भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना(mere angna me ik baar aa sanwariya nand nandna lyrics in hindi)

मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना भजन के बोल, अर्थ और भक्ति भाव को जानें। श्री कृष्ण के प्रति समर्पण का यह मधुर भजन पढ़ें केवल Bhaktilok पर।

मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना - परिचय एवं भक्ति रस

"मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना" सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मनमोहक, कर्णप्रिय और भाव-विभोर कर देने वाला संकीर्तन भजन है। यह भजन ब्रज के प्राणधन, यशोदा नंदन भगवान श्री कृष्ण के प्रति एक अनन्य भक्त की अगाध आस्था, वात्सल्य भाव, और परम समर्पण को अत्यंत सरल तथा मधुर शब्दों में व्यक्त करता है। सनातन संस्कृति में संकीर्तन और प्रभु के नामों का स्मरण कलियुग में जीवात्मा को भवसागर से पार लगाने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग माना गया है। जब कोई साधक या भक्त अपने इष्ट देव यानी श्री कृष्ण को अपने घर-परिवार, हृदय रूपी अंगना में आमंत्रित करने का भाव रखता है, तो वह केवल एक गीत नहीं गा रहा होता, बल्कि अपने अंतःकरण में भक्ति की त्रिवेणी प्रवाहित कर रहा होता है। इस भजन में गोपियों और ब्रजवासियों के उस निश्चल प्रेम की झलक मिलती है, जो सांसारिक मोह-माया से परे केवल कान्हा की एक झलक पाने के लिए व्याकुल रहता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, भावार्थ, गायन विधि, आध्यात्मिक महत्व और जीवन दर्शन का रसास्वादन करेंगे, ताकि आप भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में और अधिक गहराई से उतर सकें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मोहे कृष्णा दरस दिखा, सांवरिया नंद नंदना।
मेरे अंगना में इक बार आ, सांवरिया नंद नंदना।

मेरे अंगना में इक बार आ, सांवरिया नंद नंदना।
मोहे कृष्णा दरस दिखा, सांवरिया नंद नंदना।।

कारी कमरिया ला दूंगी मैं।
मोर मुकट मंगवा दूंगी मैं।
पीला पटका दूंगी रंगवा।
सांवरिया नंद नंदना...

ला दूंगी हरे बांस की पोरी।
ला दूंगी नुपुर की जोड़ी।।
मेरे अंगना में रास रचा।
सांवरिया नंद नंदना...

मेरे घर कोई कमी नहीं है।
माखन मिशरी दूध दही है।
पेड़े बरफी दूंगी मंगवा।
सांवरिया नंद नंदना...

राधा को संग लेते आनां।
मैं नाचूं तुम मुरली बजाना।।
मेरा मन ‘मधुप’ दे रिझा।
सांवरिया नंद नंदना...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह एक भक्त की गहरी पुकार है जो भगवान कृष्ण को अपने जीवन और हृदय के आंगन में पधारने का निमंत्रण दे रही है। भजन की शुरुआत इस विनती के साथ होती है कि हे नंदकुमार, हे सांवरिया! मेरे इस सूने अंगने में एक बार अवश्य पधारो और मुझे अपने अलौकिक दर्शन से कृतार्थ करो। भक्त अपने आराध्य के स्वागत के लिए अपनी समस्त भौतिक और भावनात्मक संपदा अर्पित करने को तैयार बैठा है।

अगले चरण में भक्त अत्यंत प्रेम और लाड़ के साथ कहता है कि हे प्रभु! मैं तुम्हारे लिए काले रंग की सुंदर कमरिया (कमल या कंबल) ला दूंगी, तुम्हारे मस्तक पर धारण करने के लिए मोर मुकुट मंगवा दूंगी और कमर में पहनने के लिए सुंदर पीला पटका (वस्त्र) रंगवा कर ले आऊंगी। यह वात्सल्य भाव यशोदा मैया के उस प्रेम की याद दिलाता है जो वे अपने कान्हा को सजाने के लिए करती थीं। भक्त भगवान की सेवा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं छोड़ना चाहता।

