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बह जा जोगी दे दर तू जाके लिरिक्स (Beh ja jogi de dar tu jaa ke Lyrics in Hindi) - Baba Balak Nath Bhajan

बाबा बालक नाथ जी के प्रसिद्ध भजन 'बह जा जोगी दे दर तू जाके' के संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्तिमय अनुभव के लिए यहाँ क्लिक करें।

बह जा जोगी दे दर तू जाके - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

"बह जा जोगी दे दर तू जाके" यह अत्यंत ही पावन, कर्णप्रिय और आत्मिक शांति प्रदान करने वाला बाबा बालन नाथ जी (बाबा बालक नाथ जी) का एक प्रसिद्ध भजन है। उत्तर भारत विशेषकर हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध सिद्धपीठ दियोटसिद्ध (शाहतलाई) में पूजे जाने वाले बाबा बालक नाथ जी को भगवान शिव के अंश, स्कंद (कार्तिकेय) का अवतार और परम तपस्वी के रूप में स्मरण किया जाता है। यह भजन जीवात्मा के भीतर छिपी संसार की विरक्ति और परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। कलयुग के इस महान भौतिक युग में जब मनुष्य माया के बंधनों में उलझकर अपनी मूल पहचान खो बैठा है, तब यह भजन उसे अंतर्मुखी होने, संसार के मोह-माया के पाश को त्यागकर सच्चे गुरु एवं इष्ट 'योगी' यानी बाबा बालक नाथ के चरणों में शरणागत होने का पावन मार्ग दिखाता है। भजन के बोल सुनने वाले के मन में एक अजीब सी वैराग्य और भक्ति की तरंग पैदा करते हैं, जिससे साधक का चित्त शांत और निर्मल हो जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

बह जा जोगी दे दर तू जाके लिरिक्स (Beh ja jogi de dar tu jaa ke Lyrics in Hindi)

बह जा जोगी दे दर तू जाके,
जे जोगी दा नजारा देखना।
अपने मन नू जोगी चरणां तो लगा के,
जे जोगी दा नजारा देखना॥

इस दुनिया ने तैनू कुछ देना नहीं,
प्याला सबरा दा पीन तैनू देना नहीं।
धूना बाबा जी दे नाम वाला ला के,
जे जोगी दा नजारा देखना॥

बह जा कुली तू जंगल विच पा के,
मोह माया वाले बंधना नू तोड़ के।
ओ साहा वाली डोर जोगी नाल जोड़ के,
सच्चे नाम वाली ज्योत जगा के,
जे जोगी दा नजारा देखना॥

बह जा कुली तू जंगल विच पा के,
जे जोगी दा नजारा देखना...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस दिव्य भजन की हर एक पंक्ति में वेदान्त के दर्शन और भक्ति रस का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। प्रथम पंक्ति में कवि या रचनाकार भावुक होकर कहता है कि हे मानव! यदि तू अपने जीवन में उस परम आनंद, शांति और अलौकिक दृष्टि (नजारा) को देखना चाहता है, जो संसार के किसी भी भोग-विलासिता में नहीं मिल सकती, तो तू बिना किसी संकोच के बाबा बालक नाथ रूपी 'योगी' के दरबार में जाकर बैठ जा। जब तक मनुष्य अपने चंचल मन को गुरु या इष्ट के चरण कमलों में नहीं लगाता, तब तक उसे आत्मिक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।

भजन के दूसरे चरण में सांसारिक यथार्थ का बहुत ही सुंदर चित्रण किया गया है। रचनाकार समझाता है कि यह स्वार्थी संसार तुझे कभी भी सच्चे सुख या मुक्ति का कोई उपहार नहीं देगा। यहाँ तक कि यह दुनिया तुझे धैर्य और संतोष का प्याला (सब्र का अमृत) भी पीने नहीं देगी, क्योंकि सांसारिक लोग हमेशा तृष्णा और लालच की आग में जलते रहते हैं। इसलिए, यदि तुझे सच्चा सुकून चाहिए तो इस दुनिया की परवाह छोड़े बिना बाबा जी के नाम का पावन 'धूना' (पवित्र अग्नि और स्मरण का स्थल) अपने हृदय में प्रज्वलित कर ले।

