Bhaktilok
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ हिन्दी (Dena Ho To Dijiye Janam Janam Ka Sath Hindi Lyrics)" भगवान श्री कृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के बीच के शाश्वत प्रेम, अटूट विश्वास और पूर्ण शरणागति का जीवंत और हृदयस्पर्शी उदाहरण है। सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में ऐसे भजनों का विशेष स्थान है जो जीवात्मा को उसकी मूल परम सत्ता यानी परमात्मा से जोड़ने का माध्यम बनते हैं। इस भजन के प्रत्येक शब्द में साधक की यह व्याकुलता और विनम्र प्रार्थना छिपी है कि सांसारिक सुख-सुविधाओं या ऐश्वर्य की कामना करने के बजाय उसे केवल और केवल हरि का निरंतर सानिध्य और जन्म-जन्मांतर की भक्ति प्राप्त हो। कलयुग के इस भौतिकतावादी युग में जब मन भ्रमित और अशांत रहता है, तब इस प्रकार के भजनों का गान और श्रवण अंतर्मन को शांति, स्थिरता और दिव्यता प्रदान करता है। भजन का मुख्य भाव यही है कि इस नश्वर संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है, यदि कुछ शाश्वत है तो वह है प्रभु के चरणों की प्रीति। साधक जब पूरी तल्लीनता से इसे गाता है, तो उसके भीतर भक्ति रूपी अमृत का संचार होने लगता है और वह सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर भागवद प्रेम में सराबोर हो जाता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, विस्तृत अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि और आध्यात्मिक महत्व का संपूर्ण अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
mukhda (स्थाई):
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ,
जन्मो जनम का साथ, मेरे सिर पर रख दो हाथ।
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ...
antara 1 (अंतरा प्रथम):
दुनिया की मोहब्बत से मेरा दिल ऊब गया है,
तेरे चरणों में मेरा जीवन डूब गया है।
अब इसके सिवा कुछ ना मांगूँ मेरे नाथ,
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ...
antara 2 (अंतरा द्वितीय):
भटक रहा था जग में माया के जाल में,
सुकून नहीं पाया मैंने इस संसार में।
तुमने जो थामा है मेरे जीवन का हाथ,
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ...
antara 3 (अंतरा तृतीय):
सांसों की हर एक डोर पर तेरा ही नाम हो,
सुबह और शाम बस तेरा ही धाम हो।
जीवन नैया पार लगा दो हे जगन्नाथ,
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ...
antara 4 (अंतरा चतुर्थ - समापन):
दास यही मांगे तुझसे विनती बारंबार,
चरणों से लिपटाए रखना भवसागर के पार।
भक्ति का वरदान देना पकड़े रहना हाथ,
देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह एक भक्त की अपने आराध्य के प्रति अनन्य पुकार है। भजन की शुरुआत ही इस महान समर्पण के साथ होती है कि हे प्रभु! यदि आप हमें कुछ देना ही चाहते हैं, तो हमें किसी भौतिक वस्तु, धन, वैभव या सांसारिक सुख के स्थान पर केवल अपना शाश्वत साथ दीजिए। भौतिक संसार में मनुष्य जन्म लेता है और रिश्तों-नातों, मोह-माया तथा झूठे प्रपंचों में उलझकर रह जाता है। इन सभी अस्थायी संबंधों से त्रस्त होकर जब साधक का मन विरक्त होता है, तब वह भगवान के चरणों में शरण लेता है।
अंतरा में भक्त स्पष्ट रूप से कहता है कि उसने दुनिया की स्वार्थी मोहब्बत को भली-भांति देख लिया है, जिससे उसका मन अब ऊब चुका है। अब उसका एकमात्र आश्रय भगवान के चरणकमल हैं, जिनमें उसकी चेतना पूरी तरह डूब चुकी है। सांसारिक प्रलोभन और माया के जाल में भटकते-भटकते जब जीव थक जाता है, तब उसे परम शांति केवल गोविंद की शरण में ही प्राप्त होती है। भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि उसकी सांसों की हर एक डोर पर केवल प्रभु का नाम हो और उसकी जीवन रूपी नौका को पार लगाने वाले एकमात्र खेवैया भगवान श्री