भजन के विस्तार में भक्त बांसुरी और घुंघरुओं (नूपुर) की बात करता है। वह कहता है कि मैं हरे बांस की पोरी (जिससे बांसुरी बनती है) और चरणों में पहनने के लिए नूपुर की जोड़ी ला दूंगी। तुम मेरे अंगना में आकर रास रचाओ। इसके पश्चात भक्त संतोष और आतिथ्य का भाव प्रकट करते हुए कहता है कि मेरे घर में किसी भी वस्तु की कोई कमी नहीं है; यहाँ माखन, मिश्री, शुद्ध दूध और दही प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, और तुम्हारे लिए पेड़े व बर्फी भी मंगवा दूंगी। अंत में भक्त अत्यंत मधुर प्रार्थना करता है कि हे कान्हा! अपनी प्रियतमा श्री राधा रानी को भी साथ लेते आना। जब तुम मुरली की तान छेड़ोगे, तो मैं आनंद में नाच उठूंगी और इस प्रकार 'मधुप' (रचनाकार) का यह मन तुम्हारे चरणों में रमकर पूरी तरह तृप्त हो जाएगा।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की मुख्य विशेषता इसकी सरलता, मधुरता और लोक-संगीत जैसी सहज शैली है, जो हर उम्र के भक्त के मन को तुरंत मोह लेती है। इसमें भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप और किशोर स्वरूप दोनों का बहुत ही सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इस भजन का आध्यात्मिक महत्व इस बात में निहित है कि यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के प्रेम संबंध को मजबूत करता है। इसे गाते या सुनते समय मन में सात्विक भाव उत्पन्न होते हैं और सांसारिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है। नियमित रूप से ऐसे भजनों का संकीर्तन करने से घर का वातावरण पवित्र होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि आप भगवान कृष्ण की अन्य लीलाओं और स्तुतियों से जुड़ना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण चालीसा का पाठ भी अवश्य करें, जो आपके भक्ति भाव को और अधिक प्रगाढ़ करेगा।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन गायन के लिए कोई कठोर नियम नहीं बंधे हैं, क्योंकि भक्ति केवल भाव की भूखी होती है। तथापि, इस प्रकार के मधुर संकीर्तन को सुबह की बेला में पूजा के समय, संध्या वंदन के बाद, अथवा किसी भी पारिवारिक सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी और गोवर्धन पूजा के पावन अवसरों पर गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसे हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा या तालियों की गड़गड़ाहट के साथ समूह में गाना सबसे आनंददायक होता है। जब परिवार के सभी सदस्य मिलकर एक सुर में सांवरिया नंद नंदना का गान करते हैं, तो घर का प्रत्येक कोना वृंदावन जैसा पावन बन जाता है। संध्याकालीन आरती के पश्चात इस भजन का गायन मानसिक शांति और परमानंद की प्राप्ति कराता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के राजा, पूर्णावतारी भगवान श्री कृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति श्री राधा रानी हैं। श्री कृष्ण को 'नंद नंदना' (नंद बाबा के नंदन) के रूप में संबोधित किया गया है, जो उनके पालक पिता नंद बाबा के साथ उनके मधुर वात्सल्य संबंधों को दर्शाता है। इस भजन की रचना 'मधुप' नामक रचनाकार द्वारा की गई है, जिन्होंने अपनी इस सुंदर रचना के माध्यम से भगवान कृष्ण के प्रति अपनी अनन्य निष्ठा और समर्पण को अमर कर दिया है। संत परंपरा में भगवान के साथ सखा, पुत्र या प्रियतम का संबंध जोड़कर भक्ति करने को माधुर्य और वात्सल्य भक्ति कहा गया है, जिसका यह भजन एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-साहित्य और ब्रज संस्कृति की गहरी छाप के साथ हुई है। लोक भजनों की श्रेणी में आने वाले ऐसे गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक और लिखित रूप से आगे बढ़ते रहे हैं। रचनाकार 'मधुप' जी ने इसमें ब्रजभाषा के शब्दों और ग्रामीण परिवेश की सहज सरलता का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है। जिस प्रकार एक ग्रामीण या साधारण गृहणी अपने घर में मेहमान या अपने प्रियतम का स्वागत करने के लिए व्याकुल रहती है, ठीक उसी भाव को यहाँ भक्त ने अपने आराध्य श्री कृष्ण के लिए प्रकट किया है। यह पृष्ठभूमि दर्शाती है कि ईश्वर से जुड़ने के लिए बड़े-बड़े ग्रंथों की नहीं, बल्कि एक सच्चे और निर्मल हृदय की आवश्यकता होती है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी, ब्रजभाषा और लोक-बोली का एक अत्यंत सुंदर मिश्रण है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'अंगना', 'सांवरिया', 'कारी कमरिया', 'मोर मुकट', 'बांस की पोरी' और 'नूपुर' ब्रज संस्कृति की सुगंध को बिखेरते हैं। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक आख्यानात्मक और रागात्मक गीत है जिसमें अनुप्रास और यमक अलंकारों की स्वाभाविक छटा देखने को मिलती है। शब्दों का चयन इतना कोमल और लयबद्ध है कि इसे बिना किसी संगीत यंत्र के भी केवल ताल के साथ आसानी से गाया जा सकता है। यह शैली श्रोताओं को सीधे तौर पर अपने साथ जोड़ लेती है और मन में कान्हा के बाल रूप की सुंदर छवि अंकित कर देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी व्यस्तता क्यों न हो, ईश्वर के स्मरण के लिए समय अवश्य निकालना चाहिए। जिस प्रकार भक्त अपने घर में भगवान के स्वागत के लिए सबसे अच्छी चीजें (माखन, मिश्री, सुंदर वस्त्र) समर्पित करने की भावना रखता है, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन की सर्वोत्तम ऊर्जा और कर्म भगवान के चरणों में अर्पित करने चाहिए। अहंकार और भौतिकता से दूर होकर जब मनुष्य एक छोटे बच्चे की तरह निश्चल भाव से प्रभु को पुकारता है, तो भगवान खिंचे चले आते हैं। इसके अलावा, जीवन में प्रेम, सौहार्द, और उत्सव मनाने की संस्कृति को जीवित रखना ही सच्ची मानवता है। यदि आप सनातन धर्म के अन्य प्रेरक संदेशों और भजनों को पढ़ना चाहते हैं, तो गीता सार का अध्ययन भी कर सकते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ संदರ್ಭ / प्रसंग
सांवरिया सांवले रंग वाले भगवान श्री कृष्ण श्री कृष्ण का सुंदर और मनमोहक रूप
नंद नंदना नंद बाबा के पुत्र (श्री कृष्ण) पालक पिता नंद बाबा के संदर्भ में
अंगना घर का आंगन भक्त का हृदय रूपी घर या आंगन
कारी कमरिया काले रंग का कंबल या चादर ग्वाल बालों की वेशभूषा का प्रतीक
मोर मुकट मोर पंखों से बना मुकुट श्री कृष्ण का प्रसिद्ध मुकुट
पटका कमर में बांधने वाला वस्त्र / दुपट्टा वस्त्र सज्जा
बांस की पोरी बांस का टुकड़ा (जिससे मुरली बनती है) श्री कृष्ण की बांसुरी
नूपुर घुंघरू या पायल चरणों में पहनने वाला आभूषण
मधुप भजन के रचनाकार / कवि भजन के अंतिम पद में रचनाकार की मुद्रा