अंतिम चरणों में एकांत साधना और पूर्ण शरणागति का संदेश दिया गया है। 'कुली तू जंगल विच पा के' का प्रतीकात्मक अर्थ है कि भारी भीड़भाड़ और मानसिक विकारों से दूर एकांत में बैठकर अपने मन को शांत करो। मोह-माया के सभी झूठे बंधनों को काटकर, अपनी श्वासों की डोर (साहा वाली डोर) को उस परम सत्ता यानी योगी के साथ जोड़ दो। हृदय के भीतर सत्य और भक्ति की ज्योत जगाकर जब तू उस योगी के दरबार में बैठेगा, तभी तुझे उस परम परमात्मा के दर्शन और वास्तविक जीवन के सौंदर्य का अनुभव होगा। यह भजन मनुष्य को भौतिकता से निकालकर आध्यात्मिकता की ओर मोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन नाथ संप्रदाय और सिद्ध परंपरा की उस गौरवशाली शैली से जुड़ा है जहाँ वैराग्य, गुरु महिमा और नाम-स्मरण को ही जीवन का सबसे बड़ा धन माना गया है। बाबा बालक नाथ जी, जिन्हें प्यार से 'बालकनाथ जी', 'बाबा जी' या 'योगी' कहा जाता है, बाल ब्रह्मचारी और परम सिद्ध योगी हैं। उनके दरबार में आने वाले प्रत्येक भक्त की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस भजन का मुख्य महत्व यह है कि यह साधक को निराशा से निकालकर आशा, भक्ति और संतोष का मार्ग दिखाता है। इसे सुनने मात्र से मन के विकार दूर होने लगते हैं और नकारात्मकता समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस भजन को विशेष रूप से बाबा बालक नाथ जी के भजन संग्रह में एक उच्च स्थान प्राप्त है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस प्रकार के आध्यात्मिक और वैराग्य रस से परिपूर्ण भजनों को गाने या सुनने के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना जाता है। जब आप स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा घर या शांत कमरे में बैठते हैं, तब इस भजन का श्रवण मन को एकाग्र करने में अत्यंत सहायक होता है।

  • प्रातःकालीन स्मरण: सुबह उठकर ध्यान करते समय इस भजन को बजाने से पूरा दिन सकारात्मक और ऊर्जावान रहता है।
  • चौकी या जागरण: बाबा बालक नाथ जी के जागरण, भंडारे या मंगलवार/रविवार की विशेष पूजा के समय इस भजन को गाकर माहौल को पूरी तरह भक्तिमय बनाया जाता है।
  • मानसिक शांति के समय: जब भी मन अशांत हो या जीवन में कठिनाइयां आ रही हों, तब इस भजन के बोलों का मनन करने से भीतर धैर्य और शक्ति का संचार होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में सिद्ध श्री बाबा बालक नाथ जी हैं। पुराणों और लोक कथाओं के अनुसार, बाबा बालक नाथ जी का प्रकटीकरण त्रेता युग या द्वापर युग के विभिन्न कालों से जुड़ा माना जाता है। उन्हें शिव के अनन्य भक्त और योगियों के सिद्ध गुरु के रूप में पूजा जाता है। उनका मुख्य धाम हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के धौलगिरी (दियोटसिद्ध) पहाड़ियों में गुफा के रूप में स्थित है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नतें मांगने आते हैं। इस परंपरा में गुरु की शरण में जाने को ही भवसागर पार करने का एकमात्र उपाय बताया गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन ठेठ पंजाबी और हिंदी (खड़ी बोली/लोक भाषा) के सुंदर मिश्रण से रचा गया है, जो सीधे हृदय को छूता है। इसकी भाषा में सरलता, सहजता और प्रवाहमयता है। इसमें 'जोगी दा नजारा', 'प्याला सबरा दा', 'धूना बाबा जी दे नाम वाला' जैसे लोक-संस्कृति से जुड़े प्रतीकों (Metaphors) का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया गया है। काव्यात्मक दृष्टि से यह तुकबंदी और लयबद्धता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे किसी भी सामान्य संगीत प्रेमी या भक्त द्वारा आसानी से गाया जा सकता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल मनोरंजन या संगीत का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए एक गंभीर दार्शनिक संदेश है:

  1. संसार की असारता: दुनिया के सुख क्षणिक और स्वार्थी हैं, उन पर पूरी तरह निर्भर रहना मूर्खता है।
  2. संतोष का धन: जीवन में सब्र (धैर्य) सबसे बड़ा आभूषण है।
  3. एकांत और साधना: बाहरी शोरगुल से दूर अपने भीतर झांकना और ध्यान लगाना ही सच्ची साधना है।
  4. मोह का त्याग: मोह-माया के बंधनों को काटकर ही आत्मा परमात्मा से जुड़ सकती है।
  5. गुरु शरणागति: सच्चा गुरु ही जीवन की नैया को पार लगा सकता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
जोगी योगी, बाबा बालक नाथ परमेश्वर या सतगुरु जो योग और ध्यान में लीन हैं।
नजारा दर्शन, अलौकिक दृश्य आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन का आनंद।
सबरा दा प्याला धैर्य और संतोष का अमृत कठिन परिस्थितियों में अडिग रहने की मानसिक शक्ति।
धूना पवित्र अग्नि / अखंड धूनी निरंतर ईश्वर के नाम का स्मरण और तपस्या।
साहा वाली डोर श्वासों की माला जीवन का हर एक श्वास ईश्वर को समर्पित करना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"बह जा जोगी दे दर तू जाके, जे जोगी दा नजारा देखना..."
भावार्थ: यदि आप जीवन के वास्तविक और अलौकिक आनंद का अनुभव करना चाहते हैं, तो सभी चिंताओं को छोड़कर बाबा बालक नाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाएं और उनके चरणों में ध्यान लगाएं।