कृष्ण ही बनें। यह भावार्थ हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है जिसमें इहलोक और परलोक दोनों में केवल भगवान का स्मरण और उनका सानिध्य ही सर्वोपरि हो। इस प्रकार के भाव से ओत-प्रोत होकर जब कोई साधक श्री कृष्ण स्तोत्र या ऐसे भजनों का पाठ करता है, तो उसका हृदय निर्मल हो जाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- पूर्ण शरणागति (Surrender): यह भजन जीव की ईश्वर के प्रति अगाध निष्ठा और संपूर्ण आत्मसमर्पण को दर्शाता है, जहाँ भक्त अपने अहंकार का त्याग कर प्रभु के हाथों में अपना जीवन सौंप देता है।
- माया से मुक्ति (Freedom from Maya): भजन में स्पष्ट किया गया है कि सांसारिक मोह-माया और प्रपंच केवल दुखों का कारण हैं, और सच्चा सुख केवल भगवान के चरणों में है।
- जन्म-जन्मांतर का अनुबंध (Eternal Bond): साधक की यह कामना कि उसका प्रभु के साथ केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि जन्म-जन्मांतर का अटूट संबंध बना रहे, भारतीय आध्यात्मिक दर्शन की सर्वोच्च अवस्था है।
- मानसिक शांति और संकीर्तन का फल: नित्य इस भजन का गायन या श्रवण करने से मन के विकारों का नाश होता है और साधक को अगाध मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत की कोई सख्त सीमाएं नहीं होतीं, परंतु सनातन परंपरा में कुछ विशेष समय और नियमों का पालन करने से साधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस भजन को प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में पूजा के समय या संध्याकालीन आरती के पश्चात गाना सबसे उत्तम माना जाता है।
गायव या श्रवण करते समय अपने इष्टदेव श्री कृष्ण या विष्णु जी की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें। मन को शांत रखें और प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें। यदि आप इसे सामूहिक सत्संग, एकादशी व्रत या किसी धार्मिक उत्सव के दौरान गाते हैं, तो इसका वातावरण पर अत्यंत सकारात्मक और दिव्य प्रभाव पड़ता है। संध्या के समय ओम जय जगदीश आरती के उपरान्त इस भजन को गाना विशेष रूप से आनंददायक होता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से जगत के पालनहार भगवान श्री कृष्ण, बांके बिहारी और द्वारकाधीश को समर्पित है। सनातन धर्म में कृष्ण भक्ति धारा का इतिहास अत्यंत समृद्ध है जिसमें सूरदास, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु और तुलसीदास जैसे महान संतों ने भगवान के साथ इस प्रकार के व्यक्तिगत और गाढ़े प्रेम संबंध को अपनी रचनाओं में पिरोया है। जब भक्त भगवान को अपना नाथ, अपना सखा और अपना सर्वस्व मान लेता है, तब भगवान भी भक्त के अधीन हो जाते हैं जैसा कि श्रीमद्भागवत और गीता में वर्णित है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन आधुनिक और पारंपरिक भक्ति संगीत के संगम से उपजा एक अत्यंत लोकप्रिय संकीर्तन पद है। इसे लोक संगीत की सुमधुर तर्ज पर रचा गया है ताकि आम जनमानस इसे आसानी से गुनगुना सके। संत परंपरा के अनुसार, इस प्रकार के भजनों का उद्देश्य किसी कठिन शास्त्रार्थ या जटिल दर्शन को समझाना नहीं है, बल्कि सरल हिंदी और ब्रजभाषा के शब्दों के माध्यम से सामान्य व्यक्ति के हृदय में प्रेम और भक्ति की सोई हुई चेतना को जागृत करना है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और प्रवाहमयी हिंदी है जिसमें ठेठ ब्रज और अवधी के लोक-संस्कारों की मिठास भी झलकती है। इसमें रूपक अलंकार और उपमाओं का सुंदर प्रयोग किया गया है जैसे 'जीवन नैया पार लगाना', 'माया के जाल में भटकना' और 'चरणों में जीवन डूब जाना'। यह काव्य शैली इतनी हृदयग्राही है कि बिना किसी संगीत के भी केवल पढ़ने मात्र से आंखें नम और हृदय भावुक हो जाता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें यह महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सीख मिलती है कि मनुष्य को अपने जीवन की असली दौलत भौतिक वस्तुओं को नहीं बल्कि भगवान की भक्ति और उनके पवित्र नाम को बनाना चाहिए। सांसारिक रिश्ते और मोह क्षणिक हैं, जबकि ईश्वर के साथ जुड़ाव ही शाश्वत सत्य है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब व्यक्ति निराश हो जाता है, तब भगवान का स्मरण ही उसे संबल प्रदान करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश (Word) | सरल अर्थ (Simple Meaning) | संदर्भित प्रसंग (Context) |