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"मोहे कृष्णा दरस दिखा, सांवरिया नंद नंदना। मेरे अंगना में इक बार आ..."
यहाँ भक्त विनय कर रहा है कि हे नंदलाल! मुझे केवल अपने दर्शन करा दो। मेरा यह जीवन और मेरा यह आंगन तुम्हारे बिना सूना है, तुम एक बार मेरे पास आकर मेरे जीवन को धन्य कर दो।

"कारी कमरिया ला दूंगी मैं। मोर मुकट मंगवा दूंगी मैं। पीला पटका दूंगी रंगवा..."
इस पंक्ति में भक्त अपनी ममता और सेवा-भाव को प्रदर्शित कर रहा है। वह कहती है कि हे प्रभु! तुम्हारे श्रृंगार के लिए काली कमरिया, मोर मुकुट और सुंदर रंगा हुआ पीला पटका मैं स्वयं अपने हाथों से व्यवस्था करके ला दूंगी।

"ला दूंगी हरे बांस की पोरी। ला दूंगी नुपुर की जोड़ी।। मेरे अंगना में रास रचा।"
भक्त कहता है कि मैं बांसुरी के लिए बांस का टुकड़ा और पैरों के लिए घुंघरू ले आऊंगी। तुम बस मेरे इस आंगन में आकर अपनी दिव्य रासलीला का आनंद दिखाओ।

"मेरे घर कोई कमी नहीं है। माखन मिशरी दूध दही है। पेड़े बरफी दूंगी मंगवा..."
भक्त आश्वस्त करता है कि मेरे घर में आतिथ्य सत्कार के लिए किसी वस्तु का अभाव नहीं है। तुम्हारे प्रिय माखन-मिश्री, दूध-दही और मिठाइयों का पूरा प्रबंध है।

"राधा को संग लेते आनां। मैं नाचूं तुम मुरली बजाना।। मेरा मन ‘मधुप’ दे रिझा।"
अंतिम पंक्ति में भक्त अपनी पराकाष्ठा का प्रेम प्रकट करते हुए कहता है कि जब तुम राधा रानी के साथ आओगे और अपनी मुरली की तान छेड़ोगे, तो मैं आनंद में झूम उठूंगी। इस प्रकार कवि 'मधुप' का मन तुम्हारे इस सुंदर स्वरूप से पूरी तरह तृप्त और आनंदित हो जाएगा।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

कृष्ाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

अर्थात: वासुदेव पुत्र, सभी के दुखों को हरने वाले, परम परमात्मा श्री कृष्ण को बारंबार नमस्कार है, जो हमारे समस्त क्लेशों का नाश करने वाले हैं। ऐसे गोविंद को हमारा प्रणाम है।

