोनों के बीच कोई अंतर नहीं करता; वह दोनों को छूकर शुद्ध सोना बना देता है। इसी प्रकार आप भी मेरे पापों को न देखकर मुझे अपनी शरण प्रदान करें।
पंक्ति 3: "एक नदिया एक नाल कहावत, मैलो नीर भरो। जब मिलिके दोऊ एक बरन भये, सुरसरी नाम परो ॥"
व्याख्या: एक स्वच्छ नदी बहती है और एक गंदे पानी का नाला बहता है। परंतु जब दोनों आपस में मिलकर एक हो जाते हैं, तो नाला भी गंगा (सुरसरी) का रूप ले लेता है। आपकी शरण में आकर मैं भी पवित्र हो जाऊँगा।
पंक्ति 4: "एक जीव एक ब्रह्म कहावत, सूर श्याम झगरो। अब की बेर मोहि पार उतारो, नहिं पन जात टरो ॥"
व्याख्या: संसार में जीव और ब्रह्म को अलग-अलग कहा जाता है। सूरदास जी कहते हैं कि हे श्यामसुंदर! अब मेरे और आपके बीच यही विवाद है कि आप मुझे पार उतारते हैं या नहीं। इस बार मुझे अवश्य पार उतारिए, अन्यथा आपका पतित-पावन होने का प्रण टूट जाएगा।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाले कुछ शास्त्रीय मंत्र और श्लोक निम्नलिखित हैं, जिनका पाठ इस भजन के साथ किया जा सकता है:
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥"
(श्रीमद्भगवद्गीता - 18.66)
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो |
| रचयिता / कवि | संत सूरदास जी |
| आराध्य देव | भगवान श्री कृष्ण (श्यामसुंदर) |
| भाषा | ब्रजभाषा |
| काव्य रस | शांत रस, करुण रस (विनय भाव) |
| मुख्य विषय | शरणागति, समदर्शिता, आत्म-निवेदन |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक प्रार्थना, सत्संग, एकादशी, कृष्ण जन्माष्टमी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस पद की व्याख्या और दार्शनिक विश्लेषण को सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, अष्टछाप काव्य परंपरा और वैष्णव दर्शन के आलोक में तैयार किया गया है। सूरदास जी के इस पद का मूल उद्देश्य जीव को भगवान की अहैतुकी कृपा का स्मरण कराना है, जो कि पुष्टि मार्ग का मुख्य सिद्धांत है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- सूरसागर: संत सूरदास जी के पदों का मुख्य संग्रह।
- श्रीमद्भगवद्गीता: भगवान श्री कृष्ण के समदर्शी स्वरूप और शरणागति योग का शास्त्रीय आधार।
- पुष्टिमार्गीय साहित्य: महाप्रयाण और वल्लभ संप्रदाय के प्रामाणिक ग्रंथ।
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