|---|---|---|
| जनम जनम | जन्म-जन्मांतर, अनेक युगों तक | ईश्वर के साथ शाश्वत संबंध की कामना |
| नाथ | स्वामी, प्रभु, भगवान | भगवान श्री कृष्ण को अपना सर्वस्व मानना |
| माया के जाल | संसार के मोह-माया और प्रपंच | भौतिक जगत के आकर्षण जिसमें जीव फंस जाता है |
| जीवन नैया | जीवन रूपी नाव | इस संसार सागर को पार करने का माध्यम |
| भवसागर | जन्म-मृत्यु का चक्र | दुखों से भरे इस संसार से मुक्ति |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ..."
भक्त कहता है कि हे प्रभु! यदि आप मुझे कुछ प्रदान करना चाहते हैं, तो मुझे केवल अपना शाश्वत साथ दीजिए। यह संबंध किसी एक जन्म तक सीमित न हो, बल्कि हर जन्म में मेरा हाथ आपके हाथों में रहे।
"दुनिया की मोहब्बत से मेरा दिल ऊब गया है..."
संसार के लोगों का प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है। इस नश्वर दुनिया की बनावटी मोहब्बत से मेरा मन अब पूरी तरह विरक्त हो चुका है और अब मेरी सारी प्रीति आपके श्री चरणों में लग गई है।
"सांसों की हर एक डोर पर तेरा ही नाम हो..."
मेरे जीवन की प्रत्येक श्वास आपके पवित्र नाम के स्मरण में बीते। मेरा उठना-बैठना, मेरा जीवन और मरण सब कुछ आपके ही चरणों में समर्पित हो जाए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को पुष्ट करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों के निम्नलिखित श्लोक का स्मरण करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है:
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥"
अर्थात: भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है। इसी प्रकार शिव तांडव स्तोत्र या अन्य स्तोत्रों की तरह ही कृष्ण भक्ति के ये पद साधक को दिव्यता की अनुभूति कराते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | देना हो तो दीजिये जनम जनम का साथ (Dena Ho To Dijiye Janam Janam Ka Sath) |
|---|---|
| इष्ट देव | भगवान श्री कृष्ण, विष्णु जी |
| रचना परंपरा | पारंपरिक भक्ति एवं संकीर्तन परंपरा |
| भाषा | सरल हिंदी एवं ब्रज मिश्रित लोक भाषा |
| मुख्य थीम (Theme) | पूर्ण शरणागति, आत्मसमर्पण और शाश्वत भक्ति |
| प्रमुख भाव (Bhava) | प्रेम, विनय, करुणा और वैराग्य |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक पूजा, सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी, कीर्तन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह मार्गदर्शिका सनातन धर्म की भक्ति परंपरा, संकीर्तन साहित्य और श्रीमद्भगवद्गीता के दार्शनिक सिद्धांतों के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक, आध्यात्मिक रूप से समृद्ध और शुद्ध भक्ति भाव प्रदान करना है। सभी तथ्यों और अर्थों को पारंपरिक सनातन ग्रंथों और संतों की वाणियों के अनुरूप प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर इसका लाभ उठा सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- 1. श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
- 2. सनातन भक्ति एवं संकीर्तन लोक परंपरा
- 3. श्रीमद्भागवत महापुराण - भक्ति और शरणागति प्रसंग
- 4. भारतीय संगीत और भजन परंपरा के शास्त्रीय ग्रंथ
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