"इस दुनिया ने तैनू कुछ देना नहीं, प्याला सबरा दा पीन तैनू देना नहीं..."
भावार्थ: यह भौतिक संसार स्वार्थी है, यह आपको कभी भी वास्तविक शांति या संतोष नहीं देगा। यहाँ तक कि यह आपको धैर्य का अमृत भी नहीं पीने देगा, इसलिए सांसारिक प्रलोभनों से दूर रहें।

"बह जा कुली तू जंगल विच पा के, मोह माया वाले बंधना नू तोड़ के..."
भावार्थ: मन को एकांत में स्थिर करें, संसार के झूठे और जागतिक मोह-माया के बंधनों को पूरी तरह काट दें और अपने प्राणों की डोर उस प्रभु से जोड़ लें।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

बाबा बालक नाथ जी की आराधना और स्मरण के समय निम्नलिखित प्रसिद्ध मंत्र का जाप किया जाता है, जो इस भजन की भावना को और अधिक पुष्ट करता है:

"ॐ अचलनाथाय विद्महे बालनाथाय धीमहि तन्नो योगी प्रचोदयात्।"

जय बाबा बालक नाथ जी की! अलख निरंजन!

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम बह जा जोगी दे दर तू जाके (Beh Jogi De Dar Tu Ja Ke)
संबंधित देवता सिद्ध श्री बाबा बालक नाथ जी (योगी राज)
संगीत शैली / विधा लोक भजन, वैराग्य रस संकीर्तन
भाषा पंजाबी मिश्रित हिंदी (लोक भाषा)
मुख्य भाव वैराग्य, पूर्ण शरणागति, गुरु भक्ति और संतोष
श्रवण का उत्तम अवसर रविवार, मंगलवार, जागरण, और ध्यानावस्था में

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन नाथ परंपरा के प्रसिद्ध सिद्ध पुरुष और भगवान शिव के अंश माने जाने वाले श्री बाबा बालक नाथ जी को समर्पित है।

इस भजन का मुख्य संदेश संसार की मोह-माया का त्याग करके एकांत में अपने मन को गुरु या इष्ट के चरणों में लगाना और सच्चे संतोष व नाम-स्मरण को अपनाना है।

बाबा बालक नाथ जी का मुख्य पवित्र दरबार हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के अंतर्गत दियोटसिद्ध (शाहतलाई) की पहाड़ियों में एक गुफा में स्थित है।

इस भजन को प्रातःकाल ध्यान के समय, पूजा के दौरान या बाबा बालक नाथ जी के जागरण और रविवार/मंगलवार के विशेष अवसरों पर शांत मन से सुनना चाहिए।

नाथ संप्रदाय में 'धूना' साधुओं द्वारा जलाई जाने वाली पवित्र अखंड धूनी को कहते हैं। यहाँ इसका आध्यात्मिक अर्थ ईश्वर के नाम की ज्योति हृदय में प्रज्वलित करने से है।

हाँ, इस भजन को आप घर पर व्यक्तिगत साधना, पूजा अथवा पारिवारिक सत्संग के दौरान पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ गा सकते हैं।

बाबा बालक नाथ जी की आराधना के लिए रविवार का दिन सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन उनके भक्त विशेष रूप से रोट का प्रसाद चढ़ाते हैं।

वैराग्य और भक्ति रस से परिपूर्ण भजन मन को सांसारिक चिंताओं से हटाकर उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ते हैं, जिससे विचारों की उथल-पुथल शांत होती है और आंतरिक शांति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख भक्तों की धार्मिक भावनाओं, पारंपरिक लोक-साहित्य और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसमें प्रस्तुत लिरिक्स, भावार्थ और ऐतिहासिक-धार्मिक संदर्भ पूरी प्रामाणिकता और आदर के साथ संकलित किए गए हैं ताकि पाठकों को एक संपूर्ण और संतोषजनक जानकारी प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ

  • उत्तर भारत की सिद्ध पीठ परंपरा एवं नाथ संप्रदाय के लोकगीत संग्रह
  • श्री बाबा बालक नाथ जी की महिमा एवं दियोटसिद्ध धाम की पारंपरिक कथाएं
  • संत वाणी, वैराग्य पद एवं भक्ति संगीत के मौखिक तथा लिखित स्रोत

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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