इसके अतिरिक्त भगवान श्री कृष्ण के महामंत्र का स्मरण भी इस भजन के साथ किया जा सकता है:
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥" यह महामंत्र समस्त पापों और संतापों को दूर करने वाला माना गया है। यदि आप भगवान शिव के भजनों या स्तोत्रों से भी जुड़ना चाहते हैं, तो महामृत्युंजय मंत्र के पावन पाठ का भी लाभ ले सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना
आराध्य देव भगवान श्री कृष्ण (नंद नंदना) एवं श्री राधा रानी
रचनाकार 'मधुप' जी
भाषा सरल हिंदी, ब्रजभाषा एवं लोक शैली
मुख्य थीम / भाव वात्सल्य, प्रेम, समर्पण और मिलन की व्याकुलता
गायन के अवसर जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, सत्संग, एकादशी एवं दैनिक पूजा
संगीत विधा पारंपरिक लोक भजन / संकीर्तन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रશ્ન 1: "मेरे अंगना में इक बार आ सांवरिया नंद नंदना" भजन के रचनाकार कौन हैं?

उत्तर: इस पावन भजन के रचनाकार 'मधुप' जी हैं, जिन्होंने अपनी इस रचना में भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और वात्सल्य भाव को बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया है।

प्रश्न 2: इस भजन को किस अवसर पर गाया जा सकता है?

उत्तर: इस भजन को श्री कृष्ण जन्माष्टमी, गोवर्धन पूजा, एकादशी, दैनिक संध्या वंदन, अथवा किसी भी पारिवारिक सत्संग और भजन संध्या के दौरान अत्यंत आनंद के साथ गाया जा सकता है।

प्रश्न 3: भजन में 'नंद नंदना' शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: 'नंद नंदना' का अर्थ है नंद बाबा के पुत्र, अर्थात भगवान श्री कृष्ण। यह उनके बचपन और बाल्यकाल के आत्मीय संबंधों को दर्शाता है।

प्रश्न 4: क्या इस भजन को बिना किसी संगीत यंत्र के गाया जा सकता है?

उत्तर: हाँ, यह एक अत्यंत सरल लोक भजन है जिसे केवल तालियों की थाप और मंजीरे के साथ भी बहुत आसानी और मधुरता से गाया जा सकता है।

प्रश्न 5: इस भजन को गाने से मानसिक शांति कैसे मिलती है?

उत्तर: जब कोई भक्त भगवान श्री कृष्ण के सुंदर स्वरूप, उनकी बांसुरी और उनके प्रेम का स्मरण करते हुए यह भजन गाता है, तो उसका मन सांसारिक चिंताओं से हटकर दिव्यता में लीन हो जाता है, जिससे गहरी मानसिक शांति मिलती है।

प्रश्न 6: क्या इस भजन के माध्यम से बच्चों को भी कृष्ण भक्ति से जोड़ा जा सकता है?

उत्तर: बिल्कुल! इसकी सरल पंक्तियाँ और लयबद्ध रचना बच्चों को बहुत आकर्षित करती है, जिससे वे बहुत आसानी से इसे सीख सकते हैं और धार्मिक संस्कृति से जुड़ सकते हैं।

प्रश्न 7: भजन में राधा रानी का उल्लेख क्यों किया गया है?

उत्तर: सनातन परंपरा में राधा और कृष्ण एक ही प्राण के दो रूप माने गए हैं। कृष्ण की भक्ति राधा रानी के बिना अधूरी मानी जाती है, इसलिए भक्त कान्हा के साथ राधा जी को भी आमंत्रित करता है।

प्रश्न 8: इस भजन के अभ्यास से कौन सा भाव प्रबल होता है?

उत्तर: इस भजन के गायन और श्रवण से मन में समर्पण, वात्सल्य, प्रेम और ईश्वर प्राप्ति की तीव्र उत्कंठा (विरह व मिलन का भाव) प्रबल होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख Bhaktilok.in के उच्च गुणवत्ता मानकों के अनुरूप सनातन धर्म की लोक-भक्ति परंपरा, पारंपरिक संकीर्तन साहित्य और आध्यात्मिक संदेशों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध लिरिक्स, प्रामाणिक भावार्थ और जीवनोपयोगी दार्शनिक दृष्टियों से अवगत कराना है। यह सामग्री पूरी तरह से श्रद्धा और सांस्कृतिक धरोहर पर आधारित है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक ब्रज लोक-साहित्य एवं संकीर्तन संग्रह
  • श्रीमद्भागवत महापुराण (बाल लीला प्रसंग)
  • भक्ति रसामृत सिंधु - श्री रूप गोस्वामी
  • सनातन धर्म की संकीर्तन एवं भजन परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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